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क्या मदर टेरेसा को बदनाम करने की साजिश हुई थी?

मदर टेरेसा का 110वां जन्मदिवस.

मदर टेरेसा का 110वां जन्मदिवस.

अपने सेवाकार्यों के लिए नोबेल पुरस्कार (Nobel Winner) पाने वालीं और संत घोषित की गईं मदर टेरेसा (Saint Mother Teresa) पर कई तरह के आरोप लगे. यहां तक की निधन के बाद भी उनपर आरोप लगाने वाली किताबें छपती रहीं..क्या मदर टेरेसा पर लगाए गए आरोप सही थे...

  • News18Hindi
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लाचारों की मदद और गरीबों की सेवा में अपनी पूरी जिंदगी समर्पित करने वाली संत मदर टेरेसा (Mother Teresa) का आज ही के दिन निधन हुआ था. वैटिकन सिटी (Vetican City) के पोप ने उन्हें संत की उपाधि प्रदान की थी. मदर टेरेसा ने भारत (India) को अपनी कर्मभूमि बनाया था और गरीब, बीमार, लाचार लोगों की सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य. इन तमाम बातों के बावजूद समय-समय पर मदर टेरेसा पत्रकारों, लेखकों और विचारकों के एक वर्ग की आलोचनाओं (Criticism in Media) का शिकार होती रहीं. उन पर गंभीर आरोप लगाती किताबें (Books on Mother Teresa) लिखी गईं और दुनिया भर में एक समय में बहस छिड़ी रही. आपको जानना चाहिए कि मदर टेरेसा की इतनी गंभीर आलोचना क्यों हुई और उन पर क्या आरोप लगाए गए थे.

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क्या गरीब बेसहाराओं की सेवा मदर टेरेसा (Mother Teresa Social Welfare) का ढोंग था? क्या मदर टेरेसा की संस्थाएं धोखे से गरीबों का धर्म परिवर्तन (Conversion) कर रही थीं? क्या मदर टेरेसा ने नस्लवाद (Racism) और उपनिवेशवाद को बढ़ावा दिया था? क्या उनकी संस्थाओं में आर्थिक गड़बड़ियों (Financial Irregularities) के मामले वाकई घोटाले थे? क्या चर्च उनकी छवि का दुरुपयोग कर रहा था? ऐसे ही तमाम सवालों के जवाब सिलसिलेवार जानते हुए पढ़िए कि मदर टेरेसा कैसे एक आलोचक वर्ग के निशाने पर बनी रहीं.

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'सेवा ढोंग थी और उसका प्रचार था'
ब्रिटिश भारतीय लेखक और डॉक्टर अरूप चटर्जी मदर टेरेसा के बड़े आलोचक रहे. एक समय में मदर टेरेसा के कोलकाता स्थित सेवाघर में काम कर चुके अरूप ने टेरेसा के खिलाफ अपनी ही जांच का हवाला देते हुए किताब लिखी थी 'मदर टेरेसा : दि अनटोल्ड स्टोरी', जिसने काफी हंगामा खड़ा किया था. इस किताब में चटर्जी ने लिखा कि प्रचार किया जाता है कि मदर टेरेसा के सेवाघरों में कई हज़ार बीमारों व लाचारों का इलाज व सेवा की गई, जबकि ऐसे लाचारों की संख्या 700 से ज़्यादा नहीं रही.

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मदर टेरेसा की संस्थाओं की फंडिंग से लेकर उनके सेवाभाव तक पर सवालिया निशान लगाए गए थे.


चटर्जी ने ये भी लिखा कि मदर टेरेसा के सेवाघरों में मरीज़ों के लिए सही सेहतमंद तरीके नहीं अपनाए जाते थे. इसके अलावा चटर्जी ने कुछ दस्तावेज़ जारी करते हुए मदर टेरेसा की संस्थाओं को मिलने वाले डोनेशन के साथ ही उनके बैंक अकाउंट्स में आने वाली रकम के स्रोतों को लेकर भी सवाल खड़े किए थे और कहा था कि जाली और चार सौ बीस लोग इन संस्थाओं में पैसा लगाते हैं.

अनैतिक धर्म परिवर्तन के इल्ज़ाम
ब्रिटिश अमेरिकी लेखक व पत्रकार क्रिस्टोफर हिचेन्स ने अपने टीवी शो और किताब 'द मिशनरी पोज़िशन: मदर टेरेसा इन थ्योरी एंड प्रैक्टिस' में गंभीर आरोप लगाए. हिचेन्स के मुताबिक मदर टेरेसा की संस्थाओं में मरने की हालत में पहुंचे मरीज़ों का अनैतिक ढंग से धर्म परिवर्तन किया जाता था. 'मरीज़ों से पूछा जाता था कि क्या वो सीधे स्वर्ग जाना चाहते हैं और उनकी हां को धर्म परिवर्तन के लिए मंज़ूरी माना जाता था'. इसके बाद सेवा कर रहीं ननें उन मरीज़ों का ब​प्तिस्मा कर उन्हें ईसाई बनाती थीं.

भारत के कई हिंदुओं व मु​लसमान मरीज़ों को ईसाई बनाने के इस आरोप का समर्थन करते हुए मरे कैंपटन ने भी कहा था कि मरीज़ों को स्पष्ट रूप से और पूरी तरह से ये बताया ही नहीं जाता था कि उनका धर्म परिवर्तन करवाया जा रहा था.

आर्थिक गड़बड़ियों को लेकर सवाल
द टेलिग्राफ की एक रिपोर्ट के हवाले से कहा गया था कि मदर टेरेसा ने ब्रिटिश प्रकाशक रॉबर्ट मैक्सवेल से दानराशि ली थी जबकि बाद में ये पता चला था कि मैक्सवेल ने कर्मचारियों के पेंशन फंड में 450 मिलियन यूरो का घोटाला किया था. इसी तरह टेलिग्राफ की ही एक और रिपोर्ट के मुताबिक टेरेसा को मिलियनों डॉलर और अमेरिका में अपना चार्टर जेट मुहैया कराने वाले चार्ल्स कीटिंग को बैंक फ्रॉड के इल्ज़ाम में दोषी पाया गया था और उसने खुद अपना जुर्म कबूल भी किया था. कीटिंग केस के सामने आने के बाद मदर टेरेसा की संस्थाओं की फंडिंग को लेकर बड़े सवाल उठे थे.

इंदिरा गांधी की इमरजेंसी का समर्थन
भारत में 1975 में इंदिरा गांधी सरकार ने जब इमरजेंसी लगाई थी, तब मदर टेरेसा ने कहा था 'लोग इससे खुश हैं. उनके पास ज़्यादा रोज़गार है. हड़तालें भी कम हो रही हैं.' इस बयान के बाद मदर टेरेसा को कांग्रेस के हिमायती होने के आरोप झेलना पड़े थे. यही नहीं, मदर टेरेसा के इस बयान पर भारत के बाहर आलोचना हुई थी और कैथोलिक चर्च से जुड़े मीडिया ने भी उनके इस बयान पर नाराज़गी जताई थी.

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मदर टेरेसा के खिलाफ सभी आरोप एक हद तक सिर्फ किताबों में सिमटकर रह गए.


नस्लवाद से जुड़े आरोप
ऑस्ट्रेलियाई फेमिनिस्ट जर्मेन ग्रियर ने मदर टेरेसा को 'धार्मिक साम्राज्यवादी' करार दिया था और कहा था कि वह जीसस के नाम पर गरीबों को शिकार बनाती हैं. वहीं, इतिहासकार विजय प्रशाद ने एक लेख में मदर टेरेसा को बुर्जुआ और दक़ियानूसी पूंजीवादी ताकतों के इशारे पर चलने वाला बताकर नस्लवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगाए थे. यही नहीं, 1997 में मदर टेरेसा की मृत्यु के बाद भी उन्हें और उनकी संस्थाओं को लेकर आलोचनाओं का सिलसिला जारी रहा.

इन आलोचनाओं का जवाब
समय समय पर हुईं इन आलोचनाओं को बराबर जवाब भी मिलते रहे और मदर टेरेसा के पक्षधर इन तमाम आरोपों को बेबुनियाद करार देते रहे. मिलानी मैक्डॉनफ ने लिखा था 'जो वो नहीं होना चाहती थीं, उनकी आलोचना की गई कि वह वो नहीं हो पाईं, जो वो करना ही नहीं चाहती थीं, आलोचना की गई कि उन्होंने वो नहीं किया'. मिलानी के मुताबिक़ वो गरीबी से लड़ने का अभियान नहीं चला रही थीं बल्कि समाज के हाशिए के लोगों की सेवा कर रही थीं.

​बहरहाल, इन आलोचनाओं को कभी बल नहीं मिल सका. इसके पीछे मीडिया के बड़े वर्ग की बेरुखी रही हो, या पर्याप्त सबूतों या दस्तावेज़ों का न होना, लेकिन मदर टेरेसा के खिलाफ ये सभी आरोप एक हद तक सिर्फ किताबों में सिमटकर रह गए. इनकी न कभी कोई पुख्ता जांच हो सकी और न ही कोई फैसला आया. इसका नतीजा कहिए या इसकी वजह, लेकिन बात ये है कि मदर टेरेसा के विरोधियों से ज़्यादा उनके समर्थक और प्रशंसक हमेशा बने रहे.

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