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यहां बांग्लादेशी शरणार्थी हिंदुओं का चलता है सिक्का, लोकल बिजनेस पर है कब्जा

News18Hindi
Updated: January 21, 2020, 5:58 AM IST
यहां बांग्लादेशी शरणार्थी हिंदुओं का चलता है सिक्का, लोकल बिजनेस पर है कब्जा
साल 2019 के सितंबर महीने में इस इलाके के बंगाली लोगों ने अपनी ताकत दिखाई थी और बड़ी रैली की थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

इस इलाके में बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थी (Bangladeshi Hindu Refugee) को अविभाजित मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh)के जंगली इलाके रहने के लिए दिए गए थे. अब ये इलाका छत्तीसगढ़ राज्य में पड़ता है. मजबूरी में जीविका चलाने के लिए शुरू किए गए व्यवसाय अब समुदाय की ताकत बन गए हैं.

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  • Last Updated: January 21, 2020, 5:58 AM IST
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इस वक्त पूरे भारत में बांग्लादेशी शरणार्थियों (Bangladeshi immigrants) को लेकर बवाल मचा हुआ है. केंद्र सरकार द्वारा तीन पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों को नागरिकता दिए जाने को लेकर बनाए गए कानून (Citizenship Amendment Act) पर देशभर में प्रदर्शन चल रहे हैं. लेकिन इन सबके बीच छत्तीसगढ़ का पखांजुर टाउन (Pakhanjore) कुछ अलग ही कहानी कहता है. उत्तरी बस्तर में पड़ने वाले कांकेर जिले में एक बंगाली बहुल टाउन है जिसका नाम है पखांजुर. इस इलाके में पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) से आए हिंदू शरणार्थियों का प्रभाव बेहद मजबूत है. आंकड़ों के मुताबिक इस इलाके के करीब 295 गांवों में 133 ऐसे हैं जहां बंगाली (बांग्लादेशी) हिंदुओं की बहुलता है.

दिलचस्प ये है कि ये लोग शरणार्थी के तौर पर आए जरूर थे लेकिन वक्त के साथ इन्होंने परंपरागत धंधों में पांव जमाकर अपने समुदाय को काफी मजबूत कर लिया है. इस समुदाय के लोगों को 1961 और फिर 1974 में मध्य प्रदेश के जंगली इलाकों में इलाकों में बसाया गया था. तब मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का बंटवारा नहीं हुआ था. उस वक्त इन्हें कुछ जमीन के साथ वोटिंग के अधिकार भी दिए गए थे.

वक्त के साथ इस समुदाय ने मछली पालन और चावल की खेती के नए रास्ते तलाशे और अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की. एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक इलाके की एसडीएम निशा नेताम मडवी कहती हैं कि बंगाली शरणार्थियों ने खुद को प्रयोगधर्मी किसानों के रूप में विकसित किया है. उन्होंने मछली पालन के कई नए तरीके तलाशे हैं.

पखांजुर इलाके में मछली पालन से लेकर मछली बेचने तक का काम बंगाली शरणार्थी समुदाय के ही हाथों में है.
पखांजुर इलाके में मछली पालन से लेकर मछली बेचने तक का काम बंगाली शरणार्थी समुदाय के ही हाथों में है.


पखांजुर टाउन में बंगालियों के बिना कोई धंधा नहीं चल सकता. ये समुदाय इलाके के व्यावसाय और जीवन की धुरी बन गया है. इलाके के सरकारी अस्पताल में मेडिकल ऑफिसर संजीव वैष्णव का कहना है कि परालकोट गांव ने कई डॉक्टर्स, इंजीनियर, अधिकारी दिए हैं. परालकोट बंगाली बहुल गांव है. खुद संजीव वैष्णव का परिवार भी 70 के दशक में बांग्लादेश से भारत आया था.

आसान नहीं थी शुरुआत
बंगाली हिंदुओं की शुरुआत इलाके में अच्छी नहीं थी. 60 और 70 के दशक में जब ये लोग इन इलाकों में आए थे तब हालात अनुकूल नहीं थे. बताया जाता है कि इस इलाके में बहुत सारे बंगाली लोग नहीं रह सके और पश्चिम बंगाल की तरफ रुख किया था. लेकिन इनमें कुछ प्रतिशत ऐसे भी लोगों का था जिन्होंने इलाके को अपनी स्थिति के हिसाब से ढाला. यहां खेती और मछली पालन के नए रास्ते तलाशे जिससे आजीविका चलाई जा सके. वक्त के साथ-साथ समुदाय यहां मजबूत होता चला गया.अब स्थिति यह है कि जब पखांजुर टाउन जाएंगे तो वहां मुख्य चौराहे पर आपको सुभाष चंद्र बोस की तस्वीर दिख जाएगी. सुभाष चंद्र बोस को यहां के बंगाली अपनी अस्मिता की पहचान के तौर पर मानते हैं. इस इलाके में तीन व्यावसायिक सेंटर हैं जिनमें मुख्य रूप से बहुतायत बंगाली लोगों की ही है. ये सेंटर हैं-कपासी, बांडे और पाखुंजरे. अगर किसानी से अलग हटकर बात करें तो इस इलाके में मिठाइयों की ज्यादातर दुकानें भी बंगाली शरणार्थियों की हैं. बंगाली मिठाइयां आपको यहां आसानी से मिल जाएंगी.

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पूर्वी पाकिस्तान से बड़ी संख्या में बांग्लादेशी हिंदू भारत आए थे.
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पूर्वी पाकिस्तान से बड़ी संख्या में बांग्लादेशी हिंदू भारत आए थे.


मजबूरी में शुरू किया व्यवसाय
पखांजुर इलाके में बंगाली हिंदुओं ने व्यवसाय के क्षेत्र में अपना सिक्का तो जमा लिया है लेकिन समुदाय के ही कई लोगों का यह भी मानना है कि यह सबकुछ विकल्पों की कमी की वजह से हुआ है. कई वरिष्ठ शरणार्थियों का कहना है कि शुरुआत में हमारे पास रोजगार का कोई साधन नहीं था. जीविका के लिए कुछ न कुछ तो करना ही था. किस्मत ने हमारा साथ दिया और अब खेती, किसानी और व्यवसाय ही पहचान बन गया है.

बीते साल दिखाई थी ताकत
साल 2019 के सितंबर महीने में इस इलाके के बंगाली लोगों ने अपनी ताकत दिखाई थी और बड़ी रैली की थी. इन लोगों की मांग है कि पखांजुर को जिला बनाया जाए. वैसे भी ये इलाका कांकेर जिले के बिल्कुल बाहरी किनारे पड़ता है. इस रैली में करीब 30 से 40 हजार लोग शामिल हुए थे. राज्य स्तर पर इस रैली की खूब चर्चा हुई थी. बंगाली लोगों का कहना था कि उन्हें भी सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिलना चाहिए. इसके अलावा भी बंग समाज ने कई मांगें की थीं.
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First published: January 21, 2020, 5:30 AM IST
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