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कौन है कला का वो छात्र 'आल्टर', जिसे चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला

अमेरिकन वायरोलॉजिस्ट हार्वे जे आल्टर

अमेरिकन वायरोलॉजिस्ट हार्वे जे आल्टर

न्यूयॉर्क से कला में डिग्री लेने के बाद एकाएक हार्वे जे आल्टर (Harvey J. Alter) ने मेडिसिन की पढ़ाई शुरू कर दी. कला के प्रतिभाशाली छात्र ने अपनी रुचि को एकदम से क्यों बदला, इसपर खुद आल्टर ने कभी कुछ नहीं कहा.

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    इस साल चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार (Nobel medicine prize) की घोषणा हो चुकी है. ये पुरस्कार हार्वे जे आल्टर, माइकल ह्यूटन और चार्ल्स एम राइस को संयुक्त रूप से हेपेटाइटिस सी (Hepatitis C) की खोज के लिए दिया गया है. इन तीन वैज्ञानिकों में से हार्वे जे आल्टर की शोध में काफी अहम भूमिका रही. अमेरिकन मूल के इस टॉप साइंटिस्ट ने चिंपांजी के जरिए पता लगाया था कि हेपेटाइटिस ए और बी के अलावा एक और भी किस्म होती है जो काफी संक्रामक और जाललेवा होती है.

    कौन हैं ये वैज्ञानिक
    लगभग 85 साल के आल्टर का जन्म न्यूयॉर्क में एक यहूदी परिवार में हुआ था. उनका करियर बड़ी ही अलग दिशा में आगे बढ़ा. पहले आल्टर को कला में काफी रुचि थी और उन्होंने न्यूयॉर्क से ही कला की डिग्री ली. इसके बाद कला को छोड़-छाड़कर आल्टर एकाएक मेडिकल की पढ़ाई में आ गए. कला के प्रतिभाशाली छात्र ने अपनी रुचि को एकदम से क्यों बदला, इसपर खुद आल्टर ने कभी कुछ नहीं कहा.

    मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार हार्वे जे आल्टर, माइकल ह्यूटन और चार्ल्स एम राइस को संयुक्त रूप से हेपेटाइटिस सी की खोज के लिए मिला (Photo- AP via news18)


    चिकित्सा में भी करने लगे कमाल
    आल्टर ने अपनी प्रतिभा मेडिसिन में भी साबित कर दी. यही वजह है कि वे तेजी से आगे बढ़ते गए और मेरीलैंड के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) में सबसे ऊपर के ओहदे पर काम किया. रिसर्च फैलो के रूप में आल्टर शुरू से ही खोज में लगे रहे. साल 1964 में उन्होंने अमेरिकी वैज्ञानिक और जेनेटिक विशेषज्ञ बरुच सैमुअल ब्लूमबर्ग के साथ मिलकर एक एंटीजन की खोज की. बता दें कि जिस वैज्ञानिक बरुच के साथ मिलकर आल्टर ने युवा शोधकर्ता के तौर पर खोजों की शुरुआत की, उन्हें भी चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिल चुका है.

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    बरुच के साथ मिलकर की गई यही खोज हेपेटाइटिस बी वायरस को अलग करने में काफी काम आई थी. इसके बाद ही अमेरिका में रक्तदान के दौरान खून देने वाले के ब्लड की जांच होने लगी, जिससे सत्तर के दशक में ही रक्तदान के कारण होने वाले हेपेटाइटिस मामलों की संख्या 30 प्रतिशत से घटकर शून्य हो गई.

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    हेपेटाइटिस के इस प्रकार को दिया नया नाम
    सत्तर के ही दशक में आल्टर और उनकी टीम ने पूरी तरह से हेपेटाइटिस संबंधी शोध में खुद को झोंक दिया. उन्होंने पाया कि हेपेटाइटिस का संक्रमण इसके ए और बी टाइप से ही नहीं होता, बल्कि कोई और भी प्रकार है, जो खासा संक्रामक है. चिंपांजी पर उन्होंने ये प्रयोग किया और नए टाइप को NANBH (नॉन-ए, नॉन-बी हेपेटाइटिस) नाम दिया. साल 1989 में इसी NANBH वायरस को नया नाम दिया गया- हेपेटाइटिस सी वायरस. और ये खोज वैज्ञानिक जर्नल साइंस में छपी, जिसके बाद मेडिकल जगत में तहलका मच गया. इसी खोज के लिए आल्टर को लगातार कई सम्मान मिल चुके हैं.

    असुरक्षित तरीके से टैटू करवाने पर भी हेपेटाइटिस का खतरा रहता है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


    जानते हैं, क्या है हेपेटाइटिस सी
    ये लिवर से जुड़ी एक बीमारी है जो हेपेटाइटिस सी नामक विषाणु से संक्रमित होने पर पैदा होती है. ये असुरक्षित सेक्स, नीडल्स व ड्रग्स के लिए इंजेक्शन शेयर करने, मां से बच्चे को, संक्रमित व्यक्ति के ब्रश, रेजर या नेलकटर के इस्तेमाल या टैटू मशीन की नीडल से फैल सकती है.

    आम बीमारी जैसे ही हैं लक्षण
    संक्रमण की शुरुआती अवस्थात में इसके लक्षणों को पहचानना बेहद कठिन है लेकिन यही सबसे जरूरी भी है वरना बाद में बीमारी खतरनाक स्टेज पर चली जाती है. लिवर को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाते हुए ये वायरस उसके फेलियर या कैंसर की भी वजह बन सकता है.

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    इसके शुरुआती लक्षणों में चोट लगने पर जल्दी न भरना, भूख कम होना, यूरिन डार्क दिखना, खुजली, वजन एकदम से कम होना और पैरों में सूजन जैसी बातें शामिल हैं. ये किसी भी दूसरी बीमारी के जैसे लक्षण हैं, इसलिए बिना पूरी जांच के बीमारी पकड़ नहीं आ पाती है. अब इस गंभीर बीमारी का इलाज तो है लेकिन उसकी सफलता इस बात तय होती है कि बीमारी किस अवस्था में पहुंची है.

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