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BHU विवाद: इन मुस्लिम विद्वानों ने खूब बढ़-चढ़कर की संस्कृत की सेवा

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Updated: November 19, 2019, 12:19 PM IST
BHU विवाद: इन मुस्लिम विद्वानों ने खूब बढ़-चढ़कर की संस्कृत की सेवा
कई मुस्लिम विद्वानों ने ताउम्र संस्कृत भाषा की सेवा की है और उसके प्रचार में भूमिका निभाई है.

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (Banaras Hindu University) के संस्कृत विभाग (Sanskrit Department) के एक मुस्लिम प्रोफेसर (Muslim Professor) को लेकर बवाल मचा हुआ है. डिपार्टमेंट के छात्रों का तर्क है हमारा धर्मविज्ञान किसी दूसरे धर्म का व्यक्ति कैसे पढ़ा सकता है? बीएचयू के इन छात्रों के तर्कों से अलग हटकर देखा जाए तो पता चलता है कि मुस्लिम धर्म ने कई ऐसे विद्वान दिए हैं जिन्होंने संस्कृत की सेवा बड़े मन से की है.

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नई दिल्ली. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (Banaras Hindu University) के संस्कृत विभाग (Sanskrit Department) में एक मुस्लिम प्रोफेसर (Muslim Professor) को लेकर बवाल मचा हुआ है. डिपार्टमेंट के छात्रों का तर्क है हमारा धर्मविज्ञान किसी दूसरे धर्म का व्यक्ति कैसे पढ़ा सकता है? इसी को लेकर छात्रों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया है. यूनिवर्सिटी प्रशासन का तर्क है कि नियुक्ति यूजीसी के नियमों के हिसाब हुई है. बीएचयू के इन छात्रों के तर्कों से अलग हटकर देखा जाए तो पता चलता है कि मुस्लिम धर्म ने कई ऐसे विद्वान दिए हैं, जिन्होंने संस्कृत की सेवा बड़े मन से की है. संस्कृत के ये मुस्लिम विद्वानों देश के अलग-अलग हिस्सों से ताल्लुक रखते हैं.

वाराणसी की नाहिद आबिदी
संस्कृत की विद्वान नाहिद आबिदी मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की रहने वाली हैं और भाषा के लिए उनके काम के मद्देनजर उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है. मिर्जापुर के केवी डिग्री कॉलेज से संस्कृत में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद नाहिद आबिदी ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पीएचडी की डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने 2005 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अवैतनिक शिक्षक के रूप में पढ़ाना शुरू कर दिया, लेकिन जल्द ही उन्हें काशी विद्यापीठ में पार्ट टाइम लेक्चरर के रूप में नौकरी मिल गई.

हालांकि एक मुस्लिम महिला होने के नाते उन्हें संस्कृत शिक्षक के रूप में रेगुलर जॉब तलाशने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. नाहिद की पहली किताब 2008 में आई थी और इस किताब का नाम था 'संस्कृत साहित्य में रहीम'. इसके बाद देवालयस्य दीपा नाम की किताब आई जो गालिब की किताब चिराग-ए-दयार का ट्रांसलेशन थी. इसके बाद भी उनकी किताबें आई हैं. नाहिद आबिदी को संस्कृत भाषा में उनके योगदान के लिए साल 2014 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था. इसके अलावा उन्हें डीलिट की उपाधि भी मिली है. 2016 में उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें यश भारती पुरस्कार से सम्मानित किया था.

नाहीद आबिदी को संस्कृत भाषा में उनके काम के लिए पद्मश्री से भी नवाजा गया है.
नाहीद आबिदी को संस्कृत भाषा में उनके काम के लिए पद्मश्री से भी नवाजा गया है.


प्रयागराज के हयातुल्ला
इलाहाबाद, जो अब प्रयागराज के नाम से जाना जाता है, में भी नाहिद आबिदी की तरह ही हयातुल्ला नाम के एक शिक्षक ने लंबे से समय से संस्कृत की सेवा की है. पेशे से अध्यापक हयातुल्ला को संस्कृत भाषा का संपूर्ण ज्ञान है. साल 1967 में उन्हें संस्कृत भाषा पर पकड़ की वजह से चतुर्वेदी की उपाधि मिली थी. हयात इलाहाबाद के शेरवानी इंटर कॉलेज में पढ़ाते थे और वहां से रिटायर होने के बाद भी बच्चों को संस्कृत की शिक्षा पूरे मनोयोग से देते रहे हैं.
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उनका मानना है कि भाषा का ज्ञान महजब की दीवारों को गिरा देता है. दिलचस्प यह है कि उन्होंने संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए कई देशों की यात्राएं भी हैं जिनमें अमेरिका, नेपाल और मॉरीशस जैसे देश शामिल हैं. हयात उल्ला के बारे में मशहूर है कि वो उनके अध्यापन का तरीका दूसरे शिक्षकों से अलग है. वो संस्कृत समझाने के लिए अन्य भाषाओं को प्रयोग करते हैं.

मेरठ के मौलाना चतुर्वेदी
उत्तर प्रदेश के ही मेरठ जिले के एक और मौलाना हैं, जिन्हें 'चतुर्वेदी' के नाम से जाना जाता है. इनका नाम है शाहीन जमाली. जमाली के मुताबिक उन्होंने संस्कृत का अध्य्यन अपनी इच्छा के कारण किया. बाद में उन्होंने कई हिंदू धार्मिक पुस्तकें पढ़ीं. उनके बारे में कहा जाता है कि उनकी चारों वेदों पर समान रूप से पकड़ है.

शाहीन जमाली का कहना है कि अगर किसी मुस्लिम को चारों वेदों का ज्ञान हो जाए तो ये उसके लिए फक्र की बात है. उनका मदरसा धार्मिक सहिष्णुता के केंद्र के रूप में मशहूर है. अपने मदरसे में वो बच्चों को कुरान की आयतें और संस्कृत के श्लोक एक साथ पढ़ाते हैं. लंबे समय से इलाके में उनकी छवि संस्कृत के एक ऐसे विद्वान के रूप में है, जिनसे सलाह लेने हिंदू धर्म के लोग भी आते हैं.

मौलाना अपने मदरसे में छात्रों को सहिष्णुता का पाठ पढ़ाते हैं. वो मानते हैं कि इसके लिए दूसरे धर्मों के बारे में भी जानना जरूरी है. मौलाना चतुर्वेदी कहते हैं, ‘हमारा संदेश यह है कि लोगों में दूरी, ज्यादा ताकत की इच्छा से बढ़ती है. लेकिन मानवता के रिश्ते में कोई भेदभाव नहीं है, इसलिए वेदों में मानवता के बारे में कई गई बातों का हवाला देकर, मैं लोगों को एक दूसरे के करीब लाने की कोशिश करता हूं’. उनके मुताबिक, ‘वेदों में तीन मूल बातें कही गई हैं, भगवान की पूजा, इंसान की मुक्ति और मानव सेवा. मैं समझता हूं कि ये तीनों बातें इस्लाम के संदेश में पहले से ही मौजूद हैं’.

मौलाना चतुर्वेदी
मौलाना चतुर्वेदी


मुंबई के पंडित गुलाम दस्तगीर
संस्कृत भाषा से कुछ ऐसा ही प्रेम मुंबई के पंडित गुलाम दस्तगीर को भी है. मुंबई के वरली इलाके में घूमते हुए अगर कभी आपको 'अस्सलामु-अलेकुम गुरुजी' सुनने को मिल जाए तो आश्चर्य न कीजिएगा. पंडित दस्तगीर बीते कई दशक से संस्कृत भाषा की सेवा में लगे हुए हैं. महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में पैदा हुए पंडित दस्तगीर ने लंबे समय तक मुंबई के वरली हाई स्कूल में संस्कृत की शिक्षा दी.

एक समाचार एजेंसी को उन्होंने बताया था, 'मैंने संस्कृत भाषा पर अपनी पकड़ वेदों और दूसरे हिंदू संस्कृत ग्रंथों के जरिए मजबूत की है. हालांकि उन्होंने संस्कृत में पोस्ट ग्रेजुएट अपने जीवन के पांचवे दशक में मैसूर विश्वविद्यालय से किया.'

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First published: November 19, 2019, 10:52 AM IST
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