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चांद पर क्रेटर की संख्या से कहीं ज्यादा हुए थे क्षुद्रग्रह टकराव- जानिए कैसे

चंद्रमा (Moon) के क्रेटर की संख्या वैज्ञानिकों के इतिहास के आंकलन से मेल नहीं खाती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

चंद्रमा (Moon) के क्रेटर की संख्या वैज्ञानिकों के इतिहास के आंकलन से मेल नहीं खाती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

चंद्रमा (Moon)के बारे में अहम शोध में पता चला है कि वहां पर जितने क्रेटर (Craters) हैं उससे कहीं ज्यादा क्षुद्रग्रह (Asteroids) उस पर गिरे हैं. इसमें चंद्रमा के इतिहास की समयरेखा का अहम भूमिका है.

  • News18Hindi
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    चांद (Moon) पर दाग पृथ्वी तक से दिखाई देते हैं. यह उस पर बने बहुत सारे क्रेटर (Craters) की वजह से बने हैं. अपने 4.5 अरब साल के इतिहास में गिरे उल्कापिंड, क्षुद्रग्रह (Asteroids) आदि ने यहां पर इन क्रेटरों को बनाया है. नए अध्ययन में बताया गया है कि चंद्रमा की सतह पर आज जितने क्रेटर दिखते हैं उससे कहीं ज्यादा क्षुद्रग्रह यहां पर गिर चुके हैं. इस शोध का कहना है कि कई पुरातन और शुरुआती टकराव के निशान चंद्रमा की सतह पर लगभग दिखाई ही नहीं देते हैं, क्योंकि ये टकराव नर्म सतह पर हुए थे.

    नर्म सतह की वजह से नहीं बने निशान
    शोधकर्ताओं का कहना है कि चंद्रमा के युवाकाल में पूरे उपग्रह पर मैग्मा का सागर फैला हुआ था जो ठंडा होकर ठोस बन गया. जबकि चंद्रमा की सतह पर तो क्षुद्रग्रह या उलका तो तब भी गिर रहे थे, जब मैग्मा ठंडा नहीं  हुआ था. इसी वजह से सभी टकराव से क्रेटर बनने की संभावना नहीं थी. सॉफ्ट लैंडिंग के कारण इन टकरावों के कोई निशान नहीं बन सके. यही वजह है कि जैसा चंद्रमा आज दिखाई देता है, वह उससे मेल नहीं खाता जो करीब एक अरब साल पहले के आसपास हुआ करता था.

    अलग अलग क्रेटर
    नेचर कम्यूनिकेशन्स में प्रकाशित इस अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता और ऑस्ट्रेलिया की कर्टिन यूनिवर्सिटी की ग्रह वैज्ञानिक कैटरीना मिल्ज्कोविक बताती हैं, “ये विशाल टकारव क्रेटर, प्राय टकराव बेसिन बताए जाते हैं जो चार अरब साल पहले चंद्रमा के मैग्मा महासागर के ठोस बनने की प्रक्रिया से बने थे. लेकिन अगर ऐसा होता तो ये क्रेटर उनकी तुलना में  अलग ही तरह के दिखाई देते जो चंद्रमा के भूगर्भीय इतिहास में बाद में बने.

    अलग अलग तरह के प्रमाण
    चंद्रमा पर वैश्विक मैग्मा महासागर का विचार नया नहीं  हैं, लेकिन शोधकर्ताओं ने मैग्मा और क्षुद्रग्रह टकराव के इतिहास का गहराई से अध्ययन किया और उनकी समय रेखा बनाने का प्रयास किया. जिसमें, जो हम जानते हैं, उसका समावेश करने का भी प्रयास किया. चंद्रमा पर उनके निर्माण के बाद क्या क्या हुआ, उसके बारे में सोलर सिस्टम मॉडलिंग से लेकर अपोलो अभियान में लाए गए नमूनों की चट्टानों पर एविडेंस इंपैक्ट शॉक्स तक से बहुत सारे संकेत मिलते हैं.

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    चंद्रमा (Moon) पर क्षुद्रग्रह के टकराव के क्रेटरों की संख्या ज्यादा है, लेकिन क्षुद्रग्रह उससे कहीं अधिक संख्या में टकराए थे. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    मैग्मा सागर का समय
    कई अध्ययन बताते हैं कि मैग्मा की उबलती झीलें चंद्रमा पर करीब 20 करोड़ साल पहले तक रही होंगीं और यह शोध दर्शाता है कि कैसे यह धारणा उन तरीखों के साथ मेल खाती है, जब शुरुआत में विशाल क्षुद्रग्रह के टकराव हुए होंगे. अलग अलग अध्ययनों में चंद्रमा के मैग्मा के महासागरों के ठोस बनने का समय अलग है. लेकिन यह इतिहास में इतने ज्यादा समय तक भी हो सकता है जब सौरमंडल के इतिहास में शुरुआती टकराव हुए थे.

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    सतह ठोस होने के बाद बने निशान
    मिल्ज्कोविक का कहना है कि उम्र के साथ चंद्रमा की सतह ठंडी हुई और वह कठोर होती गई और टकराव के निशान बनते गए जो रिमोट सेंसिंग से भी पहचानने के योग्य हो गए. यह बहुत अहम है जिससे यह निश्चित करने में मदद मिलती है कि सौरमंडल कैसे बना, जैसा वह है. और वहां से यह भी सीखा जा सकता है कि ग्रह वास्तव में कैसे बने और वे किसी अवस्था में कब तक रह सकते हैं.

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    यह अध्ययन चंद्रमा (Moon) पर होने वाले भावी शोधों के लिए मददगार साबित होगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    कुछ जानकारी पता करना मुश्किल
    इस मामले में कई बातें हैं जिनका पता लगाना मुश्किल है. मसलन चंद्रमा की जानकारी हासिल करते समय पूर्व के आंकलनों में कितने क्षुद्रग्रह की टकारव छूट गए होंगे यह पता नहीं चल सकता है. लेकिन यह जानकारी उन मॉडलों को बेहतर बनाने में मददागर होगी, जो यह बताते हैं कि अरबों साल पहले क्या हुआ था.

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    इतना ही नहीं, चूंकि चंद्रमा पृथ्वी के बहुत ही पास है, वहां जो भी हुआ था उसका असर पृथ्वी पर भी हुआ होगा जिससे हमें इस बारे में बेहतर समझ मिल सकेगी कि हमारा ग्रह और उसमें जीवन कैसे अस्तित्व में आया. मिल्ज्कोविक ने कहा इन पड़ताल की जानकारी भविष्य के उन शोधों में मददगार होगी जो टकराव के पृथ्वी पर हुए प्रभावों पर और उसके उद्भव को समझने के लिए होंगे.

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