मसाला कथाः काली मिर्च के लालच ने देश को बना दिया गुलाम!

मध्य काल में काली मिर्च की खेप जब यूरोप पहुंचती थी तो इसे पाने के लिए रईसों में होड़ लग जाती थी, इसका किसी के पास होना ताकत और रसूख की निशानी होती थी.

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: October 11, 2018, 8:49 PM IST
मसाला कथाः काली मिर्च के लालच ने देश को बना दिया गुलाम!
अलग अलग रंगों की काली मिर्च (छायाःविकीकॉमंस मीडिया)
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: October 11, 2018, 8:49 PM IST
जिन मसालों का हम अपने किचन में आसानी से इस्तेमाल करते हैं. उनकी भी अपनी एक कहानी है. ऐसी एक कहानी काली मिर्च की भी है, जिसे काला सोना भी कहा जाता था. ये काली मिर्च ही है, जिसके चलते पुर्तगाल जहाजी वास्को डि गामा भारत आया. फिर इस देश के कई हिस्से विदेशी उपनिवेश बन गए.

दरअसल मसालों की कहानियां केवल किचन से ही नहीं बल्कि अर्थतंत्र, संस्कृति, राजनीति और साम्राज्यों की ताकत से भी जुड़ी रही हैं. ये कहना गलत नहीं होगा कि अगर भारत के मसालों की ख्याति यूरोप तक नहीं फैली होती तो शायद 16वीं सदी में पुर्तगाली व्यापारी और जहाजी वास्को डि गामा भारत नहीं आया होता. अगर वास्को डि गामा भारत नहीं आता तो उसके पीछे फ्रेंच और अंग्रेज भी यहां नहीं आते और भारत शायद किसी विदेशी ताकत का गुलाम या उपनिवेश भी नहीं बनता.

विदेशी आए और उपनिवेश बनाए
ये मसाले ही थे, जिन्होंने मध्यकाल में भारत की यूरोपीय देशों के बीच एक अलग तरह की छवि बनाई. ये मसाले ही थे, जिनके व्यापार पर एकाधिकार के लिए विदेशी ताकतें अपने देश तक पहुंची.

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फिर उनकी महत्वाकांक्षाओं ने इस तरह विस्तार लिया कि उन्होंने इस देश के कुछ हिस्सों पर अपना उपनिवेश स्थापित कर लिया. अपने वाइसराय यहां तैनात कर दिए. इसी में एक मसाला है काली मिर्च.

कालीकट के समुद्र तट पर मध्यकाल के दौरान काली मिर्च ले जाने के लिए तैयार जहाजी बेडे़ (फोटो सौजन्यः विकीकॉमंस मीडिया)
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वास्को डि गामा आया, पीछे-पीछे यहूदी, फ्रेंच और अंग्रेज भी 
काली मिर्च की तलाश में अगर सबसे पहले वास्को डि गामा कालीकट के तट पर पहुंचा. तो पीछे पीछे पुर्तगालियों का लाव-लश्कर भी आया. उन्होंने कोच्चि में किले और कॉलोनियां तैयार कराईं. यहां के व्यापार पर एकाधिकार करना चाहा. उसके बाद यहां यहूदी, चीनी, फ्रेंच और अंग्रेज भी आए. कोच्चि में अगर आप जाएंगे तो पुराने समय में इन सभी विदेशी अफसरों के बंगले या कालोनियां देख सकते हैं.

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काली मिर्च नहीं, बल्कि ताकत और धन का प्रतीक 
सभी काली मिर्च यानी इस काले सोने के लिए दीवाने थे. क्योंकि यूरोप में इसकी खपत बड़े पैमाने पर थी. एक जमाने में काली मिर्च का चलन करेंसी की तरह भी था. आपको लगता होगा कि ये छोटा सा काला दाना क्या करता होगा पर यकीन मानिए कि एक जमाने में काली मिर्च दुनियाभर में ताकत और पैसे का प्रतीक बनकर उभरी थी.

कालीकट में पुर्तगाली व्यापारी और जहाजी वास्को दा गामा के पहुंचने का स्मारक (छाया सौजन्य विकीकॉमंस मीडिया)


केवल रईसों के पास होती थी ये
काली मिर्च को कभी यूरोप में रईसी और लग्जरी का प्रतीक माना जाता था. ये वहां बहुत महंगी बिकती थी. बड़े बड़े और असरदार लोग ही इसका सेवन कर पाते थे.

आज भी काली मिर्च मसालों का राजा है, अगर उसे निकाल दें, तो मसालों की ठसक, स्वाद सब फीका पड़ जाता है. रंग बेरंग हो जाता है. शोध करने वाले मानते हैं कि ये केवल रसोई का ही राजा नहीं बल्कि रोग प्रतिरोधक क्षमता से लेकर एयर प्यूरीफिकेशन के काम में खासे काम का है.

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कहां से आई ये 
काली मिर्च की उत्पत्ति कहां से हुई, कहां से ये भारत आई या ये दुनिया को भारत की ही देन है. ये सब सवाल सैकड़ों सालों से पूछे जाते रहे हैं. माना जाता है कि हमारे घूमंतु पूर्वज इसे भारत लेकर आए. कुछ का कहना है कि ये समुद्र और हवा के जरिए खुद यहां तक पहुंची. लगता यही है कि इसके बीज समुद्र के साथ बहते हुए यहां आए होंगे. फिर जमीन के संपर्क और केरल की अनुकूल गरम और नम वातावरण में खूब फले फूले.


एंटी बैक्टीरियल और एंटी वायरल
दुनिया यही मानती है कि काली मिर्च मूल रूप से भारत की ही देन है. मध्यकाल में हमारी सबसे बड़ी पहचान यही मसाला रहा है. सबसे पहले इसका उपयोग हमारे देश में चरक और सुश्रुत जैसे आयुर्वेद के जन्मदाताओं ने अचूक दवाइयों के रूप में किया था.

आज भी आयुर्वेद पूरी तरह से इन्हीं मसालों से चिकित्सा के आधार पर टिका है. काली मिर्च के फायदे इस कदर हैं कि अगर लिस्ट बनाएं तो हैरान रह जाएंगे. आयुर्वेद की नजर में ये एंटी बैक्टीरियल और एंटी वायरल तत्वों की प्रचुरता लिए होती है, इसका नियमित तमाम रोगों से दूर रखता है.

काली मिर्च इसी तरह के हरे गुच्छे के दानों की तरह होती है. इन्हें सुखाया जाता है


केरल में बड़े पैमाने पर फार्मिंग
केरल के पहाड़ी इलाकों में काली मिर्च के मध्यम दर्जे की पत्तियों वाले पेड़ बहुतायत से हैं.वहां बड़ी बड़ी जमीनों पर इसकी फार्मिंग होती है. ये काम इतने बड़े पैमाने पर होता है कि गांव, शहरों और लाखों लोगों की जीविका और जीवन इससे चलता है. ऊंचे ऊंचे पेड़ों पर ये पत्तियों के साथ हरे दानों के गुच्छे के रूप में लटकती रहती है.

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वाह क्या खुशबु है
उनके हरे गुच्छों को तोड़ा जाता है. फिर पैरों या मशीनों के जरिए गुच्छे के छोटे हरे दानों को अलग किया जाता है. कड़ी धूप में कई दिन सूखने के बाद ये काली मिर्च का रंग रूप और स्वाद ले लेते हैं. जिन इलाकों में ये काम होता है, वहां काली मिर्च की खुशबु फैली होती है. ये एयरफ्रेशनर का काम भी करती है. वातावरण को शुद्ध रखती है.

फिर ये बन जाती है काली मिर्च 
काली मिर्च और सफेद मिर्च एक ही पेड़ से और एक ही तरह के हरे दानों से प्रोसेस की जाती है. काली मिर्च धूप में सूखने के कारण सूर्य की किरणों के साथ वातावरण की कई खूबियों को अपने अंदर सोख लेती है. कई बार कीड़ों और खराब मौसम के चलते इसकी पैदावार खराब भी हो जाती है. इसकी फार्मिंग में बहुत मोटा पैसा लगाया जाता है, लिहाजा इसकी खेती उनकी रिस्की भी होती है. कई बार पैदावार ठीक नहीं होने पर लोग बर्बाद तक हो जाते हैं.

हमारे देश में काली मिर्च का इस्तेमाल प्राचीन काल आयुर्वेद में ज्यादा होता था


ऊंचे दाम
केरल में सबसे ज्यादा विदेशी व्यापार काली मिर्च का ही होता है. बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा कमाई जाती है लेकिन इसका खेती का एरिया कम होता जा रहा है साथ ही उत्पादन भी कम. थाईलैंड और वियतनाम जैसे देश भी इसे बड़े पैमाने पर उगाने लगे हैं लेकिन आज भी जो बात भारतीय काली मिर्च में है वो किसी और में नहीं. दुनिया में केरल की काली मिर्च की ना केवल जबरदस्त मांग है बल्कि ये काफी ऊंचे दामों में बिकती है.

काली मिर्च बिना सब फीका
काली मिर्च से ढेरों अलग अलग तरह के मसाले बनते हैं और ढेरों व्यंजन. फेहरिश्त में अगर काली मिर्च आधारित खान पान की लिस्ट बनाइए तो ये सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों में जाएगी. शाकाहार, मांसाहार, अचार, दाल, आटा और चावल से जुड़े जितने खानपान हैं सबमें बगैर कालीमिर्च सब फीका है.

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