वो मुस्लिम नेता जिसे भगवान कृष्ण से था अटूट प्रेम, नाम रखा था- हजरत कृष्णा

Aditya Prakash | News18Hindi
Updated: August 23, 2019, 12:20 PM IST
वो मुस्लिम नेता जिसे भगवान कृष्ण से था अटूट प्रेम, नाम रखा था- हजरत कृष्णा
हसरत की शायरी और उनकी कृष्ण भक्ति हिन्दुस्तान की उस गंगा-जमुनी तहजीब की निशानी है जिसने दुनिया को सेक्युलरिज़्म का पाठ पढ़ाया है.

हसरत मोहानी (Hasrat Mohani) ने भगवान कृष्ण (Krishna) पर कई रचनाएं भी की थी, कृष्ण भक्ति की झलकियां उनके साहित्य में देखने को मिलती हैं.

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"मथुरा कि नगर है आशिक़ी का
दम भर्ती है आरज़ू उसी का
पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदां था
हर नग़मा कृष्ण बांसुरी का"

मौलाना हसरत मोहानी  (Hasrat Mohani) एक स्वतंत्रता सेनानी, एक पत्रकार, एक शायर, संविधान सभा का एक सदस्य, और 'इंक़लाब ज़िन्दाबाद' का नारा इज़ाद करनेवाले एक इंक़लाबी शख्स के तौर पर तो जाने जाते हैं, मगर उनका एक रूप जिसके बारे में लोगों कम ही पता होता है, वो रूप है कृष्ण (Krishna) भक्ति का.

"इंक़लाब ज़िंदाबाद" वो नारा जो भगत सिंह समेत तमाम आज़ादी के मतवालों के मुंह से जंग-ए-आजादी की पहचान बना. इस नारे को इज़ाद करने वाले हसरत मोहानी ख़ुद भी एक आज़ादी के सिपाही थे. सिर्फ़ 20 साल की उम्र में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ अपने अख़बार "उर्दू-ए-मोअल्ला" में एक क्रांतिकारी लेख छापा. जिसके एवज़ में उन्हें ब्रितानी हुकूमत ने एक साल के लिए जेल में डाल दिया. ये घटना 1903 की है. उस
वक्त वो अलीगढ़ में रहते थे. इसी दौरान वो शाराए मुतक़द्दिमीन के दीवानों का इंतिख़ाब करना शुरू किया. साथ ही स्वदेशी तहरीकों में भी हिस्सा लेते रहे.
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मौलाना मोहानी पूरी जिंदगी कृष्ण प्रेम से सराबोर थी. उनका बचपन ज्यादातर मथुरा में बीता था. बचपन में वो अक्सर मथुरा के पुराने और ऐतिहासिक मंदिरों में बैठकर कृष्ण लीला के प्रवचन सुनते थे. कृष्ण की लीलाओं को सुनने और समझने की ऐसा खुमारी चढ़ी कि फिर ताउम्र उन्हीं के होकर रह गए.

मौलाना हसरत मोहानी की जवानी की तस्वीर


मौलाना साहिब आपका मज़हब क्या है?

मौलाना हसरत मोहानी का नाम सय्यद फ़ज़ल-उल-हसन था. उनका तख़ल्लुस 'हसरत' था. वो क़स्बा मोहान ज़िला उन्नाव के रहनेवाले थे. हसरत मोहानी के मन में भगवान कृष्ण के लिए प्रेम और भक्ति की झलकियां उनकी कविताओं और ग़ज़लों में देखने को मिलती हैं. हसरत कृष्ण को "हज़रत कृष्ण अलैहिररहमा" लिखा करते थे. हसरत की कुछ किताबों में इस बात का ज़िक्र मिलता है कि वे कृष्ण को 'रसूल' या 'पैग़ंबर' समझते थे.

हसरत के शब्दों में कृष्ण प्रेम और सौन्दर्य के देवता थे, और यही बात उन्हें कृष्ण भक्ति के रंग में रंगती थी. हसरत मोहानी एक बार लखनऊ से दिल्ली के सफर पर थे. इस दौरान वो कृष्ण भक्ति में एक नज़्म गुनगुना रहे थे. रास्ते में किसी अजनबी शख्स ने उनसे पूछा कि "मौलाना साहिब देखने से तो आप अच्छे-खासे मुसलमान लगते हैं, फिर कृष्ण के गीतों क्यों गा रहे हैं, आपका मज़हब क्या है? इस मासूम से सवाल पर हसरत को हंसी आई और उन्होंने कहा....

"दरवेशी-ओ-इंकलाब है मसलक मेरा
सूफ़ी मोमिन हूं इश्तेराकी मुस्लिम"

इसका मतलब है, "मेरा मज़हब फ़क़ीरी और इंक़लाब है, मैं सूफ़ी मोमिन हूं और साम्यवादी मुसलमान."

हसरत का वो शेर जो उनके मज़हबी खयालों की अक्कासी करता है, वो कुछ इस तरह है...

"मसलक-ए-इश्क़ है परसतिश-ए-हुस्न
हम नहीं जानते अज़ाब-ओ-सवाब"

इसका मतलब है, "प्रेम करना और सौन्दर्य को पूजना ही मज़हब है मेरा, पाप और पुण्य के बारे में मुझे कुछ नहीं पता.

हसरत के बारे में ये बात काफी मशहूर है कि वे अपने पास सदा एक मुरली रखा करते थे, और हर साल जन्माष्टमी आने पर वो मथुरा जाया करते थे. एक बार जेल में होने की वजह से हसरत मथुरा नहीं जा पाए तो इसका दुख  उन्होंने ने अपनी एक कविता में की है. हसरत एक शायर थे. यूं कहा जाए कि एक सूफ़ी शायर थे. भगवान कृष्ण से वो बेपनाह मोहब्बत करते थे. इसी मोहब्बत को उन्होंने कविताओं और उर्दू ग़ज़लों में बड़ी खूबसूरती से दिखाया है. हसरत के काव्य संग्रह "कुल्लीयात-ए-हसरत" में ये कृष्ण भक्ति की सभी कविताएं और ग़ज़लें दर्ज हैं.

श्री कृष्ण


कृष्ण भक्ति में लिखी गई हसरत की कुछ कविताएं:

1. मन तोसे प्रीत लगाई कान्हाई

मन तोसे प्रीत लगाई कान्हाई
काहू और की सूरत अब काहे को आई

गोकुल ढूंढ बृंदाबन ढूंढो
बरसाने लग घूम के आई

तन मन धन सब वार के हसरत
मथुरा नगर चली धूनी रमाई

2. मोसे छेर करत नंदलाल

मोसे छेर करत नंदलाल
लिए ठारे अबीर गुलाल

ढीठ भयी जिन की बरजोरी
औरन पर रंग डाल डाल

हमहूं जो दिये लिपटाए के हसरत
सारी ये छलबल निकाल

3. बिरह की रैन कटे न पहार

बिरह की रैन कटे न पहार
सूनी नगरिया परी उजार

निर्दयी श्याम परदेस सिधारे
हम दुखियारन छोरछार

काहे न हसरत सब सुख सम्पत
तज बैठन घर मार किवार

4. मोपे रंग न डार मुरारी

मोपे रंग न डार मुरारी
बिनती करत हूं तिहारी

पनिया भरन के जाय न देहें
श्याम भरे पिचकारी

थर थर कंपन लाजन हसरत
देखत हैं नर नारी

5. मथुरा कि नगर है आशिक़ी का

मथुरा कि नगर है आशिक़ी का
दम भर्ती है आरज़ू उसी का

हर ज़र्रा ए सरज़मीने गोकुल
दारा है जमाल ए दिलबरी का

बरसाना ओ नंदगांव में भी
देख आए हैं जलवा हम किसी का

पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदां था
हर नग़मा कृष्ण बांसुरी का

वो नूरे सियाह था कि हसरत
सरचश्मा फ़रोग़-ए-आगही का

हसरत की शायरी और उनकी कृष्ण भक्ति हिन्दुस्तान की उस गंगा-जमुनी तहजीब की निशानी है जिसने दुनिया को सेक्युलरिज़्म का पाठ पढ़ाया है.

फिल्म 'निकाह' में गुलाम अली द्वारा गाई गई गजल "चुपके-चुपके रात-दिन आंसू बहाना याद है" बहुत मशहूर हुई, ये ग़ज़ल हसरत मोहानी ने ही लिखी थी, इस बात की जानकारी बहुत कम लोगों को है.

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First published: August 23, 2019, 11:54 AM IST
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