Chamoli disaster 2021: हिमस्खलन और बड़ी चट्टान थी इस दर्दनाक हादसे की वजह

वैज्ञानिकों ने चमोली हादसे (Chamoli Disaster) की घटना की स्पष्ट तस्वीर जानने की कोशिश की है.(फाइल फोटो)

चमोली हादसे (Chamoli Disaster 2021) पर एक शोध में वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि कैसे इस पूरी घटना के लिए हिमस्खलन (Avalanche) के साथ बड़ी चट्टान जिम्मेदार थी.

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    इस साल फरवरी में उत्तराखंड (Uttarakhand) के चमोली (Chamoli) की घाटियों में एक विनाशकारी सैलाब आया था. इसमें दो जलशक्ति परियोजनाओं तबाह होने के साथ पूरे इलाके में 200 से ज्यादा लोग मारे गए या लापता हो गए. इस भीषण हादसे पर हुए एक शोध से पता चला है कि रोंटी, ऋषिगंगा और धौलीगंगा घाटियों में हुई इस दर्दनाक घटना के लिए हिमस्खलन (Avalanche) के साथ-साथ एक विशाल चट्टान जिम्मेदार थी.

    कितनी बड़ी थी चट्टान
    इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने सैटेलाइट की तस्वीरें, भकंपीय रिकॉर्ड, न्यूमेरिकल मॉडल्स और प्रत्यक्षदर्शियों के वीडियो को शामिल किया और पाया कि वास्तव में रोंटी की चोटी के उत्तरी खड़े  हिस्से से एक 27 करोड़ क्यूबिकमीटर की चट्टान के खिसकने और ग्लेशियर की बर्फ के स्खलन होने की वजह से हुई.

    कैसे बड़ी तहाबी में बदली घटना
    हाल ही में साइंसमैग में प्रकाशित इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि चमोली हादसे में (Chamoli Disaster) यह चट्टान और हिमस्खलन तेजी से एक विशाल मलबे के बहाव में तब्दील हो गया जिसमें 20 मीटर से भी बड़े पत्थर थे जो धाटी से 220 मीटर ऊंची दीवारों से आ रहे थे. इसके बाद  नीचे घाटी में बनी संरचनाओं ने आग में घी डालने का काम किया.

    इन सवालों पर विचार की जरूरत
    इस घटना ने हिमालय और उसके जैसे ऊंचे पहाड़ों वाले इलाके मं संधारणीय विकास गतिविधियों पर निगरानी संबंधी सवाल उठाए हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तरह की घटना साल 2013 में उत्तराखंड के केदारनाथ में  हुई थी जिसमें चार हजार लोग मारे या लापता हो गए थे. उनका कहना है कि चमोली की घटियों जैसे खतरनाक इलाकों में ऋषिगंगा और धौलीगंगा परियोजनाओं जैसी मानवीय गतिविधियां ऐसी आपदाओं का जोखिम और बढ़ा देती हैं.

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    चमोली (Chmoli) में हुई इस घटना में 200 से ज्यादा लोग मारे या लापता हुए थे


    विस्तार से पड़ताल
    शोधकर्ताओं ने तमाम उपकरण और आंकड़ों की मदद से इस घटना को पूरी तरह से समझने का प्रयास किया और उससे पहले के हालात, घटना के बाद में वहां के लोगों की तत्कालीन प्रतिक्रियाएं भी जानी जिससे वे ऊचें पर्वतों वाले पर्यावरण में संधारणीय विकास के व्यापक प्रभावों का आंकलन करने में सहयता मिल सके.

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    कैसे हुई शुरुआत
    शोधकर्ताओं ने सैटेलाइट तस्वीरों के माध्यम से पता लगा कि घटनास्थल पर कैसे चट्टान में दरार पड़ी. बर्फ उस दरार से पहले कितनी दूरी पर आ चुकी थी. पहले बीस मीटर मोटे ग्लेश्यिर ने दरारों को 500 मीटर चौड़े टुकड़े में बदला. और फिर करीब 27 करोड़ क्यूबिक मीटर की चट्टान टूटी और बाकी काम हिमनद की गाद ने कर दिया जिससे मलबे की एक नदी बन गई.

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    चमोली (Chamoli) की घाटियों जैसी जगहों में ऐसे खतरनाक हादसा होना चिंता की बात है. (फाइल फोटो)


    बर्फ के पिघलने से तेज हुआ बहाव
    शोधकर्ताओं ने प्रत्यक्ष दर्शियों के बयान और मीडिया रिपोर्ट के आधार पर पाया कि बड़ी बर्फ की चट्टानें तपोवन हाइड्रोपॉवर साइट की सुरंग में मिली थीं. चट्टान और हिमस्खल के घाटी के तल तक पहुंचने के बाद यह बहाव उत्तरपश्चिम दिशा की ओर बहने लगा और इस दौरान घर्षण से बर्फ भी पिघली जिससे बहाव तेज हुआ जिसमें गाद, पानी और बर्फ के टुकड़े बह रहे थे.

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    इस हादसे के लिए केवल हिमस्खलन और बड़ी चट्टान की खिसकना ही बड़ा कारण नहीं था. शोधकर्ताओं ने बताया कि इलाके में घाटी भूभाग और उसके आगे की बनावट के साथ नीचे की ओर दो परियोजनाओं के साथ अन्य परिस्थितियों ने भी इसे एक दर्दनाक हादसे का रूप दिया.

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