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#MissionPaani: पानी-पानी मुंबई क्यों नहीं जुटा पाता अपने लिए पीने का पानी ?

मुंबई में हर तरफ पानी भरा है लेकिन फिर भी नहीं मिल पाता पीने का साफ पानी

मुंबई में हर तरफ पानी भरा है लेकिन फिर भी नहीं मिल पाता पीने का साफ पानी

मुंबई बारिश के पानी में डूबा है. हर तरफ पानी जमा है. लेकिन फिर भी यहां पीने का साफ पानी नहीं मिलता. आखिर इसकी क्या वजह है?

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मुंबई पानी-पानी है. बारिश ने मुंबई की रफ्तार थाम ली है. सड़कों पर पानी भरा है. गाड़ियां जलभराव की वजह से यहां-वहां फंस गई हैं. देश के सबसे बड़े कारोबारी शहर को बारिश के पानी ने ठप कर दिया है. मुंबई की बदकिस्मती देखिए कि हर साल यहां गर्मी के मौसम में पानी की किल्लत होती है और बारिश आते ही मुंबई जलमग्न हो जाती है. गर्मियों में पीने का पानी नहीं मिलता और बारिश में गंदे पानी को बाहर निकालने का रास्ता नहीं मिलता.

मुंबई में पानी की किल्लत को रेन वाटर हार्वेस्टिंग (वर्षा जल संचय) के जरिए दूर किया जा सकता है. लेकिन क्या ऐसा हो रहा है. आइए देखते हैं क्या है मुंबई में रेन वाटर हार्वेस्टिंग की स्थिति.

पानी होते हुए भी क्यों होती है पानी की किल्लत

मुंबई में बारिश का पानी शहर में जमा होता है और फिर यही पानी समंदर में मिलकर बेकार हो जाता है. 2002 में म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ ग्रेटर मुंबई ने रेन वाटर हार्वेस्टिंग को जरूरी कर दिया था. इसके विकास के 2034 तक के लिए प्लान बने हैं. लेकिन कॉरपोरेशन के पास रेन वाटर हार्वेस्टिंग को लेकर कोई डाटा उपलब्ध नहीं है. कितना रेन वाटर हार्वेस्टिंग हो रहा है, उससे कितने लोगों को फायदा हो रहा है, मुंबई के किन-किन इलाकों में इस तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है, इसका डाटा म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के पास नहीं है.

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बारिश का पानी समंदर में मिलकर बेकार हो जाता है


बारिश के पानी से खत्म हो सकती है वाटर क्राइसिस

हर साल मुंबई में अच्छी बारिश होती है. यहां औसत बारिश करीब 2,457 एमएम तक होती है. इतनी बारिश को रेन हार्वेस्टिंग के जरिए पूरे साल के दौरान 589 MLD ( मिलियन लीटर प्रति दिन ) में बदला जा सकता है. फिलहाल शहर को 3800 MLD पानी की जरूरत होती है. बीएमसी के अधिकारी जानते हैं कि रेन वाटर हार्वेस्टिंग पानी के संकट को खत्म करने में कितना मददगार हो सकता है. लेकिन इस दिशा में जितना होना चाहिए वो हो नहीं रहा है.

बीएमसी ने नियम बनाए लेकिन लागू नहीं करवा पा रही

2004 के बाद मुंबई की हर बिल्डिंग में रेन वाटर हार्वेस्टिंग को जरूरी बना दिया गया है.  2009 के सूखे के बाद पानी की समस्या और बढ़ी है. वेस्टर्न सी फेस वाले इलाकों में समंदर का खारा वाटर सप्लाई में आ जाता है. समंदर के नजदीक होने की वजह से ऐसा होता है. इस पानी का घरों में सिर्फ 20 फीसदी इस्तेमाल ही हो सकता है. वो भी बर्तन धोने और टॉयलेट आदि में. इस पानी को रिसाइकल किया जा सकता है. लेकिन ऐसा किया नहीं जा रहा है.

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रेन वाटर हार्वेस्टिंग के लिए बीएमसी ने कुछ नियम बनाए थे. मसलन

-2002 में 1 हजार स्कॉयर मीटर वाले सभी नए कंस्ट्रक्शन में रेन वाटर हार्वेस्टिंग की तकनीक का होना जरूरी है.

-इस नियम को बदलकर बाद में 300 स्क़ॉयर मीटर के कंस्ट्रक्शन तक कर दिया गया. यानी 300 स्कॉयर मीटर के नए निर्माण में रेन वाटर हार्वेस्टिंग तकनीक का इस्तेमाल जरूरी कर दिया गया. 2018 में इसे और घटाकर 100 स्कॉयर मीटर कर दिया गया.

-बीएमसी के पास इसका डाटा नहीं है कि कितनी बिल्डिंगों ने इस नियम को अपनाया. कितनी बिल्डिंगों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगा है.

-इसके बाद बीएमसी ने रेन वाटर हार्वेस्टिंग के बजाए वाटर ट्रीटमेंट प्लांट पर फोकस करना शुरू कर दिया.

पानी को लेकर मुंबई में हालात बेहतर हो सकते हैं. महाराष्ट्र में इस दिशा में काफी कुछ किया भी जा रहा है. लेकिन जितना हो रहा है वो जरूरत के हिसाब से काफी कम है.

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