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कैसे बनी थी चंद्रमा की सबसे ऊपरी परत, मैग्मा का महासागर था जिम्मेदार

कैसे बनी थी चंद्रमा की सबसे ऊपरी परत, मैग्मा का महासागर था जिम्मेदार

चंद्रमा (Moon) की पर्पटी बनने का काम 4.3 से 4.5 अरब साल पहले बनना शुरू हुआ था.  (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

चंद्रमा (Moon) की पर्पटी बनने का काम 4.3 से 4.5 अरब साल पहले बनना शुरू हुआ था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

चंद्रमा (Moon) के निर्माण की प्रक्रिया के बारे में एक शोध ने नई जानकारी दी है. इस अध्ययन में एक प्रतिमान के जरिए बताया है क्रिस्टलीकरण (Crystallization) की अलग प्रक्रिया उसी माहौल में हुआ करती थी जोउसके निर्माण के समय पर्पटी (Crust o Moon) बनने के दौरान हुआ करता था. इससे इस बारे में भी पता चल सकता है कि चंद्रमा की जो आज भूगर्भीय स्थिति है वह कैसे निर्मित हुई थी और उसमें किन कारकों का योगदान था.

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    पृथ्वी के निर्माण का इतिहास (History of Earth)  हमारे वैज्ञानिकों के सवालों का जवाब दे सकता है. पृथ्वी पर चंद्रमा (Moon) का बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है इसलिए इसके इतिहास का भी वैज्ञानिक उतनी गहराई से अध्ययन करते हैं जितना पृथ्वी के इतिहास का. चंद्रमा के निर्माण और उसका आज की अवस्था में पहुंचना अध्ययनों का एक प्रमुख विषय है. एक नए अध्ययन ने चंद्रमा की पर्पटी (Crust of the Moon) के निर्णाण प्रक्रिया में रोशनी डाली है. इस अध्ययन के जरिए नए प्रतिमान द्वारा बताया गया है कि यह प्रक्रिया चंद्रमा की सतह पर किस तरह से काम रही थी जिससे उसकी पर्पटी का निर्माण हो सका.

    तरल मैग्मा और क्रिस्टल
    कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और इकोल नॉर्मेल सुपिरियोर डि लियोन के वैज्ञानिकों ने एक क्रिस्टलीकरण के एक नए प्रतिमान का प्रस्ताव दिया है जिसके मुताबकि क्रिस्टल तरल मैग्मा में करोडों सालों तक पड़े रहते हैं और ऐसा ही चंद्रमा की पर्पटी के साथ भी हुआ जिसमें मैग्मा जमकर ठोस हो गया था.

    क्रस्टलीकरण का प्रतिमान
    जियोफिजिकल रीव्यू लैटर्स में प्रकाशित इस अध्ययन में बताया गया है कि चंद्रमा की पर्पटी के निर्माण में क्रिस्टलीकरण के इस रूप की प्रमुख भूमिका थी. पचास साल पहले अपोलो 11 के चंद्रमा पर गए यात्रियों ने वहां की जमीन से कुछ नमूने जमा कर अपने साथ पृथ्वी पर लाने का काम किया था.

    खास तरह की चट्टानें
    चंद्रमा का यह बड़ा पीला से इलाका  पृथ्वी से भी बिना दूरबीन के दिखाई देता है. यहां की चट्टानें एनोर्थोसाइट कहलाती हैं जो हलकी चट्टानें मानी जाती हैं. बताया जाता है कि ये एनोर्थोसाइट चट्टानें चंद्रमा के इतिहास में 4.3 से 4.5 अरब साल पहले बनी थीं. इसी तरह से मैग्मा के क्रिस्टलीकरण से बने एंथ्रोसाइट पृथ्वी के जीवाश्म मैग्मा में भी देखे जा सकते हैं.

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    एक समय पूरा का पूरा चंद्रमा (Moon) मैग्मा का ही महासागर हुआ करता था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    दो भ्रूण ग्रहों के टकराव
    चंद्रमा पर बड़े पैमाने पर एनोर्थोसाइट का बनना तभी संभव हो सकता है कि जब वहां भारी मात्रा में वैश्विक मैग्मा महासागर हो. वैज्ञानिक मानते हैं कि चंद्रमा तब बना था जब दो भ्रूण अवस्था के ग्रह जिन्हें प्रोटोप्लैनेट टकराए थे. इन दो प्रोटोप्लैनेट में से बड़ा वाला पृथ्वी ग्रह में बदल गया था और छोटा वाला चंद्रमा बन गया.

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    पहले से माना जा रहा था
    इस टकराव का एक नतीजा यह रहा कि वह नया चंद्रमा बहुत ही ज्यादा गर्म था. वह इतना गर्म था कि इसका पूरा मैंटल तक पिघला हुआ मैग्मा था यानि वह मैग्मा का महासागर था. इकोल नॉर्मेल सुपिरियोर डि लियोन से इस अध्ययन के सहलेखक कोले मिशॉ ने बताया कि अपोलो युग से ही यह माना जा रहा था कि चंद्रमा की पर्पटी हलके एनोर्थोसाइट क्रिस्टल से बने होंगे जो मैग्मा महासागर की सतह पर तैर रहे होंगे.

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    नासा के अपोलो अभियान से लाए गए नमूनों (Samples) से चंद्रमा की चट्टानों का अध्ययन शुरू हुआ. (तस्वीर: NASA)

    अलग अलग मिश्रण वाले एनोर्थोसाइट
    यह तैरने वाला प्रतिमान इस  बात की व्याख्या करता है कि चंद्रमा की उच्च भूमि कैसे बनी होगी. लेकिन अपोलो अभियानों से बहुत सारे चंद्रमा के उल्कापिंडों और चंद्रमा की सतह का अध्ययन हुआ है. एनोर्थोसाइट मूल अपोलो नमूनों की तुलना में सरंचना के लिहाज से ज्यादा विषम तरह से मिश्रित रहे होंगे. इससे तैरने वाली अवधारणा का विरोधाभास होता है, जहां सभी एनोर्थोसाइट का साझा स्रोत तरल महासागर माना जाता है.

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    जहां एनोर्थोसाइट की उम्र 20 करोड़ साल पहले के आसपास की है, वहीं तरल मैग्मा का महासागर 10 करोड़ साल पुराना बताया जाता है. यही वजह थी की पर्पटी के निर्माण की दूसरी प्रक्रिया के तहत होने पर विचार किया गया. इसी को सुलझाने के लिए यह नया गणितीय प्रतिमान बनाया गया. जिसके तहत क्रिस्टल लंबे समय तक मैग्मा में ही सस्पेंशन के तौर पर पड़े रहे.जहां सतह पर क्रिस्टल ज्यादा मात्रा में थे जिससे सतह पर इतनी विविधता दिखती है.

    Tags: Earth, Moon, Research, Science, Space

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