फिक्सिंग नहीं इस कदम से अजहर ने प्रशंसकों को झकझोर दिया था

अजहर ने टेस्ट क्रिकेट में आगाज तीन टेस्टों में तीन लगातार शतक लगाने के साथ किया था लेकिन उनके इस फैसले ने देशभर के प्रशंसकों का दिल जरूर तोड़ दिया था

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: February 8, 2019, 5:12 PM IST
फिक्सिंग नहीं इस कदम से अजहर ने प्रशंसकों को झकझोर दिया था
मोहम्मद अजहरुद्दीन (image: Facebook)
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: February 8, 2019, 5:12 PM IST
31 दिसंबर 1984 को एक लाख दर्शकों से खचाखच भरे ईडन गार्डन पर जब टेस्ट मैच शुरू हुआ, तो तनाव और विवादों की परतें भी लिपटी हुईं थीं. कपिलदेव पहली बार भारतीय टीम से बाहर कर दिए गए थे. लोग नाराज थे. कप्तान सुनील गावस्कर को हूट कर रहे थे. पिछला टेस्ट दिल्ली टीम हार चुकी थी. एक बात और थी. गावस्कर को टीम में एक ऐसे युवा खिलाड़ी को खिलाना पड़ रहा था, जो उनकी मर्जी से टीम में नहीं आया था. शायद वो उसे टीम में चाहते भी नहीं चाहते थे. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के चीफ सेलेक्टर चंदु बोर्डे ने आश्वस्त किया कि ये क्रिकेटर सच में कमाल का है. वो क्रिकेटर थे मोहम्मद अजहरुद्दीन.

ईडेन गार्डन अगर खचाखच भरा हो तो किसी कोलोसियम सा लगता है. उसका कोलाहल जादुई होता है. बोर्डे ने गावस्कर की मर्जी के बगैर जिस युवा हैदराबादी अजहर टीम के लिए चुना था, वो 20 साल के थे. गावस्कर को ये उम्र टेस्ट क्रिकेट के लिहाज से कम लग रही थी. बोर्डे ने भरोसा दिया, मैने अजहरुद्दीन की बैटिंग और एथलेटिक फील्डिंग देखी है, वो निराश नहीं करेगा.

किस्मत मेहरबान थी
भारत के चार विकेट गिरने के बाद अजहर खेलने आए, तब स्कोरबोर्ड पर भारतीय टीम के खाते में बमुश्किल सौ रनों के आसपास जुड़ पाए थे. इंग्लैंड के ऑफ स्पिनर पैट पोकोक की गेंद पर वो स्टंप हो सकते थे लेकिन विकेटकीपर पाल डांटन मौका गंवा दिया. अजहर बच गए. एक और जीवनदान मिला. यानि किस्मत भी मेहरबान थी.





फिर तो अजहर की कलाइयों ने स्ट्रोकप्ले का वो जादू दिखाया कि ईडन गार्डन थिरकने लगा. हर शाट एक लय की तरह बैट से निकलता. ईडन गोर्डन झूमने लगता. उन्होंने रवि शास्त्री के साथ मिलकर बड़ी पार्टनरशिप की. साथ ही पहले टेस्ट में पहला शतक ठोक दिया. ये बहुत खास उपलब्धि थी. लेकिन ये जादू यहीं नहीं रुकना था.

ये भी शायद किस्मत ही थी
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अब हमें उस मैच की ओर लौटना होगा, जिसने अजहर के लिए टेस्ट क्रिकेट के दरवाजे खोले. रणजी ट्रॉफी में बेहतरीन प्रदर्शन के चलते उन्हें दौरे पर आई इंग्लैंड टीम के खिलाफ फर्स्ट क्लास मैच में खेलने का मौका मिला. मैच अहमदाबाद में होना था. भारतीय युवा टीम के कप्तान थे रवि शास्त्री.
मैच से ठीक पहले अजहर के पास तार पहुंचा-नाना की हालत गंभीर. वो तुरंत नाना के पास हैदराबाद लौटना चाहते थे. इस बीच रवि शास्त्री ने हैदराबाद फोन मिलाया. पता चला कि अजहर के नाना का तो इंतकाल हो चुका है.

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नाना यानी अजहर के लिए सबकुछ
अजहर के लिए नाना कितना मायने रखते थे, इसका भी किस्सा है. तब वो महज 40 दिनों के थे, जब हेडमास्टर नाना ने उन्हें वालिद से अनुरोध करके अपने पास रख लिया था. अजहर को तब से लेकर युवावय तक नाना के पास ही पले. नाना दोस्त, मार्गदर्शक ही नहीं सबकुछ थे. जब अजहर साइकिल से मैच खेलने पहुंचते थे तो कुछ देर बाद नाना भी वहां आकर मैच देखते.

जब अजहर शहर के बाहर की मैच खेलने जाते थे तो नाना हमेशा स्टेशन छोड़ने आते. 84 में जब बल्ला निर्माता कंपनी साइमंड्स ने पहली बार 5000 रुपए देकर उनसे करार किया तो दो बैट भी दिए. नाना ने एक बैट उठाया और कहा, ये ज्यादा बेहतर है. लंबे समय तक अजहर उसी बैट को लकी मानते रहे.

नाना के निधन की खबर रवि शास्त्री ने छिपाई थी
रवि शास्त्री को जब अजहर के नाना के इंतकाल की बात पता चली तो वो शॉक्ड जरूर हुए लेकिन ये बात अजहर को नहीं पता लगने दी. उल्टे मैच से पहले उन्हें घुट्टी पिलाई कि हो सकता है कि ये मैच उनके जीवन का सबसे अहम मैच साबित हो. अजहर ने उस मैच में 155 रनों की पारी खेली. इसी के बल पर उनका सेलेक्शन भारतीय टीम में हुआ.

हैदराबादी बच्चों की तरह उनके क्रिकेट की शुरुआत भी गलियों से हुई. मामा लोकल क्रिकेट में खेलते थे, लिहाजा घर में कई बल्ले थे. जब वो स्कूल गए तो क्रिकेट का शौक बढ़ता गया. वो ऐसे खिलाड़ी बन गए, जो हर मैच में हॉफसेंचुरी लगाए बगैर नहीं लौटता था.

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टेस्ट के लिए उधार की किट और हेलमेट
पहले टेस्ट में अजहर ने अपने एक हैदराबादी दोस्त से हेलमेट उधार लेकर पहना, हालांकि ये थोड़ा बड़ा था. किट भी वो किसी से उधार लेकर आए थे. राजदीप सरदेसाई अपनी किताब डेमोक्रेसी इलेवन-द ग्रेट इंडियन क्रिकेट स्टोरी में लिखते हैं, भारतीय टीम के उस जमाने के क्रिकेटर उन्हें पीछे रहने वाले और शांत शख्स के तौर पर याद करते हैं, चेहरे पर हमेशा एक शर्माहट भरी मुस्कुराहट. लेकिन शायद ही कभी कुछ बोलने वाला. जो भी बोलता था वो उनका बल्ला ही.

पहले तीन टेस्ट और तीन शतक
हां,मैने पीछे लिखा कि पहले टेस्ट में पहला शतक तो महज शुरुआत थी, उन्हें यहां नहीं रुकना था. चेन्नई के अगले टेस्ट में उन्होंने फिर शतक लगाया. कानपुर टेस्ट में लगातार तीसरा शतक. उन्होंने वो उपलब्धि हासिल कर ली, जो पहले किसी भारतीय क्रिकेटर के हिस्से में नहीं आई थी. पहले तीन टेस्ट मैचों में लगातार तीन शतक.

अजहर आज भी मानते हैं कि शायद उनके नाना की आत्मा ही उन्हें आगे बढ़ा रही थी. हालांकि उनके पास गावस्कर जैसी तकनीक नहीं थी और ना ही गुंडप्पा विश्वनाथ सरीखी कलात्मकता लेकिन अपनी ही एक अलग स्टाइल थी. लेकिन बाद के बरसों में उन्होंने खुद को बेहतर किया और देश के बेहतरीन बल्लेबाजों में शुमार किए जाने लगे.



किस्मत कनेक्शन बार बार
कहते हैं ना कि किस्मत का भी एक रोल होता है. कहना चाहिए कि किस्मत ने अजहर के करियर में काफी जगह अहम भूमिका अदा की. कुछ समय बाद गेंदबाजों ने उनकी कमियां ढूंढ लीं. टेस्ट क्रिकेट में उन्हें रनों के लाले पड़ने लगे.

वन-डे में बल्ला ठीक चल रहा था. फील्डर के तौर पर वो एक्सीलेंट थे. जब 1989 के पाकिस्तान के दौरे में कराची टेस्ट में खराब प्रदर्शन के कारण उनका टीम से बाहर होना तय हो गया. तभी रमन लांबा को चोट लग गई और अजहर फिर टीम में थे.

मियां कप्तान बनोगे
कप्तानी भी उन्हें कमोवेश किस्मत से ही मिली. 1989 में जब छह बड़े भारतीय क्रिकेटरों ने जब बीसीसीआई के खिलाफ विद्रोह किया तो बोर्ड के अध्यक्ष राजसिंह डूंगरपुर ने उनसे पूछा, मियां कप्तान बनोगे. अजहर समझ ही नहीं पाए कि उनके आगे थाली परोसी जा चुकी है.

पहले कुछ टेस्टों में कप्तान के बतौर पर वो बुरी तरह फेल हुए. जब ये तय हो गया कि उनकी जगह कपिलदेव को दोबारा कप्तान बनाया जाएगा, तब टीम मैनेजर अजित वाडेकर ने सुझाव दिया कि उन्हें एक मौका और दिया जाए. किस्मत ने फिर अजहर का साथ दिया. सफलता ने उनका हाथ पकड़ लिया. वो अब भारत के सफल कप्तानों में शामिल किए जाते हैं.



क्या रूतबा था कप्तान के रूप में
90 के दशक में वो ऐसे ताकतवर भारतीय क्रिकेट कप्तान बन गए, जिनके इशारों पर बीसीसीआई नाचने लगा. एक बड़ी मीडिया की फौज उनके इर्दगिर्द मंडराती थी. वैसा औरा उनके बाद शायद ही किसी कप्तान का रहा हो, वो भी तब जबकि टीवी मीडिया कमोवेश शुरुआती दौर में था. हालांकि ये वो दशक भी था जब विवादों की कई रस्सियां उन्हें जकड़ने लगी थीं.

पारिवारिक जीवन टूट रहा था. संगीत बिजलानी से अफेयर की खबरें आने लगीं थीं. मैच फिक्सिंग के आरोप दबी जुबान से लगने लगे थे. आखिरकार फिक्सिंग के आरोपों ने कुछ ऐसा टर्न लिया कि वो टीम से बाहर ही नहीं हुए बल्कि आजीवन प्रतिबंधित कर दिए गए. हालांकि बाद में कोर्ट ने उन्हें आरोपमुक्त कर दिया. हालांकि बीसीसीआई ने आज भी उनसे दूरी बनाई हुई है, वो उन्हें शायद ही किसी फंक्शन में बुलाता हो.

नौरीन से शादी और खुशनुमा जीवन
अब अजहर के पारिवारिक पक्ष की ओर चलते हैं. जून 1995 में अजहर ने खलीज टाइम्स को इंटरव्यू दिया, मेरे लिए सबसे यादगार क्षण वो है, जब 1987 में मेरा निकाह हुआ. मैं और नौरीन दोनों शादीशुदा जीवन में खुश हैं. लेकिन इस इंटरव्यू के ठीक एक साल बाद यानि जून 1996 तक दोनों की जिंदगी बदल चुकी थी. अजहरुद्दीन की जिंदगी में संगीता बिजलानी एंट्री ले चुकीं थीं. नौरीन से नौ साल पुराना वैवाहिक रिश्ता दरक गया था.

1987 में नौरीन का निकाह अजहर से हुआ था. तब तक अजहर पूरे देश के हरदिल अजीज क्रिकेटर बन चुके थे. नौरीन घर के पास रहती थी. अजहर उन्हें पसंद करते थे. वो तब 16 साल की थीं. अजहर चाहते थे कि नौरीन से शादी बस चट-पट हो जाए. धूमधाम से शादी हुई. शादी के बाद जल्दी ही वह दो प्यारे प्यारे बेटों की मां बनीं. अजहर को तब अपनी बेगम दुनिया में सबसे निराली और खूबसूरत लगती थी. खूबसूरत तो नौरीन थी हीं. इसी पर तो रीझकर अजहर ने उनसे निकाह रचाया था.



अजहर को तब आज्ञाकारी बेटा, आदर्श पति और स्नेहिल पिता के मिसाल की तरह पेश किया जाता था. नौरीन हमेशा बच्चों और सास-ससुर की सेवा में व्यस्त रहती थीं. हालांकि कभी कभार उन्हें शौहर के साथ विदेशी दौरों में साथ जाने का मौका भी मिला.

कैसे संगीता से शुरू हुआ रोमांस
संगीता कैसे अजहर के जीवन में आईं, ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन माना जाता है कि किसी एड की शूटिंग के दौरान जब दोनों ने साथ-साथ काम किया, तब दोनों में नजदीकियां बढ़नी शुरू हुईं. वह फिल्मों में सफल नहीं हो पाईं थीं लेकिन सफल मॉडल जरूर थीं. सलमान खान से इश्क के कारण भी वो चर्चाओं में आ चुकी थीं.

दरअसल अजहर के साथ एक एड फिल्म में काम के दौरान दोनों का रोमांस शुरू हुआ.
फिर ये हालत हो गई कि अजहर ने संगीता के चक्कर में हैदराबाद आना बंद कर दिया. वो संगीता के साथ पार्टियों में दिखने लगे. इंतिहा तब हो गई जब वर्ष 1996 के इंग्लैंड के दौरे में अजहरुद्दीन माशूका संगीता को साथ ले गए. वो उन पर शादी का दबाव बढा रही थीं. आखिरकार एक दिन अजहर ने नौरीन के ख्वाबों को चूर चूर करते हुए तलाक दे दिया. जिस दिन ये खबर फैली, उस दिन असल में उनके प्रशंसकों का दिल उनसे जरूर टूटा था.  अजहर के माता-पिता अंत तक नौरीन का साथ देते रहे.

जीवन में लगा ये आघात 
संगीता बिजलानी के साथ अजहर का जीवन बहुत सुखी नहीं रहा. कुछ सालों बाद उनमें तलाक भी हुआ. अजहर का नाम बैडमिटंन स्टार ज्वाला गट्टा से भी जुड़ा, हालांकि अजहर ने इसका खंडन किया. कुछ साल पहले उन्हें जबरदस्त आघात लगा जबकि उनके बड़े बेटे का निधन बाइक एक्सीडेंट में हो गया. उसने उन्हें करीब करीब तोड़ ही डाला.

क्रिकेटर से पॉलीटिशियन
वर्ष 2009 में जब अजहर ने मुरादाबाद में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा, ये वो दौर था जब उत्तर प्रदेश से कांग्रेस का जनाधार बुरी तरह खिसक चुका था लेकिन इसके बाद भी वो वहां 40,000 वोटों से जीते. मुरादाबाद में जब वो चुनाव लड़ने आए तो उन्हें देखने के लिए हर जगह भीड़ जुटती थी. कुछ समय पहले कांग्रेस ने उन्हें तेलंगाना में पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है. माना जा रहा है कि अबकी बार वो लोकसभा का चुनाव हैदराबाद से सटी सिकंदराबाद सीट से लडेंगे.

अब आगे bcci
अजहर का जीवन फिलहाल तेलंगाना की सियासी राहों पर चलता हुआ लग रहा है. बड़ा कारोबार है. पैसे की कमी नहीं. उनका छोटा बेटा अब गोवा की रणजी टीम से खेल रहा है.

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