क्या है मंगल का वह खास नक्शा जो बताता है कि वहां का वायुमडंल कैसे हुआ खाली

क्या है मंगल का वह खास नक्शा जो बताता है कि वहां का वायुमडंल कैसे हुआ खाली
मंगल के वायुमंडल में बह रहे करंट के नक्शे ने काफी जानकारी दी है. (फोटो NASA @MAVEN2Mars)

मंगल (Mars) ग्रह के वायुमंडल में दौड़ रहे इलेक्ट्रिक करंट (Electric current) के नक्शे से वहां के वायुमंडल के खाली होने के कारण के बारे में जानकारी मिली.

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नई दिल्ली: इस समय अंतरिक्ष में वैज्ञानिकों के लिए सबसे ज्यादा शोध का विषय है तो वह है मंगल ग्रह (Mars). मंगल पर कई शोध एक साथ चल रहे हैं. मंगल का पिछले पांच साल से चक्कर लगा रहे नासा NASA के अंतरिक्ष यान मावेन (MAVEN) ने वहां के वायुमंडल के बारे में खास जानकारी उपलब्ध कराई है, जिसने उसे खाली कर दियाय

रहने लायक ग्रह हो सकता था, लेकिन अब नहीं है
इन जानकारियों से नासा को मंगल के वायुमंडल के इलेक्ट्रिक करंट सिस्टम (Electric current system) का नक्शा बनाने में मदद मिली है. बोउल्डर की कोलोराडो यूनिर्सीटकी  भौतिक विज्ञानी रॉबिन रैमस्टै का कहना है कि इन धारओं  (Current)  की वजह से मंगल ग्रह के वायुमंडल को इतना नुकसान हुआ कि यह आज रहने लायक ग्रह नहीं है जो कि हो सकता था.

क्या सौर पवनों  कारण हुआ मंगल को नुकसान



हाल ही में नेचर एस्ट्रोनॉमी में प्रकाशित इस शोध के रैमस्टैड एक प्रमुख लेखक हैं. उनके मुताबिक वे इस बात का अध्ययन कर रहे हैं कि वास्तव में सौर पवन और दूसरे कारकों के कारण कितनी ऊर्जा वायुमंडल से बाहर निकल रही है. यह ऊर्जा धाराओं से ही मंगल से बाहर जा रही है.



पृथ्वी पर भी है ऐसा सिस्टम
ठीक ऐसा ही सिस्टम पृथ्वी पर भी है जिसे हम ध्रुवीय क्षेत्रों में रात को आसमान में रंगीन रोशनी देखते हैं जिसे अरोर (aurora) कहते हैं. यह प्रभाव पृथ्वी के चुंबकीय तत्व और सौर पवनों के बीच की अंतरक्रिया से होता है. पृथ्वी और मंगल ग्रह में यही अंतर है कि पृथ्वी में चुंबकीय प्रभाव उसके अंदर से आता है, लेकिन मंगल पर ऐसा कुछ नहीं है.

Earth
पृथ्वी का मैग्नेटिक फील्ड ही है जो हमारे वायुमंडल को बचाए हुए हैं.


तो क्या हो रहा है मंगल पर
दरअसल सूर्य से लाखों मील प्रतिघंटा की गति से विद्युत आवेषित इंलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन लगातार बह रहे हैं. इन्हें ही सौर पवन कहते हैं. ये सौर पवनें  अपने रास्ते में आने वाली हर चीज का सामना करती हैं. इसमें पृथ्वी और मंगल ग्रह भी शामिल हैं. इन सौर पवनों में विद्युत चुंबकीय प्रभाव भी होता है और ये चुंबकीय क्षेत्र मंगल जैसे ग्रहों के वायुमंडल की उपरी सतह को भी नहीं भेद पाते हैं.  लेकिन इससे ग्रह के आयनमंडल में एक करंट बढ़ने लगता है और उससे चुंबकीय क्षेत्र बढ़ने लगता है. इससे एक तरह का चुंबकीय मंडल या मैग्नेटोस्फीयर (magnetosphere) बन जाता है. सौर पवनों से इसे कैसे शक्ति मिलती है यह अभी पता नहीं लग सका है.

ये करंट ही है समस्या
रैमस्टैड कहते हैं कि  मंगल ग्रह एक तरह के धातु की गेंद की तरह हो जिसे इलेक्ट्रिक करंट ने घेर रखा है. यह करंट मंगल के ऊपरी हिस्से में बह रह है. इसमे सबसे ताकतवर करंट 120-200 किलोमीटर की ऊंचाई पर बह रहा है. मैवेन और पिछले मिशन इससे पहले करंट की कई सतहें तो देख पाए थे, लेकिन अब तक पूरे सर्टिक का नक्शा यानि कि मैप नहीं बन सका था.

करंट को नापने का मिल गया तरीका
अभी तक यह भी पता नहीं चल सका था कि मगंल पर सौर पवनें कहां बनती हैं और वहां वायुमंडल र कहां इलेक्टिक करंट जमा होता है. इन करंट को सीधे नापना बहुत ही ज्यादा मुश्किल है, लेकिन ये करंट सौर पवनों के मैग्नेटिक फील्ड में बदलाव कर दते हैं और यह मैवेन के संवेदनशील मैग्नेटोमीटर से पकड़ा जा सकता  है. शोधकर्ताओं की टीम ने मैवेन का उपयोग करते हुए मंगल की त्रिआयामी औसत मैग्नेटिक फील्ड संरचना बनाई और उसके मैग्नेटिक फील्ड में हुए बदलावों से करंट का गणना की. इससे टीम को करंट की ताकत और रास्तों का पता  चल गया.

MARS
मंगल पर अधिकतम तापमान -48 डिग्री होता है.


अब चूंकि मंगल के आसपास कोई मैग्नेटिक फील्ड नहीं है इसलिए सौर पवनों में बना करंट मंगल के वायुमंडल की उपरी सतह से सीधा विद्युतीय संबंध बनाने में सफल रहा. इस करंट ने सौरपवनों की ऊर्जा को मैग्नेटिक और इलेक्ट्रिक फील्ड में बदला. इससे वायुमंडल के कण आवेशित हो गए और बाहर जाने लगे. यह प्रक्रिया अरबों सालों से चल रही है. इसी ने मंगल को एक गर्म और पानी वाले ग्रह से एक ठंडे रेगिस्तान में बदल दिया है. अभी इस विषय पर और शोध जारी है.

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