प्रेमचंद ने क्रिकेट पर भी खूब लिखा, महाराजाओं के कप्तान बनने पर उड़ाई थी खिल्ली

प्रेमचंद ने क्रिकेट पर भी खूब लिखा, महाराजाओं के कप्तान बनने पर उड़ाई थी खिल्ली
ऐसा लगता है कि मुंशी प्रेमचंद क्रिकेट के शौकीन थे. इस पर वो अपनी लेखनी पर चलाते रहते थे

प्रेमचंद हिन्दी के जाने-माने साहित्यकार थे. उनका कद साहित्य में इतना बड़ा था, जिसके आसपास भी कोई नहीं दिखता. ऐसा लगता है कि वो क्रिकेट के भी काफी शौकीन थे. इस खेल पर नजर रखते थे. इस पर टिप्पणियां भी करते थे

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हिन्दी के साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद को हम लोग तमाम कहानियों के लिए जानते हैं. लेकिन हममे से बहुत कम लोगों को मालूम है कि वो क्रिकेट के भी शौकीन थे. उन्होंने एक बार नहीं कई बार अपनी कहानियों और लेखों के जरिए क्रिकेट पर लेखनी चलाई. महाराजाओं के क्रिकेट कप्तान बनने की खिल्ली उड़ाई.

प्रेमचंद ने 1935 में एक कहानी लिखी, वो उस समय दौरे पर आई आस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम और भारतीय टीम के बीच मैचों पर लिखी गई थी. लेकिन बहुत रोचकता के साथ प्रेमचंद ने इसे संस्मरण का जामा पहनाते हुए कहानी लिखी थी. गौरतलब है कि 1935-36 में जैक राइडर की अगुवाई में एक आस्ट्रेलियाई टीम भारत आई और उसने यहां कई फर्स्ट क्लास के मैच खेले थे.

इस टूर को प्राइवेट तौर पर आर्गनाइज किया गया था. इस पर आस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड की कोई सहमति नहीं थी. इस दौरे में जितना पैसा खर्च हुआ, वो महाराजा पटियाला ने किया. भारत की टीम को नाम दिया गया आल इंडिया इलेवन. तब तक भारतीय टीम को टेस्ट का दर्जा नहीं मिला था. आस्ट्रेलिया और भारत के बीच 16 फर्स्ट क्लास के मैच खेले गए.
पटियाला में महाराजा के स्टेडियम में खासतौर पर एक मैच रखा गया, जिसमें महाराजा पटियाला आस्ट्रेलिया की टीम से खेले और पटियाला के युवराज ने भारतीय टीम की कप्तानी की.
कहानी "क्रिकेट का मैच" 


प्रेमचंद की कहानी का नाम था क्रिकेट मैच. जो इसी दौरे पर थी. पहला मैच कानपुर में खेला गया, इसी मैच से प्रेमचंद के कहानी की शुरुआत कुछ यूं होती है,

प्रेमचंद ने अगर क्रिकेट पर कहानियां लिखीं तो समय समय पर इस पर संपादकीय लेख लिखकर इससे जुडे़ विरोधाभासों और राजे-महाराजों के इसमें हावी रहने पर तीखी प्रतिक्रिया भी जाहिर की


"आज क्रिकेट मैच में मुझे जितनी निराशा हुई मैं उसे व्यक्त नहीं कर हार सकता. हमारी टीम दुश्मनों से कहीं ज्यादा मजबूत था मगर हमें हार हुई. वे लोग जीत का डंका बजाते हुए ट्राफी उड़ा ले गये. क्यों? सिर्फ इसलिए कि हमारे यहां नेतृत्व के लिए योग्यता शर्त नही. हम नेतृत्व के लिए धन-दौलत जjरूरी समझते हैं. हिज हाइनेस कप्तान चुने गये, क्रिकेट बोर्ड का फैसला सबको मानना पड़ा. मगर कितने दिलों में आग लगी, कितने लोगों ने हुक्मे हाकिम समझकर इस फैसले को मंजूर किया, जोश कहां, संकल्प कहां, खून की आखिरी बूंद गिरा देने काउत्साह कहां. हम खेले और जाहिरा दिल लगाकर खेले. मगर यह सच्चाई के लिए जान देनेवालों की फौज न थी. खेल में किसी का दिल न था."

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भारतीय टीम इंग्लैंड दौरे पर संपादकीय 
इससे पहले प्रेमचंद ने 12 अक्तूबर 1932 को ‘जागरण’ में छपे एक संपादकीय में भारतीय क्रिकेट टीम के इंग्लैंड दौरे का विवरण लिखा था. प्रेमचंद ने इसमें लिखा कि भारतीय क्रिकेट टीम को भारतीय हॉकी टीम जितनी सफलता भले ही न मिली हो, लेकिन फिर भी उसकी सफलता महत्त्वपूर्ण है.

भारतीय क्रिकेट टीम की सफलता पर ख़ुशी जाहिर करते हुए प्रेमचंद ने लिखा था : ‘भारतीय क्रिकेट टीम दिग्विजय करके लौट आयी. यद्यपि उसे उतनी शानदार कामयाबी हासिल नहीं हुई, फिर भी इसने इंग्लैंड को दिखा दिया कि भारत खेल के मैदान में भी नगण्य नहीं है. सच तो यह है कि अवसर मिलने पर भारत वाले दुनिया को मात दे सकते हैं, जीवन के हरेक क्षेत्र में. क्रिकेट में इंग्लैंड वालों को गर्व है. इस गर्व को अबकी बड़ा धक्का लगा होगा. हर्ष की बात है कि वाइसराय ने टीम को स्वागत का तार देकर सज्जनता का परिचय दिया.’

आर्थिक मंदी और क्रिकेट मैचों पर प्रहार
वहीं जब ब्रितानी हुकूमत ने भारत में आर्थिक मंदी की बात कहकर कटौतियां शुरू कीं तो ये देखा गया कि इसके बाद भी क्रिकेट के मैच आयोजित हो रहे हैं. उसके लिए खिलाड़ियों को ट्रेन में खास तौर पर रियायती दरों पर भेजा जा रहा है तो उन्होंने ‘जागरण’ में लिखा, क्रिकेट मैचों के लिए ‘रेल ने कन्सेशन दे दिए, एक्सप्रेस गाड़ियां दौड़ रही हैं, तमाशाई लोग थैलियां लिए कलकत्ता भागे जा रहे हैं. और इधर गुल मचाया जा रहा है कि मंदी है और सुस्ती है.लेकिन लगता है कि ये मंदी केवल मजदूरी घटाने और नौकरों का वेतन काटने के लिए है. ’

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फिर उन्होंने 15 जनवरी 1934 को ‘जागरण’ में ही लिखे संपादकीय में लिखा, ‘कहते हैं कि फ्रेंच क्रांति के पहले जनता तो भूखों मरती थी और उनके शासक और जमींदार और महाजन नाटक और नृत्य में रत रहते थे, वही दृश्य आज हम भारत में देख रहे हैं. देहातों में हाहाकार मचा हुआ है. शहरों में गुलछर्रे उड़ रहे हैं. कहीं एमसीसी की धूम है, कहीं हवाई जहाज़ों के मेले की. बड़ी बेदर्दी से रुपए उड़ रहे हैं.’

तब भी अधिकारी चुनते थे क्रिकेट
हालांकि ऐसा लगता है कि वो एक पत्रकार की तरह क्रिकेट टीमों के चयन और उसमें अंग्रेज अफसरों और राजा-महाराजाओं की दखलंदाजी पर भी नजर रखते थे. तभी उन्होंने ‘जागरण’ में 1 जनवरी 1934 को लिखे संपादकीय में खिलाड़ियों के चयन पर भी टिप्पणी की, ‘यहां जिस पर अधिकारियों की कृपा है, वह इलेविन में लिया जाता है. यहां तो पक्का खिलाड़ी वह है, जिसे अधिकारी लोग नामजद करें. भारत की ओर से वाइसराय बधाई देते हैं, भारत का प्रतिनिधित्व अधिकारियों ही के हाथ में है.

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कहानी में कमेंटेटर विधा जैसी लेखनी
प्रेमचंद ने अपनी साहित्यिक कृतियों में भी क्रिकेट के बारे में लिखा है. उपन्यास ‘वरदान’ में प्रेमचंद ने अलीगढ़ और प्रयाग के छात्रों के बीच हुए क्रिकेट मैच का जीवंत वर्णन किया है. बल्कि इस कहानी में तो ऐसा लगा मानो वो कहीं कहीं गेंद के साथ कमेंटरी की विधा में आंखों देखा हाल लिख रहे हों.

जिस कहानी क्रिकेट का मैच जिक्र ऊपर किया गया, वो प्रेमचंद के निधन के बाद कानपुर से छपने वाले उर्दू पत्र ‘ज़माना’ में जुलाई 1937 में छपी थी. डायरी शैली में लिखी गई यह कहानी जनवरी 1935 से शुरू होती है. इस कहानी के मुख्य पात्र हैं भारतीय क्रिकेटर जफर और इंग्लैंड से डॉक्टरी की पढ़ाई कर भारत लौटी हेलेन मुखर्जी.
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