क्या है पैराशूट रेजीमेंट? जिसका हिस्सा हैं महेंद्र सिंह धोनी

धोनी इस दौरान कश्मीर में रहेंगे, अपनी ड्यूटी के दौरान वो अपने ट्रूप के साथ पेट्रोलिंग, गार्ड और पोस्ट की सुरक्षा की जिम्मेदारियों को निभाएंगे

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Updated: July 26, 2019, 3:17 PM IST
क्या है पैराशूट रेजीमेंट? जिसका हिस्सा हैं महेंद्र सिंह धोनी
भारतीय टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने भारतीय सेना के पैराशूट रेजिमेंट के साथ दो महिने की ट्रेनिंग शुरू कर दी है.
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Updated: July 26, 2019, 3:17 PM IST
भारतीय टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने भारतीय सेना के पैराशूट रेजीमेंट के साथ दो महीने की ट्रेनिंग शुरू कर दी है. धोनी 31 जुलाई को पैराशूट रेजीमेंट के 106वीं टेरिटोरियल आर्मी बटालियन को ज्वाइन करेंगे. इस दौरान उनकी तैनाती कश्मीर में होगी. धोनी पहले ही कह चुके हैं कि वो वेस्टइंडीज दौरे पर टीम इंडिया के साथ नहीं रहेंगे और इस दौरान सेना में अपनी सेवाएं देंगे. धोनी 31 जुलाई से 15 अगस्त तक 106वीं टेरिटोरियल आर्मी बटालियन का हिस्सा रहेंगे. ये यूनिट कश्मीर में है और विक्टर फोर्स का पार्ट है. धोनी अपनी ड्यूटी के दौरान ट्रूप के साथ पेट्रोलिंग, गार्ड और पोस्ट की सुरक्षा की जिम्मेदारियों को निभाएंगे.

विश्व कप में मैच के दौरान उनके ग्लव्स पर 'बलिदान बैज' का चिह्न दिखा था. पैरा स्पेशल फोर्स के सम्मान में वो बलिदान बैज का चिह्न ग्लव्स पर लगाया था. पैरामिलिट्री कमांडो को यह चिह्न धारण करने का अधिकार है.


महेंद्र सिंह धोनी इस समय 38 साल के हो चुके हैं. उन्हें 2011 में भारतीय सेना ने लेफ्टिनेंट कर्नल की मानद उपाधि दी थी. उसी साल जिस साल उन्होंने अपनी कप्तानी में भारतीय टीम को विश्व कप जिताया था. उनके साथ अभिनव बिंद्रा और दीपक रॉव को भी सम्मानित किया गया था. 2015 में धौनी आगरा ट्रेनिंग कैंप में पांच पैराशूट ट्रेनिंग जंप के साथ क्वॉलिफाइड पैराट्रूपर बने थे.

महेंद्र सिंह धोनी की अवार्ड लेते हुए तस्वीर


क्या है पैराशूट रेजीमेंट
29 अक्टूबर 1941 को 50वें पैराशूट बिग्रेड का गठन हुआ. 151 ब्रिटिश, 152 भारतीय और 153 गोरखा पैराशूट बटालियन और दूसरी समर्थक इकाइयां थीं.
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इस रेजीमेंट ने अपनी पहली हवाई कार्रवाई की थी. इस कार्रवाई के दौरान एक रीइंफोर्सड गोरखा बटालियन ने ऑपरेशन ड्रैकुला को अंजाम दिया था. जिसके तहत जवान पैराशूट से 1 मई 1945 को बर्मा के हाथी प्वाइंट पर उतरे थे. इस ऑपरेशन में बटालियन को कामयाबी हाथ लगी. इस कामयाबी के बाद भारतीय पैराशूट रेजीमेंट का 1 मार्च 1945 को गठन किया गया, जिसमें चार बटालियनों और स्वतंत्र कंपनियों को एक साथ लाया गया था.
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आजादी के बाद पैराशूट रेजीमेंट
आजादी के बाद, एयरबोर्न डिवीजन को भारत की सेनाओं और उन्हीं दिनों गठित पाकिस्तानी सेना के बीच बांट दिया गया. भारत ने 50वीं और 77वीं ब्रिगेड साथ रखी जबकि पाकिस्तान ने 14वें पैराशूट ब्रिगेड को ले लिया.

1 मई 1962 को पैराशूट रेजीमेंट के एक ट्रेनिंग विंग का 'ब्रिगेड ऑफ़ गार्ड' कोटा में बनाया गया. इस तरह सीधी भर्ती और पैराशूट रेजीमेंट के लिए ट्रेनिंग शुरू कर दी गई. रेजीमेंट ने 1961 से ही अपनी ताकत बढ़ानी शुरू कर दी. उसी समय रेजीमेंट में रंगरूटों की भर्ती बढ़ने के लिए, एक प्रशिक्षण केंद्र को 13 मार्च 1963 में शामिल किया गया.

कारगिल युद्ध में अहम भूमिका

पैराशूट रेजीमेंट


1999 में पाकिस्तान के साथ चल रही जंग के दौरान दस में से नौ पैराशूट बटालियनों को कारगिल में ऑपरेशन विजय में तैनात किया गया, जो रेजीमेंट के परिचालन प्रोफ़ाइल की गवाही देता है. पैराशूट ब्रिगेड ने मुश्कोह घाटी से घुसपैठियों का सफाया किया. जबकि 5 पैरा सक्रिय रूप से बटालिक क्षेत्र में मौजूद थे, जहां इन्होंने बहादुरी और दृढ़ता का प्रदर्शन किया गया था. इस युद्ध में बहादुरी के लिए इन्हें थलसेनाध्यक्ष यूनिट प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया.

अंतरराष्ट्रीय शांति में भूमिका
पैराशूट इकाइयों को अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए 1953 में कोरिया, 1956 में गाजा और 2000 में सिएरा लियोन भेजा जा चुका है. 2000 में भेजे जाने वाला मिशन 2 एक बेहद ही महत्वपूर्ण मिशन था.

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First published: July 26, 2019, 3:00 AM IST
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