चंद्रमा से पृथ्वी का संचार होगा आसान नासा के अभियानों को मिलेगी मदद

चंद्रमा (Moon) पर इंसानों के बसने में पृथ्वी और उसके बीच संचार की अहम भूमिका होगी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

नासा (NASA) के अंतरिक्ष अभियानों के लिए ऑस्ट्रेलिया ने शोधकर्ताओं ने खास तकनीक विकसित की है जो चंद्रमा (Moon) और पृथ्वी (Earth) के बीच बेहतर संचार प्रदान करेगी.

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    चंद्रमा (Moon) पर इंसान को बसाने की तैयारी जोरों पर है. नासा (NASA) जहां तीन साल बाद चंद्रमा पर दो लोगों को भेजने के साथ ही वहां बेसकैम्प बनाने की तैयारी में है तो चीन और रूस भी 2036 चंद्रमा पर इंटरनेशनल लूनार रिसर्च स्टेशन शुरू करने का रोडमैप जारी कर चुके हैं. इसी बीच चंद्रमा रहने के लिए कई चुनौतियों का हल खोजा जा रहा है. ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं का एक प्रोजोक्ट अपने ऑप्टिकल संचार तकनीक (Communication Technology) का इस्तेमाल नासा के आर्टिमिस कार्यक्रम  जैसे अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष अन्वेषण अभियानों के लिए किया जाएगा.

    नासा को मिलेगा सहयोग
    यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की अगुआई में फ्यूग्रो ऑस्ट्रेलिया के साथ साझेदारी में हुए इस प्रोजेक्ट को ऑस्ट्रेलियन स्पेस एजेंसी का सहयोग मिला है. ऑस्ट्रेलियन स्पेस एजेंसी के डिमॉन्स्ट्रेटर कार्यक्रम के जरिए यह ऑस्ट्रेलियन ऑप्टिकल कम्यूनिकेशन नासा को आर्टिमिस और उसके आगे कार्यक्रमों में सहयोग करेगा.  इसके तहत पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में नए ऑप्टिकल संचार स्टेशन लगाए जाएंगे जिससे पृथ्वी और चंद्रमा के बीत ज्यादा सटीक और स्पष्ट संचार संभव होगा.

    पहले रेडियो संचार पर थी निर्भरता
    यूडब्ल्यूए इंटरनेशनल स्पेस सेंटर के सदस्य डॉ शेडिवी का कहना है कि यह अंतरिक्ष प्रकाशीय संचार अंतरिक्ष अन्वेषण में बहुत उपयोगी साबित होगा. अपोलो युग में पृथ्वी और चंद्रमा के बीच संचार रेडियो संचार पर निर्भर था, लेकिन प्रकाशीय संचार रेडियो संचार से सैकड़ों गुना बेहतर साबित हुआ है.

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    इससे पहले अपोलो अभियानों में रेडियो संचार (Radio communication) का उपयोग हुआ था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


    बहुत तेजी से होगा सूचनाओं का आदान प्रदान
    प्रकाशीय संचार बहुत अधिक डेटा दरों को संभव बना देते हैं. इससे 4K लाइव फुटोज की लैंडिंग को संभव बना देंगे यह भविष्य की संचार तकनीक है. यूडब्ल्यूए इंटरनेशनल स्पेस सेंटर के प्रमुख डेनायल ओब्रेश्काउ का कहना है कि यह प्रोजेक्ट नए सेंटर की विशेषज्ञता और स्रोतों का उपयोग करेगा.

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    इस स्तर पर हो रहा है तकनीकों पर काम
    ओब्रेश्काउ ने बताया कि इस साल शुरू हुए इंटरनेशनल स्पेस सेंटर में 12 रिसर्च नोड, 150 शोधकर्ताल और 20 पीएचडी छात्र हैं जो व्यापक स्तर की राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्राथमिकताओं पर काम कर रहे हैं जिसमें प्रकाशीय संचार तकनीकें भी शामिल हैं. वैज्ञानिक कठोर वातारवण में इंसान का काम करने की क्षमता, दैनिक जीवन की संचार तकनीकों और नए ऊर्जा स्रोत पर भी काम कर रहे हैं.

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    पृथ्वी (Earth) का वायुमंडल रेडियो को बाधित कर सकता है. (फाइल फोटो)


    संचार तकनीक का महत्व
    संचार तकनीक किसी भी अंतरिक्ष अभियान का सबसे अहम हिस्सा है क्योंकि बिना संचार के वह अभियान कितना भी उन्नत क्यों ना हो, बेकार ही रह जाएगा. अब जबकि इंसान चंद्रमा ही नहीं मंगल जैसे ग्रह पर भी लंबी उपस्थिति की तैयारी में लगा हुआ है. ऐसे में प्रकाशीय संचार ही सबसे अहम साबित होगा.

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    सुदूर अंतरिक्ष से संकेत आने में समय लगता है. जैसे जैसे दूरी बढ़ती जाएगी यह समय बढ़ता ही जाएगा. ऐसे में प्रकाशीय संचार तकनीक रेडियो तकनीक से ज्यादा उपयुक्त होगी. वहीं पृथ्वी का वायुमंडल भी रेडियो संकेतों को बाधित करता है. ऐसे में चंद्रमा से आने वाले रेडियो संकेत सटीक और सही सलामत हासिल करना आसान नहीं होगा. प्रकाशीय संचार इसका सबसे अच्छा हल  है क्योंकि प्रकाश को पृथ्वी तक पहुंचने में कोई बाधा नहीं होती है. इसलिए भविष्य प्रकाशीय संचार का है.

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