एक नदी की ‘हत्या’ की तहकीकात : जानें कैसे यमुना को मौत की नींद सुला रहे हैं हाइड्रो पावर प्लांट्स

दिल्ली तक आते-आते यमुना का दम क्यों फूलने लगता है, यमुना का पानी कहां से गायब हो रहा है? इस बारे में विशेषज्ञों ने हैरान करने वाली जानकारी दी है. दरअसल यमुना को मौत की नींद सुलाने वाले हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट हैं.

News18Hindi
Updated: July 24, 2019, 3:01 PM IST
एक नदी की ‘हत्या’ की तहकीकात : जानें कैसे यमुना को मौत की नींद सुला रहे हैं हाइड्रो पावर प्लांट्स
यमुना नदी पर बने रहे हाइड्रो पावर प्लांट्स
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Updated: July 24, 2019, 3:01 PM IST
हृदयेश जोशी

यमुना धीरे-धीरे मर रही है. यमुना का पानी बूंद-बूंद करके चूस लिया जा रहा है. हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के नाम पर यमुना के पानी को डायवर्ट किया जा रहा है. हालत ऐसी हो गई है कि यमुना का पानी नहरों के जरिये खींच लिया जा रहा है और पानी के बदले दूर-दूर तक रेत ही रेत दिखती है.

देहरादून से करीब 50 किलोमीटर दूर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बॉर्डर वाले इलाके में यमुना नदी के बहाव में बड़ी रुकावट डाली गई है. यमुना का करीब सारा पानी शक्ति नहर में डायवर्ट किया गया है. यमुना बिल्कुल सूखी पड़ी है. 1980 में यहां हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई थी. प्रोजेक्ट का कंस्ट्रक्शन अभी चल ही रहा है. उसके बाद से हालात और बुरे हुए हैं.

यमुना में प्रदूषण की समस्या पहले से है. अब पानी की समस्या बन आई है. सवाल ये भी है कि यमुना का पानी सुखा दिए जाने के बाद अब दिल्ली के लोगों के पानी की जरूरत कैसे पूरी होगी? यमुना में प्रदूषण की समस्या को लेकर पिछले साल एनजीटी ने एक कमेटी बनाई थी. कमेटी का कहना था कि प्रदूषण को खत्म करने के लिए नदी में पानी का प्राकृतिक बहाव जरूरी है. ये नदी की सेहत के लिए भी जरूरी है.

दिल्ली की आबादी पिछले वर्षों में काफी बढ़ी है. बढ़ती आबादी के लिए ज्यादा मात्रा में पानी चाहिए. दिल्ली में भूजल का स्तर भी नीचे गिरा है. भूजल स्तर को बनाए रखने के लिए यमुना के रिवर बेड को रिचार्ज करना होगा.

हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट यमुना का पानी सोख रहे हैं
हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट यमुना के पानी को सोख रहा है. पहला पावर स्टेशन हिमाचल उत्तराखंड बॉर्डर के पास डाक पत्थर से करीब 8 किलोमीटर दूर ढकरानी में है. यहां 33.75 मेगावाट का पावर स्टेशन बनाया गया है. इसके बाद धलीपुर में 51 मेगावाट का पावर स्टेशन है. विशेषज्ञ बताते हैं कि बिजली के उत्पादन के लिए यमुना का एक-एक बूंद पानी सोख लिया जा रहा है. डाक पत्थर के बाद यमुना मर चुकी है. यमुना के पानी में मशहूर महाशीर मछली मिलती है. लेकिन पानी के अभाव में इसके अस्तित्व पर भी संकट मंडरा रहा है.
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यमुना नदी उत्तरकाशी के यमुनोत्री ग्लेशियर से निकलती है. 150 किलोमीटर तक इसके बहाव में कोई रुकावट नहीं है. इतनी दूरी तक नदी में कोई भी पावर प्रोजेक्ट नहीं लगाया गया है. डाक पत्थर के पास पहला पावर प्रोजेक्ट लगा है. यहीं से यमुना का प्राकृतिक बहाव खत्म होना शुरू हो गया है.

murder of a river how hydro power projects have sucked the life of yamuna water crisis in delhi
यमुना का पानी सोख रहे हैं हाइड्रो पावर प्लांट्स


विशेषज्ञ बताते हैं कि यमुना के ऊपरी इलाकों में, जहां से नदी का बहाव शुरू होता है, वहां कोई पावर प्रोजेक्ट नहीं लगाया जा सकता. यहां पानी का बहाव काफी धीमा है. लेकिन इसके बावजूद इन इलाकों में दो पावर प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है. 1980 में शुरू हुए इन प्रोजेक्ट्स में पहला है हथियारी के पास 120 मेगावाट का व्यासी पावर प्रोजेक्ट, ये डाक पत्थर से करीब 15 किलोमीटर ऊपर है. दूसरा है 300 मेगावाट का लखवार पावर प्रोजेक्ट.

लखवार पावर प्रोजेक्ट अपने शुरुआती चरण में है. हालांकि व्यासी पावर प्रोजेक्ट पर काफी काम हो चुका है. अगले साल तक यहां बिजली का उत्पादन भी शुरू हो जाएगा.

एनजीटी की रिपोर्ट से मिली चौंकाने वाली जानकारी
यमुना देश की छठी सबसे लंबी नदी है. ये गंगा की सबसे लंबी सहायक नदी है. सरकार के महत्वाकांक्षी नमामि गंगे प्रोजेक्ट की कामयाबी के लिए यमुना का जीवित रहना सबसे जरूरी है. लेकिन प्राकृतिक बहाव में रुकावट की वजह से इसका जिंदा रहना मुश्किल है. डाक पत्थर से करीब 80 किलोमीटर दूर हरियाणा के हथिनी बैराज में यमुना का पानी दो नहरों में चला जाता है. यहां के बाद यमुना करीब-करीब सूख जाती है. दिल्ली के वजीराबाद के पास पहुंचने तक यमुना नाले में तब्दील हो जाती है.

दिसंबर 2018 में एनजीटी द्वारा गठित की गई मॉनिटरिंग कमेटी ने दिल्ली सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी थी. इस रिपोर्ट के मुताबिक यमुना के 76 फीसदी प्रदूषण के लिए उसकी कुल लंबाई का सिर्फ 2 फीसदी के हिस्से वाला क्षेत्र जिम्मेदार है. यही इसके जीवन में सबसे बड़ी बाधा है. रिपोर्ट में कहा गया था कि नदी को जीवित रखने के लिए कम से कम प्राकृतिक बहाव को कायम रखना होगा.

पर्यावरणविद् बताते हैं कि लखवार और व्यासी प्रोजेक्ट यमुना के रहे-सहे हिस्से को भी चौपट कर दे रहे हैं. ये नदी के साथ उसके अंदर पल रहे जीव जंतुओं के लिए भी बेहद खतरनाक स्थिति है. इसने करीब 25 किलोमीटर वाले आसपास के जंगली इलाकों को भी बर्बाद किया है. उत्तराखंड के पर्यावरण मंत्री हरक सिंह रावत हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट को राज्य के विकास और उसकी बिजली की जरूरतों के लिए आवश्यक बताते हैं. हालांकि वो ये भी मानते हैं कि इनकी वजह से नदियों की सेहत खराब हो रही है.

नदियों के प्राकृतिक बहाव पर नहीं दिया जा रहा है ध्यान
उत्तराखंड सरकार के अधिकारी बताते हैं कि नदियों के प्राकृतिक बहाव के लिए एनजीटी ने कुछ नियम कायदे बनाए थे. 2017 में एनजीटी ने आदेश पारित करके कहा था कि नदियों को जीवित रखने के लिए कम से कम 15 फीसदी प्राकृतिक बहाव को बनाए रखना जरूरी है. अधिकारी कहते हैं कि उन्होंने संबंधित विभागों को 5 जून 2018 को आदेश जारी किया कि कम से कम 15 फीसदी प्राकृतिक बहाव को बनाए रखें.

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बाढ़ के पानी की वजह से वजीराबाद के पास यमुना नदी का नजारा


यमुना की सहायक नदियों के हाल और भी बुरे हैं. हिमालयी क्षेत्रों में जंगलों के कटाव और अतिक्रमण ने यमुना पर भी असर डाला है. यमुना की एक सहायक नदी टोंस उत्तराखंड और हिमाचल के बड़े इलाके में फैली है. इसके ऊपर दो पावर स्टेशनों का भार है. इचार और चिब्रो हाइडल प्रोजेक्ट. इन दोनों की कुल क्षमता 360 मेगावाट की है. एक और सहायक नदी आसन देहरादून के पास यमुना नदी में मिलती है. इसका करीब-करीब सारा पानी शक्ति नहर में चला जाता है. यमुना सूखी रह जाती है. आसन के ऊपर 30 मेगावाट का पावर प्रोजेक्ट लगा है.

मशहूर पर्यावरणविद् और वाटर मैनेजमेंट के एक्सपर्ट रवि चोपड़ा कहते हैं कि ये दुखद है कि हमारे इंजीनियर्स को इकोलॉजी से कोई मतलब नहीं है. उनके लिए नदी पानी का एक स्रोत है. उन्हें कोई मतलब नहीं है कि इकोसिस्टम भी कोई चीज होती है. रिवर बेड और रिवर प्लेन का महत्व होता है. उन्हें इसके बारे में कोई आइडिया नहीं होता है. उनका वश चले तो वो नदी का सारा पानी निकालकर इस्तेमाल कर लें. उन्हें लगता है कि नदियों में पानी बह रहा है तो ये पानी की बर्बादी है.

( ये लेख भारत में पानी की कमी पर न्यूज18 की स्पेशल सीरीज का हिस्सा है )

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First published: July 24, 2019, 1:17 PM IST
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