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Mumbai Cruise Drugs Case:क्यों हमेशा शक के घेरे में रहा है देश का ड्रग्स कानून

Mumbai Cruise Drugs Case:क्यों हमेशा शक के घेरे में रहा है देश का ड्रग्स कानून

आर्यन खान के मामले में अब खुद कानून (Law) पर भी सवाल उठने लगे हैं कि यह एक दमनकारी कानून है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

आर्यन खान के मामले में अब खुद कानून (Law) पर भी सवाल उठने लगे हैं कि यह एक दमनकारी कानून है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

आर्यन खान (Aryan Khan) के मामले में कई विवाद जुड़ते जा रहे हैं. एक तरफ जहां जांच एजेंसी नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) पर ही निहित साजिश करने के आरोप लग रहे हैं और उसके अधिकारियों को घेरने की कोशिशें हो रही हैं तो दूसरी तरफ इस जांच को प्रभावित करने के भी आरोप लगाए जा रहे हैं. ऐसे में सवाल उस एनपीडीएस कानून (NPDS Act) पर भी उठ रहे हैं जिसके तहत मुंबई क्रूज ड्रग्स केस का मामला बना है. यह कानू शुरू से ही संदेह के घेरे में रहा है, बावजूद इसके कि इसमें कई संशोधन हुए हैं. पूछा यह जा रहा है कि क्या इस कानून का उपोयग एक हथियार की तरह किया जा रहा है.

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    आर्यन खान (Aryan Khan) का मामले ने तूल पकड़ लिया है. पिछले कुछ दिनों से इसने राजनैतिक रंग भी ले लिया है. जांचकर्ता एजेंसी एनसीबी (Narcotics Control Bureau) पर आरोप लग रहे हैं, तो इस जांच में अड़चन डालने के प्रयास के भी आरोप लगाए जा रहे हैं. सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या है एनडीपीएस (NDPS) कानून एक हथियार की तरह उपयोग में लाया जा रहा है. केवल जमानत के मामले में इतना हंगामा हुआ है जबकि अभी तो मामले की जांच पूरी नहीं हुई मुकदमा तो बहुत दूर की बात है. अब यह मामला ऐसे कई सवालों की बहस का विषय हो गया है जिसमें खुद कानून तक शामिल है.

    भारत में अलग है इस कानून की स्थिति
    दुनिया में ड्रग्स के खिलाफ युद्ध कई देशों में चला है. इसमें कई लोकतांत्रिक देश में यह जंग खत्म मानी जा चुकी है तो कई देशों में यह जारी भी है जिसमें तानाशाह देशों से लेकर चुने गए निरंकुश शासन वाले देश भी शामिल है. लेकिन भारत की कहानी कुछ अलग है. सवाल उठाया जा रहा है कि जहां करोड़ों अरबों रुपयों की ड्रग्स पकड़ने के मामले में ज्यादा कुछ सामने नहीं आता है. वहीं आर्यन खान के मामले को इतनी अहमियत क्यों दी जा रही है, जबकि खुद आर्यन के पास से ड्रग्स नहीं मिली थी.

    क्या कोई कमी है इस कानून में
    पिछले साल रिया चक्रवर्ती और उनके साथियों के साथ भी ऐसा कुछ हुआ था, शुरु में उन्हें जमानत नहीं दी गई और जमानत मिलने के बाद मामला ‘शांत’ हो गया. लेकिन कहीं आर्यन खान को बड़े सिलिब्रिटी का बेटा होने की कीमत तो नहीं चुकनी पड़ रही है यही बड़ा सवाल पूछा जा रहा है. क्या यह कानून खामियों से भरा है या भारत की कानून प्रक्रिया में ही ऐसे मामले उलझ कर रह जाते हैं.

    क्या है यह कानून
    नार्कोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्स्टेंसेस (NDPS) एक्ट पहली बार 1985  को बनाया गया था. यह विशेष, कठोर, अव्यवहारिक, अप्रभावी, और शोषणकारी कानून शुरु से ही दुरुपयोग करने लायक रहा और माना जाता रहा कि इसे लोगों के शोषण के लिए ही बनाया गया. पिछले चार दशक में इसमें कई बदलाव हुए, लेकिन फिर भी नागरिकों के लिए मुसीबत, भ्रष्ट पुलिस वालों के लिए औजार, और वकीलों के लिए लॉटरी, जजों के लिए सिरदर्द रहा.

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    यह भी पूछा जा रहा है कि आर्यन खान (Aryan Khan) को कहीं सेलिब्रिटी के बेटे होने का खामियाजा तो नहीं भुगतना पड़ रहा है. (फाइल फोटो)

    क्या है आरोपों का आधार
    आर्यन के मामले में नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो का आधार व्हाट्स ऐप चैट हैं. जिसके बारे में कहा जा रहा है कि उनसे ड्रग्स खरीदने और सेवन करने की बात पता चलती है. इसके अलावा यह भी कि खुद आर्यन को ही पता था कि ड्रग्स कहां और क्यों है जिससे कॉन्सियस पजेशन की बात आ जाती है. एनडीपीएस जैसे कानून में यह एक गंभीर स्थिति है.

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    कैसे बना भारत में कानून
    जब दुनिया भर ड्रग्स के खिलाफ कानून बनाए जा रहे थे और अंतराष्ट्रीय स्तर पर देशों ने इसके लिए मिल कर काम करने के लिए समझौता किया, उसके तहत अंतिम समय में भारत में एनडीपीएस कानून 1985 में बना. इस कानून ने आरोपी पर ही यह बोझ डाल दिया कि वह खुद को बेकसूर साबित करे. इसमें ज्यादा मात्रा में ड्रग्स रखने पर मौत की सजा का निश्चित प्रावधान भी था.

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    इस कानून (NPDS Law) में कई बदलाव हुए हैं, लेकिन उसका मूल स्वरूप और उदेश्य वही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    बदलाव भी हुए इस कानून में
    कानून विशेषज्ञ इस कानून को पूरी तरह से खामी ही बताते रहे, लेकिन इस कानून में केवल संशोधन होते रहे, लेकिन यह खत्म नहीं हुआ. 1988 में ड्रग्स के व्यक्तिगत सेवन की सजा एक दो साल की जेल तक आ गई. 1994 में नरसिंम्हा राव सरकार के समय एक कमेटी बनाई गई जिसका काम यह जांचना था क कैसे यह कानून छोटे सेवनकर्ता, गलियों और झोपड़ियों में रहने वाले के शोषण के रूप में उपयोग में लाया जाता है. साल 2014 के बाद अनिवार्य मौत की सजा भी हटा दी गई.

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    इसके बाद भी कानून काफी कुछ वही है. जैसे धारा 37 और 54 जिनके आधार पर केवल हलके से संदेह पर गिरफ्तारी जिसमें पुरानी व्हाट्सऐप चैट शामिल हैं. धार 67 अधिकारियों को यह अधिकार देता है कि वे किसी को भी सम्मन जारी कर सकता है और ‘पूछताछ’ की जा सकती है. साफ है ऐसा अधिकार दुरुपयोग का मौका ज्यादा देते हैं. भारत की लंबी कानून प्रक्रियाएं इसे और भयावह बना सकती हैं. ऐसे में काफी कुछ केवल कानून लागू करने या करवाने वाली संस्थाओं की मंशा पर निर्भर करने लगता है.

    Tags: Aryan Khan, India, Law, Mumbai, NCB, Research

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