हांगकांग में फिर क्यों फूट रहा है चीन के खिलाफ गुस्सा? सड़कों पर क्यों उतरे लाखों लोग?

प्रत्यर्पण संबंधी कानून के​ विरोध में हांगकांग में ऐतिहासिक प्रदर्शन हुआ तो इसके बाद चीन को बैकफुट पर तो आना पड़ा है लेकिन अभी स्थिति साफ नहीं है. जानिए क्यों चीन के खिलाफ हांगकांग में होते रहे हैं विरोध प्रदर्शन.

News18Hindi
Updated: June 10, 2019, 4:28 PM IST
हांगकांग में फिर क्यों फूट रहा है चीन के खिलाफ गुस्सा? सड़कों पर क्यों उतरे लाखों लोग?
हॉंगकॉंग की सड़कों पर हुआ ऐतिहासिक प्रदर्शन.
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Updated: June 10, 2019, 4:28 PM IST
हांगकांग में एक बार फिर चीन के खिलाफ गुस्सा फूटा, तो लाखों लोग सड़कों पर उतर आए. पहले भी लाखों लोग हांगकांग में सड़कों पर उतकर प्रदर्शन कर चुके हैं, लेकिन इस बार का आंकड़ा इसलिए हैरतअंगेज़ था कि पिछले सबसे बड़े प्रदर्शन के मुकाबले करीब दोगुने लोग सड़कों पर थे, जिन्हें खदेड़ने और काबू करने में प्रशासन के पसीने छूट गए. आपको हैरत होगी ये जानकर कि चीनी नीतियों का समर्थन करने वाले एक कानून को लोकतंत्र के लिए खतरा बताते हुए दस लाख से ज़्यादा लोग हांगकांग की सड़कों पर उतर आए.

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हांगकांग की कुल आबादी 74 लाख से कुछ ज़्यादा है. साल 1997 में हांगकांग को चीन के सुपुर्द कर दिया गया था. इसके बाद से बीते रविवार को हुआ ये प्रदर्शन सबसे बड़ा रहा. आयोजकों की मानें तो 10 लाख से ज़्यादा लोग सड़कों पर उतरे और उन्होंने नए प्रत्यर्पण कानून का मुखर विरोध किया. हालांकि पुलिस का कहना है कि 2 लाख 40 हज़ार के करीब प्रदर्शनकारी सड़कों पर थे.

इससे पहले भी हांगकांग में बड़े प्रदर्शन हो चुके हैं. इनमें से एक 2014 में हुआ अंब्रेला आंदोलन था जिसमें भी लाखों लोग सड़कों पर उतरे थे, लेकिन खबरों की मानें तो इस प्रदर्शन से बहुत बड़ी संख्या में नागरिक हालिया प्रदर्शन में शामिल हुए. इसकी एक वजह तो ये है कि अंब्रेला प्रदर्शन में मुख्यत: छात्र वर्ग शामिल था जबकि ताज़ा प्रदर्शन में कारोबारी लोग, मध्यम वर्ग, मध्यम आयु वर्ग और पहली बार प्रदर्शन में शामिल हो रहे लोग यानी बहुत बड़ी आबादी शामिल रही.

प्रत्यर्पण कानून क्या है? जिसका विरोध हो रहा है
हांगकांग में जिस कानून के विरोध के लिए घंटों तक ये प्रदर्शन हुआ, उसके मुताबिक चीन को ये अधिकार ​होगा कि वह हांगकांग के किसी भी पलायक नागरिक यानी किसी और देश के नागरिक का प्रत्यर्पण कर सके. इस कानून को मानव अधिकारों और लोकतंत्र के लिए खतरा माना जा रहा है क्योंकि ताइवान समेत यूएन, अमेरिका और कई नामचीन संस्थाएं इस कानून के बारे में चीन को पहले ही चेता चुकी थीं.



इस विशाल विरोध प्रदर्शन के बाद नीति निर्माताओं ने कहा है कि अभी ये कानून लागू नहीं किया गया है और इसके दूसरे ड्राफ्ट की तैयारी चल रही है. दूसरे ड्राफ्ट के बाद इस पर बहस करवाई जाएगी और लोगों के हित में कानून बनने के बाद ही इसे लागू किया जाएगा. लेकिन, विशेषज्ञों का मानना है कि इस कानून के बाद नागरिकों की सुरक्षा और उनकी सुनवाई की गारंटी नहीं होगी और चीन अपनी मनमानी करते हुए प्रत्यर्पण करने का अधिकार हथिया लेगा.

पहले भी हांगकांग में हुए हैं ऐतिहासिक प्रदर्शन
साल 2003 में दंगा संबंधी कानून के विरोध में यहां एक बड़ा प्रदर्शन हुआ था. दंगा संबंधी कानून के तहत प्रावधान था कि चीन के खिलाफ किसी भी किस्म का दंगा भड़काने, साज़िश करने या द्रोह करने पर दोषी को उम्र कैद तक हो सकती थी. इस कानून के विरोध में करीब 5 लाख लोग सड़कों पर उतरे थे और इसका असर ये हुआ था कि इस कानून को रद्द करना पड़ा था.

इसके बाद 2014 के अंब्रेला आंदोलन में कुछ हज़ार लोग सड़कों पर उतरे थे लेकिन आखिरकार ये आंदोलन नाकाम हो गया था क्योंकि इसे नागरिकों के बड़े वर्ग का समर्थन नहीं मिला था. हालांकि ये आंदोलन भी लोकतंत्र के बचाव के नाम पर था. इस बार प्रत्यर्पण कानून मसौदे के खिलाफ हुए आंदोलन को भी 'प्रो डेमोक्रेसी' कहा गया. इस बार दस लाख से ज़्यादा लोगों के समर्थन का दावा किया जा रहा है.

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इस आंदोलन में जुटी भीड़ को देखकर उम्मीद जताई जा रही है कि चीन अपना कदम या तो वापस लेगा या कानून के ड्राफ्ट में भारी फेरबदल करेगा. प्रशासन ने बैकफुट पर आकर इसके संकेत भी दे दिए हैं. वहीं आयोजकों का कहना है कि इस आंदोलन को वो और आगे ले जाने की पूरी कोशिश में हैं.

गौरतलब है कि इसी महीने यानी 4 जून को टायनैनमेन स्क्वायर नरसंहार की 30वीं बरसी मनाने के लिए भी हांगकांग के विक्टोरिया पार्क में लाखों लोग जमा हुए थे. लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को 1989 में बीजिंग स्थित टायनैनमेन स्क्वायर पर मौत के घाट उतार दिया गया था. उस नरसंहार की याद में हर साल मोमबत्ती जलाकर श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाती है. हांगकांग में बीते 4 जून को कैंडल लाइट सभा के लिए पार्क में 1 लाख 80 हज़ार लोग जमा हुए. 2014 के अंब्रेला मूवमेंट के बाद ये मौका था, जब इतनी बड़ी संख्या में लोग जुटे और इसके बाद 9 जून को प्रत्यर्पण कानून के विरोध में ऐतिहासिक प्रदर्शन हुआ.

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