ब्रिटिश राज की मिलिट्री फार्म सर्विस बंद, क्या था इतिहास, क्या होगा भविष्य?

एक डेयरी फार्म की तस्वीर

एक डेयरी फार्म की तस्वीर

क्या आपको पता है कि मिलिट्री (Indian Military) के पास देश के अलग-अलग प्राइम लोकेशनों पर हज़ारों एकड़ की कृषि भूमि (Farm Land) क्यों थी? इन फार्म्स को बंद करने का फैसला क्यों और किस तरह लिया गया और अब इस ज़मीन का क्या होने वाला है?

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 4, 2021, 10:43 AM IST
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देश भर में करीब 130 मिलिट्री फार्मों (Indian Military Farms) के प्रशासन से जुड़ी मिलिट्री फार्म सेवा (Military Farms Service) को बीते बुधवार को बंद कर दिया गया. ब्रिटिश राज के ज़माने से पिछले 132 सालों से यह सेवा चल रही थी, जिसे क्रमबद्ध तरीके से आखिरकार औपचारिक ढंग से पूरी तरह विदाई मिल गई. इस खबर से तीन सवाल खड़े होते हैं : इन मिलिट्री फार्म का इतिहास (Military Farms History) क्या रहा, इन्हें बंद क्यों और किस तरह किया गया और अब इन फार्म्स (Future of Farms Land) का क्या होगा?

इंडियन आर्मी में क्या रहा फार्म्स का इतिहास?

ब्रिटिशों ने इलाहाबाद में 1889 में पहला मिलिट्री फार्म बनाया था. इसके बाद देश भर में कई जगह इस तरह के फार्म बनाए गए, जिनका मूलभूत मकसद था कि भारतीय सैनिकों के लिए पोषक दूध मुहैया कराया जा सके. इन फार्मों से सैनिकों के लिए दूध, मक्खन के साथ ही सेना के जानवरों के लिए चारा भी सप्लाई किया जाता रहा.

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कितना बड़ा रहा रोल?

सेना की सभी कमांड्स के हिस्से में इस तरह के फार्म डेवलप किए गए थे. इतिहास के मुताबिक एक ज़माना था जब गायों के आर्टिफिशियल प्रजनन का दौर भी इन फार्मों में शुरू हुआ था. यह 1925 में पहली बार हुआ था. यही नहीं, एक समय में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने पाया था कि देश में सबसे ज़्यादा पालतू मवेशी भारतीय मिलिट्री फार्मों में ही थे.

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मिलिट्री के पास एक समय में सबसे ज़्यादा पशुधन था.




इन आंकड़ों के साथ ही यह भी एक अहम फैक्ट है कि मिलिट्री फार्मों ने देश के कृषि मंत्रालय के साथ मिलकर 'प्रोजेक्ट फ्रीज़वाल' शुरू किया था, जिसके तहत देश भर में पालतू मवेशियों की क्रॉस ब्रीडिंग का सबसे बड़ा अभियान चला था.

क्यों और कैसे बंद किए गए फार्म?

जून 2013 में इन फार्मों को सिलसिलेवार ढंग से बंद किए जाने की कवायद शुरू हुई थी. वजह यही थी कि देश भर में डेयरी उद्योग का​ विस्तार इतना हो चुका था कि सेना के लिए दूध की सप्लाई कोई बड़ा मुद्दा नहीं रह गई थी. 2014 में एक आदेश में कहा गया कि सेना के लिए डेयरी प्रोडक्ट सप्लाई का ज़िम्मा मिलिट्री फार्म की जगह आर्मी सर्विस कॉर्प्स के सुपुर्द किया गया.

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इसके बाद 2016 में लेफ्टिनेंट जनरल डीबी शेकटकर ने अपनी रिपोर्ट में मिलिट्री फार्मों को बंद किए जाने की सिफारिश की. इस कवायद से सवाल यह खड़ा हुआ कि इन फार्मों के जानवरों का क्या होगा? 2018 में सभी जानवरों को राज्यों के डेयरी उद्योगों को बेच दिए जाने का आदेश हुआ.

अब आगे क्या होगा?

इन फार्मों के बंद होने के बाद सवाल खड़ा होता है कि इसकी ज़मीन और इससे जुड़े स्टाफ का क्या भविष्य होगा? इस बारे में इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट की मानें तो इन फार्मों में जो परमानेंट स्टाफ था, उसे डिफेंस के अन्य विभागों में ट्रांसफर किया जाएगा. इनमें से ज़्यादातर को कार्मिक विभाग में जगह मिल सकती है.

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देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह.


एक बड़ा फायदा इस कदम के बाद यह होगा कि सरकार को हर साल करीब 280 करोड़ रुपये की बचत होगी. यह रकम फार्मों के रखरखाव, स्टाफ के वेतन और मवेशियों के पालन पोषण पर खर्च किए जाते थे. वहीं, एक समस्या यह होगी कि बड़ी संख्या में इन फार्मों में स्टाफ परमानेंट नियुक्ति वाला नहीं था, इस टेंपरेरी स्टाफ के सामने अब रोज़गार का संकट होगा.

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अब रही ज़मीन की बात तो देश भर में इन फार्मों के लिए मिलिट्री के पास 20,000 एकड़ की ज़मीन बेहद कीमती लोकेशनों पर रही. हालांकि अब इस ज़मीन को लेकर रक्षा मंत्रालय को फैसला करना है ​लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि उम्मीद यही ज़्यादा है कि इससे सेना की तीनों सेवाओं को बड़ी रकम या अधिग्रहण मिल सकता है. हालांकि अभी इस बारे में कुछ साफ तौर पर कहना मुश्किल ही है.
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