वो खुफिया एजेंसी, जिससे खफा हुआ ईरान, जिसके पास दुनिया के हर लीडर की सीक्रेट फाइल

ईरान नतंज परमाणु संयंत्र पर दो दिन पहले हुए एक हमले के बाद इसे काफी नुकसान पहुंचा है. इसके पीछे इजरायल की खूंखार जासूसी एजेंसी मोसाद का हाथ होने का आरोप लगाया गया है.

ईरान ने इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद पर अपने एटामिक प्लांट पर हमले का आरोप लगाया है. पिछले कुछ सालों में ईरान और खाड़ी के देशों में कुछ भी गड़बड़ होता है तो वो सबसे पहले मोसाद पर ही आरोप लगाते हैं. वैसे मोसाद है भी बहुत खतरनाक

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    दो दिन पहले ईरान के नतंज परमाणु बिजली घर के एक बड़े हिस्से की बिजली अचानक गायब हो गई. सयंत्र को नुकसान पहुंचा. साथ ही ये इलाका भी अंधेरे में डूब गया. इसके बाद ईरान के पब्लिक रेडियो ने आरोप लगाया कि संयंत्र पर इजरायल की जासूसी एजेंसी मोसाद ने साइबर हमला कर उसे नुकसान पहुंचाया है. यूं भी लंबे समय से ईरान और इजरायल के बीच खासा तनाव है. वैसे जो लोग मोसाद से परिचित हैं, उनका मानना है कि वो बहुत खतरनाक और अपने काम में पारंगत खुफिया एजेंसी है.

    हालांकि मोसाद और भारत की जासूसी एजेंसी रा के बीच बहुत अच्छे रिश्ते हैं. रॉ की स्थापना के बाद उसकी शुरुआती ट्रेनिंग में मोसाद की भूमिका काफी ज्यादा थी. वैसे ये कहने में कोई हर्ज नहीं है कि मोसाद दुनिया के किसी भी कोने में कोई भी आपरेशन कर सकती है. वो जहां अपने काम में पारंगत है वहीं दुनिया की तेजतर्रार और खूखार खुफिया एजेंसियों में भी है. पिछले कुछ सालों में ईरान समेत खाड़ी के देशों ने मोसाद पर ना जाने कितनी ही बार अपने देशों में गड़बड़ी या अन्य किस्म के आरोप लगाए हैं.

    किलिंग मशीन भी कहा जाता है मोसाद को
    खुफिया एजेंसी मोसाद को इजरायल की किलिंग मशीन तक कहा जाता है. चारों ओर दुश्मनों से घिरे इस देश की ये एजेंसी अपनी तेजी और खतरनाक ऑपरेशन की वजह से दुनिया की सबसे तेज इंटेलिजेंस भी कही जाती है. इसका मुख्यालय तेल अवीव शहर में है. दिसंबर 1949 को बनी ये एजेंसी देश की नेशनल इंटेलिजेंस एजेंसी हैं, ठीक वैसे ही जैसे भारत की रॉ है.

    दुनिया के किसी भी कोने से खोज निकालते हैं दुश्मनों को
    इस एजेंसी के बारे में कहा जाता है कि इसके एजेंट इतने तेज होते हैं कि दुनिया के किसी भी कोने से अपने दुश्मन को खोज निकालते और उसे खत्म करके ही दम लेते हैं. इसके लिए उनकी खास ट्रेनिंग होती है. ट्रेनिंग से पहले कड़ी परीक्षा होती है.

    मोसाद के ऑपरेशन एंटेबे को खासतौर पर याद किया जाता है (Photo-pikist)


    इस दौरान एजेंसी से जुड़ने के इच्छुक को शरीर के साथ दिल और दिमाग की ताकत भी दिखानी होती है. वैसे तो अरब में दुश्मनों से घिरा हरेक इजरायली अपने-आप में सैनिक होता है लेकिन इस एजेंसी के एजेंट्स की बात कुछ और होती है.

    हर चीज के इस्तेमाल की ट्रेनिंग
    लेपिड, इब्राहिम और अमोस गिल्बोआ की किताब "इजरायल साइलेंट डिफेंडर - ए इनसाइड लुक ऑफ 60 ईयर्स ऑफ इजरायल इंटैलीजेंस" में कहा गया है, "मोसाद के एजेंट हर तरह के हथियार चलाने में ट्रेंड होते हैं. दुनिया के अत्याधुनिक से लेकर ट्रेडिशनल चीजों तक के इस्तेमाल से वे दुश्मन का सफाया कर देते हैं. मोसाद के लिए काम करने वाले एजेंट को पहले ही बता दिया जाता है कि अगर वो पकड़े गए तो इजरायल उन्हें न तो पहचानेगा, न अपनाएगा. उन्हें बरसों तक परिवार से दूर रहना हो सकता है. हालांकि अगर ऑपरेशन में एजेंट मारा जाए तो देश उसे पूरा सम्मान देता है."

    ऑपरेशन एंटेबे क्या है
    वैसे तो कई ऑपरेशनों के लिए मोसाद का जिक्र होता है लेकिन ऑपरेशन एंटेबे को खासतौर पर याद किया जाता है. साल 1976 में युगांडा के हवाईअड्डे पर घुसकर मोसाद ने आतंकियों को मार गिराया था ताकि वो अपहरकर्ताओं की कैद में फंसे 54 नागरिकों को सेफ निकाल सके. इसके लिए उसने कई सारे प्रोटोकॉल तोड़े थे.

    इजरायल चारों ओर से मुस्लिम देशों से घिरा है, जो उससे चिढ़े रहते हैं- सांकेतिक फोटो


    इसी तरह से साल 1972 में मोसाद ने अपने 11 खिलाड़ियों की हत्या का बदला लिया. दो आतंकी संगठनों ने मिलकर इजरायल के खिलाड़ियों की हत्या की थी. इसके तुरंत बाद बदले की मुहिम शुरू हुई जो अगले कई सालों तक चली. हरेक आतंकी को दुनिया के हर कोने से निकालकर मारा गया था.

    मनोवैज्ञानिक लडाई में भी माहिर

    बोर जोहर और माइकल की किताब "मोसाद- दे ग्रेट आपरेशंस आफ इजरायल्स सीक्रेट सर्विस" में इस जासूसी एजेंसी के बारे में बहुत विस्तार से जानकारी दी गई है. सिर्फ हथियार ही नहीं, मोसाद के एजेंट्स को मनोवैज्ञानिक लड़ाई में भी महारत है. वहां साइकोलॉजिकल वारफेयर का पूरा एक विभाग है, जो पक्का करता है कि दुनिया के किस नेता की कौन सी सीक्रेट बात लीक की जाए, जो उनके फेवर में जाए. मोसाद ने ही अमेरिका के पूर्व प्रेसिडेंट बिल क्लिंटन और मोनिका लेविंस्की की बात को रिकॉर्ड कर लिया था. बाद में इसी वजह से पूरे अमेरिका में बदहवासी फैल गई थी.

    दुनिया के हर नेता की खुफिया फाइल
    माना जाता है कि मोसाद के पास दुनिया के हर बड़े और ताकतवर नेता की अलग खुफिया फाइल है. इसमें नेता के बारे में जानकारी के अलावा इसका जिक्र भी रहता है कि किसकी क्या कमजोरी है. जैसे कोई पैसों से बदल जाता है तो किसी के लिए हनीट्रैप काम करता है. इसी आधार पर नेता को फंसाकर उसे ब्लैकमेल किया जाता है.

    अब साइबर वार में एक्सपर्ट
    माना जाता है कि दुनिया की कुछ ही खुफिया एजेंसियां साइबर वार और साइबर आपरेशन में बहुत आगे हैं. उसमें से इजरायल एक है. इसीलिए ईरान ये मान रहा है कि मोसाद ने इजरायल में बैठे बैठे ही उसके एटामिक पावर सेंटर में बहुत बड़ी गड़बड़ी कर दी. हालांकि इसका कोई सबूत नहीं है लेकिन ये माना जा रहा है कि जो कुछ हुआ वो साइबर हमले का ही नतीजा था.

    रॉ और मोसाद का कनेक्शन
    ये मोसाद की ताकत ही है, जिसके कारण भारत ने रॉ के लिए मोसाद से मदद ली थी. साल 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद बाह्य खुफिया एजेंसी की जरूरत देश को महसूस होने लगी थी. तब तक आईबी ही इंटेलिजेंस का काम करता था. लेकिन वो कई जगहों पर उतने बढ़िया तरीके से काम नहीं कर पा रही थी. ये देखते हुए साल 1968 को तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने रॉ का गठन करवाया.

    रामेश्वर नाथ काव इसके पहले डायेक्टर थे. इंदिरा गांधी ने ही तब उन्हें सलाह दी कि वो मोसाद के संपर्क में रहें ताकि प्रशिक्षण मिल सके. तब भी यहूदी बहुल देश होने के कारण इजरायल मुस्लिम देशों के निशाने पर था. और चूंकि भारत को पाकिस्तान का आतंक झेलना पड़ रहा था, लिहाजा इजरायल ने मदद की.

    अब भी बेहतर रिश्ते
    माना जा रहा है कि अब भी दिल्ली में भी रॉ और मोसाद का पक्का संबंध है. मोसाद भारत में अपने ऑपरेशन्स के लिए दिल्ली में सेफ ठिकाने रखता है, जिसमें रॉ उसकी मदद करता है. जम्मू-कश्मीर में सीआरपीएफ के काफिले पर हमले के तुरंत बाद भी इजरायल ने खुफिया बातें निकालने के लिए भारत को तकनीक और ट्रेनिंग की मदद की पेशकश की थी.

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