मंगल के बारे में पता चली नई बात, अचानक नहीं सूख गया था लाल ग्रह

मंगल ग्रह (Mars) अचानक से सूखा ग्रह नहीं बना, बल्कि यहां बहुत उतार चढ़ाव वाली जलवायु के दौर आए थे.  (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

मंगल ग्रह (Mars) अचानक से सूखा ग्रह नहीं बना, बल्कि यहां बहुत उतार चढ़ाव वाली जलवायु के दौर आए थे. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

मंगल ग्रह (Mars) पर हुए ताजा शोध में खुलासा हुआ है कि यह ग्रह एकदम से नहीं सूखा था बल्कि उससे पहले वह कई सूखे (Dry Era) और नम (Wet Era) के दौर से गुजरा था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 14, 2021, 8:13 AM IST
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मंगल ग्रह (Mars) पर शोधकार्य पिछले कुछ सालों से तेजी से बढ़ा है. इसमें अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा (NASA) सबसे आगे है. हाल में उसने पर्सिवियरेंस रोवर मंगल पर उतारा है. इसी बीच उसके क्यूरोसिटी रोवर (Curiosity Rover) मंगल के शार्प माउंट इलाके का अन्वेषण कार्य कर रहा है जहां उसने ऐसी जानाकारियां हासिल की हैं जिनसे पता चला है कि मंगल ग्रह एक ही बार में सूखा ग्रह नहीं बन गया था, बल्कि उससे पहले उसने कई बार सूखे और नम दौर देखे थे.

क्यूरोसिटी का मकसद

हाल ही में जियोलॉजी जर्नल में प्रकाशित खबर बताती है कि 3 अरब साल पहले पूरी तरह से सूखने से पहले मंगल ग्रह कई सूखे और नम दौर से गुजरा था. शोध के सहलेखक और लोस  एल्मोस नेशनल लैबोरेटरी का केमकैम टीम के वैज्ञानिक रोजर वीन्स बताते हैं कि क्यूरोसिटी अभियान का प्रमुख लक्ष्य इस बात का अध्ययन करना करना था कि मंगल के इतिहास में आवासीय वातावरण से सूखी और ठंडी जलवायु में तक का बदलाव कैसे आ गय

खास उपकरण का उपयोग
वीन्स का कहना है मंगल के शार्प पर्वत पर चट्टानों की पर्वतों से मिली जानकारी इन बादलावों के बारे में विस्तार से बता रही है. केमकैम चट्टानों को वाष्पीकृत करने वाला लेजर है जो क्यूरोसिटी रोवर के मास्ट पर लगाया गया है. इसका काम मंगल की चट्टानों की रासायनिक संरचना का विश्लेषण करना है. इस अध्ययन की अगुआई फ्रेंच नेशनल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च के शोधकर्ता विलियम रैपिन ने की है.

विस्तृत अवलोकन ने मिल सकी जानकारी

केमकैम पर लगे लंबे दायरे के कैमरे का उपयोग कर टीम ने शार्प पर्वत की खड़े इलाके का विस्तार से अवलोकन किया. उन्होंने पाया कि मंगल की जलवायु सूखे और नम दौर में बदलता रहा था और उसके बाद ही वह पूरी तरह से सूख गया. इससे पहले मंगल का चक्कर लगा रहे अंतरिक्ष यान से शार्प पर्वत के ढाल पर खनिज संरचना की संकेत मिले थे, लेकिन अब केमकैम ने विस्तार से इसकी जानकारी जुटाई है.



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मंगल ग्रह (Mars) पिछले तीन अरब साल से सूखा ग्रह बना हुआ है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


बलुआ पत्थरों की परतें

केमकैम ने शार्प की सतह के अवसादी परतों का गहराई से अवलोकन किया है जिससे उन हालातों का पता चलता है जिनमें इनका निर्माण हुआ था. इस ढाल का अवलोकन करते हुआ क्यूरोसिटी ने पाया कि यहां की परतों में बहुत ज्यादा बदलाव दिखाई दे रहे हैं. एक झील के ऊपर जमा मिट्टी ने शार्प पर्वत का आधार बनाया है. यहां बलुआ पत्थर की परतों से पता चलता है कि उनका निर्माण हवा के टीलों से बना है जो बताता है कि वहां सूखी जलवायु का लंबा दौर था.

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बाढ़ के निक्षेप

वहीं थोड़ा ऊपर जाने पर ठहरी हुई भुरभुरी, पतली, और प्रतिरोधी परतें बताती हैं कि वे नदी के बाढ़ के मैदानों के निक्षेप से बनी है. यह नम हालातों की वापसी का संकेत हैं. भूभाग में ये बदलाव साफ इशारा करते हैं कि मंगल हमेशा के लिए सूखे दौर में आने से पहले बड़े स्तर पर उतार चढ़ावों से गुजरा है.

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क्यूरोसिटी रोवर (Curiosity Rover) इन दिनों मंगल के शार्प पर्वत के भू-भाग का अध्ययन कर रहा है. (तस्वीर: NASA)


ऐसे होता है विश्लेषण

अपने अभियान के दौरान क्यूरोसिटी मंगल के शार्प पर्वत की तलहटी से चढ़ने का प्रयास करेगा. और बहुत सी परतों की खुदाई कर उनके खनिजों की जानकारी जमा करेगा. केमकैम लेसर उपकरण इंफ्रारेड रंग की लेजर बीम का उपयोग कर चट्टानों के टुकड़ों का दस हजार डिग्री सेल्सियस तक गर्म कर उन्हें वाष्पीकृत कर देता है. इस प्रक्रिया से पैदा हुए प्लाज्मा से वैज्ञानिक चट्टानों की रासायनिक और खनिज संरचना विश्लेषण करते हैं.

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केमकैम को न्यूमैक्सिकों में लोस एल्मोस और फ्रेंच स्पेस एंजेसी में टोउलाउस बारी बारी से उपयोग कर उससे मिली जानकारी का विश्लेषण करते हैं. दोनों टीम हर सप्ताह अपना केमकैम का काम एक दूसरे से बदलते हैं और टीम ने अब तक सौ से भी ज्यादा शोधपत्र प्रकाशित किए हैं.
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