दुनिया के वे हिस्से, जहां बोतलबंद पानी सबसे महंगा है, ये है वजह

पेयजल की कीमत के आधार पर नॉर्वे का ओस्लो शहर सबसे महंगा है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

पेयजल की कीमत के आधार पर नॉर्वे का ओस्लो शहर सबसे महंगा है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

शुद्ध पेयजल (potable water) के लिए लोगों की बोतलबंद पानी (bottled water) पर निर्भरता बढ़ी है. हालांकि ये काफी महंगे हैं और इसके बाद भी शुद्धता की कोई गारंटी नहीं. यहां तक कि बोतलबंद पानी की आदत पर्यावरण (environment) पर बोझ बढ़ा रही है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 10, 2021, 11:41 AM IST
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वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट ने साल 2019 में दुनिया में पानी के हालात पर पड़ताल की, जिसमें निकलकर आया कि भारत समेत दुनिया के 17 देश, जहां विश्व की कुल आबादी का एक चौथाई हिस्सा है, पानी के गंभीर संकट से गुजर रहे हैं. सर्वे में 198 देशों को पानी की कमी, साफ पानी की कमी, अकाल और बाढ़ के जोखिम के आधार पर क्रम दिया गया. इसके मुताबिक भारत में पेयजल समेत दूसरे काम में आने वाले पानी का गंभीर संकट है. वैसे कई देश ऐसे भी हैं, जो इस लिस्ट से बाहर हैं और विकसित देशों की श्रेणी में हैं लेकिन बोतलबंद पानी वहां काफी महंगा मिलता है.

पहले नंबर पर है नॉर्वे की राजधानी 

पेयजल की कीमत के आधार पर नॉर्वे का ओस्लो शहर सबसे महंगा है, जहां आधा लीटर यानी 500 एमएल पानी का दाम लगभग 150 रुपए है. ये न्यूनतम कीमत है, जबकि ब्रांड के मुताबिक कीमत और बढ़ती है. बता दें कि ओस्लो देश की राजधानी और तमाम आर्थिक गतिविधियों का केंद्र भी है, जहां दुनियाभर के लोग आते रहते हैं. ऐसे में जाहिर है कि बोतलबंद पानी इतने ऊंचे दामों पर पीना शायद ही किसी को सुहाए. यही कारण है कि अधिकतर लोग वहां टैप वॉटर यानी नल का पानी पीते हैं, जो स्वच्छ भी होता है.

bottled water amid water crisis in world
पश्चिमी देशों में बोतलबंद पानी की शुरुआत 19वीं सदी में ही हो गई थी- सांकेतिक फोटो (pixabay)

लेबनान में पानी सबसे सस्ता 

पेयजल की कीमत के लिहाज से ओस्लो के बाद वर्जिनिया बीच, लॉस एंजेलिस, न्यू ऑरलीन्स, स्टॉकहोम, बाल्टिमोर, तेल अवीव (इजरायल) और प्राग (चेक गणतंत्र) का नाम आता है. वहीं कई ऐसे भी देश हैं, जो पेयजल की कम कीमतों के कारण जाने जाते हैं. इनमें सबसे ऊपर है लेबनान की राजधानी बेरुत. यहां केवल 04 सेंट्स में पानी मिलता है.

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खुद विशेषज्ञों की जबान फिसल चुकी है

वैसे दुनिया के कई देशों में शुद्ध पेयजल के लिए लोगों की बोतलबंद पानी पर निर्भरता बढ़ रही है. लोगों को लगता है कि सीलबंद होने और किसी खास ब्रांड का नाम होने के कारण बोतल के भीतर का पानी शुद्ध है. हालांकि कई बार खुद बड़े बिजनेस टायकून इससे अलग बात कह चुके हैं. मिसाल के तौर पर साल 2007 में एक सार्वजनिक सभा में पेप्सिको के तत्कालीन सीईओ ने कह दिया था कि पानी का उनका ब्रांड एक्वाफिना और कुछ नहीं, बल्कि नल का पानी ही है. इसके बाद काफी बवाल भी हुआ था जो वक्त के साथ ठंडा पड़ गया.

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पश्चिमी देशों में बोतलबंद पानी की शुरुआत 19वीं सदी में ही हो गई थी, हालांकि भारत में ये 70 के दशक में आया और टूरिज्म बढ़ने के साथ-साथ बढ़ता ही गया. यूरोमॉनिटर के अनुसार आज भारत में 5 हजार से ज्यादा निर्माता हैं, जिनके पास ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड लाइसेंस है. यहां 2015 में बोतलबंद पानी की इंडस्ट्री की कीमत 12 हजार करोड़ रही और इसमें लगातार इजाफा हो रहा है. इसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ रहा है.

हो रहा प्रदूषण

पानी की एक बोतल डिकम्पोज होने में 400 से 1000 साल लेती है, केवल 20 प्रतिशत बोतलें ही रीसाइकल हो सकती हैं. इन बोतलों को बनाने में जितना पेट्रोलियम लगता है, उतने में एक मिलियन कारों को सालभर के लिए ईंधन दिया जा सकता है. यानी कुल मिलाकर पर्यावरण का ही संकट गहरा रहा है.

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बोतलबंद पानी का बुरा असर पर्यावरण पर पड़ रहा है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


पानी में क्या अशुद्धियां होती हैं

बाजार में कई तरह का बोतलबंद या प्रोसेस्ड पानी मिल रहा है. प्यूरिफाइड और डिस्टिल्ड वॉटर सुनकर भले ही लगे कि पानी का सबसे सेहतमंद और शुद्ध रूप है लेकिन जरूरी नहीं कि ये सच हो. नेचुरल रिर्सोसेज डिफेंस काउंसिल के अनुसार इसमें भी मिनरल्स की कमी और कई दिक्कतें आती रहती हैं. कई बार पानी में क्रोमियम 6, आर्सेनिक, लीड और मर्करी जैसी अशुद्धियां मिलती हैं.

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ऐसे में कई दूसरे तरीके अपनाए जा सकते हैं. जैसे कई कंपनियां RO (रिवर्स ऑसमॉसिस) पानी देती हैं यानी पानी को शुद्ध बनाकर 20 लीटर पानी एक कैप्सूल में पैक करके देती हैं. इसकी कीमत 50 से 150 रुपए तक भी हो सकती है. इस पानी को लेकर उसे उबालकर स्टोर किया जा सकता है. क्लोरीन या फिर फिटकरी डालकर भी पेयजल शुद्ध बनाया जा सकता है.

वैसे बोतलबंद पानी की बढ़ती मांग और पानी की खराब गुणवत्ता के मद्देनजर हालांकि हमारे यहां भी कई स्टैंडर्ड जारी किए गए हैं जैसे फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड रेगुलेशन (2011) के तहत नियम काफी सख्त हैं. लेकिन तब भी गुणवत्ता की जांच के दौरान पानी में कई तरह की अशुद्धियों की खबर आती ही रहती है.
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