क्यों कहा जाता है इस्लाम जिंदा होता है हर कर्बला के बाद

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Updated: September 10, 2019, 11:45 AM IST
क्यों कहा जाता है इस्लाम जिंदा होता है हर कर्बला के बाद
प्रतीकात्मक तस्वीर

1400 साल पहले मुहर्रम की 10 तारीख को अल्लाह के पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद (स:अ:व:व) के छोटे नवासे इमाम हुसैन को उनके परिवार और 72 अनुयायियों समेत करबला (ईराक के शहर) में मार दिया गया था.

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इस्लामिक कैलेंडर का नया साल 10 सितंबर से शुरू हो रहा है. इसके पहले महीने का नाम 'मुहर्रम' है. पश्चिम एशिया, भारतीय उपमहाद्वीप और आस-पास के मुल्कों में मुहर्रम की पहली तारीख 12 सितंबर मानी गई थी. और कल यानी 10 सितंबर को मुहर्रम की 10वीं तारीख है. इस दिन को 'आशुरा' के नाम से जाना जाता है.

1400 साल पहले मुहर्रम की 10 तारीख को अल्लाह के पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद (स:अ:व:व) के छोटे नवासे इमाम हुसैन को उनके परिवार और 72 अनुयायियों समेत कर्बला (ईराक के शहर) में मार दिया गया था. मुहर्रम महीने में हर साल उन्हीं शहीदों का मातम मनाया जाता है.

आपको बता दें कि 'मुहर्रम' का ऐहतराम शिया व सुन्नी समुदाय में अलग-अलग तरीकों से किया जाता है. तमाम शिया व सुन्नी समुदाय के कुछ तबके मुहर्रम के शुरुआती 10 दिन ग़म मनाते हैं. आइये जानते हैं हज़रत मोहम्मद के नवासे के क़त्ल की दास्तां व इतिहास.

क्या थी जंग होने के पीछे की वजह

इस्लाम का उदय मदीना (सऊदी अरब का शहर) से हुआ. मदीना से (1132 कि.मी या 704 मील) दूर 'शाम' (सीरिया का शहर) में मुआविया नामक शासक का दौर था. मुआविया की मौत के बाद शाही वारिस के रूप में यजीद, शाम की गद्दी पर बैठा.

यजीद चाहता था कि उसके गद्दी पर बैठने की पुष्टि इमाम हुसैन करें क्योंकि वह मोहम्मद साहब के नवासे हैं और वहां के लोगों पर उनका अच्छा प्रभाव है.

यजीद को इस्लाम का शासक मानने से मोहम्मद के घराने ने इनकार कर दिया था, क्योंकि यजीद के लिए इस्लामिक मूल्यों की कोई कीमत नहीं थी. यजीद की बात से इनकार के साथ ही हुसैन ने फैसला लिया कि अब वह अपने नाना का शहर मदीना छोड़ देंगे, ताकि वहां अमन कायम रहे.
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इस हाल में तय हुई थी जंग
हुसैन मदीना छोड़कर परिवार और कुछ आत्मीयों के साथ इराक की तरफ जा रहे थे. करबला के पास यजीद की फौज ने उनके काफिले को घेर लिया. यजीद ने उनके सामने कुछ शर्तें रखीं, जिन्हें हुसैन ने मानने से फिर से इनकार कर दिया. शर्त नहीं मानने के बदले में यजीद ने जंग करने की बात रखी. इस दौरान इमाम हुसैन इराक के रास्ते में ही अपने काफिले के साथ फुरात नदी (सीरिया) के किनारे तम्बू लगाकर ठहरे.

यजीदी फौज ने हुसैन के तम्बुओं को नदी किनारे से हटवा दिया. वह पहली मुहर्रम की तारीख थी, और गर्मी का वक्त था. गौरतलब हो कि आज भी इराक में (मई) गर्मियों में दिन के वक्त सामान्य तापमान 50 डिग्री से ज्यादा होता है.



ऐसे शुरू हुई जंग
ये बात साफ थी कि हुसैन जंग के इरादे से नहीं चले थे. उनके काफिले में केवल 72 लोग थे जिसमें छह माह के बेटे समेत उनका परिवार भी शामिल था, यानी उनका लड़ाई का कोई इरादा नहीं था. सात मुहर्रम तक हुसैन के काफिले के पास मौजूद खाना-पानी खत्म हो चुका था. हुसैन जंग को टाल रहे थे. 7 से 10 मुहर्रम तक (तीन दिन) हुसैन के परिवार के सदस्य और साथी भूखे-प्यासे रहे.

जब 10 मुहर्रम तक हुसैन का काफिला भूख-प्यास से तड़प उठा तो उन्होंने मजबूरी में जंग के लिए हामी भरी.



इमाम हुसैन को यजीद से थी नाइत्तेफाकी 
10 मुहर्रम को हुसैन की 72 लोगों की फौज के लोग एक-एक करके मैदान-ए-जंग में गए. जब हुसैन के सारे साथी मारे जा चुके थे, तब दोपहर की नमाज़ के बाद इमाम हुसैन खुद गए और वे भी कत्ल कर दिए गए.

इस जंग में हुसैन का एक बेटा जैनुल आबेदीन जिंदा बचा. 10 मुहर्रम को वे बीमार थे. वो ही मुहम्मद साहब के परिवार की नई पीढ़ी के इकलौते मर्द ज़िंदा बचे थे.

कर्बला का यह वाकया मोहम्मद के घराने की तरफ से दी गई कुर्बानी माना जाता है. हुसैन और उनके पुरुष साथियों व परिजनों को कत्ल करने के बाद यजीद ने हुसैन के परिवार की औरतों को गिरफ्तार किया.

इमाम हुसैन की मौत के बाद
यजीद ने खुद को विजेता बताते हुए हुसैन के लुटे हुए काफिले को देखने वालों को यह बताया कि यह हश्र उन लोगों का है जो यजीद के शासन के खिलाफ गए. यजीद ने मुहमम्द के घर की औरतों को कैदखाने में रखा, जहां हुसैन की मासूम बच्ची सकीना की (सीरिया) कैदखाने में ही मौत हो गई. बहरहाल इस वाकये को 1400 से ज्यादा साल बीत चुके हैं. कहा जाता है कि 'इस्लाम जिंदा होता है हर कर्बला के बाद'. इसी कुर्बानी की याद में मुहर्रम के महीने में ग़म मनाया जाता है.

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First published: September 9, 2019, 11:32 AM IST
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