बुर्के पर फिर क्यों दुनियाभर में मचा है कोहराम, खफा हैं मुस्लिम

श्रीलंका में बुर्के पर बैन के बाद दुनिया भर में इसे लेकर बहस तेज है. हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक साल पहले बुर्के पर प्रतिबंध को गलत बताया था

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: April 30, 2019, 9:14 PM IST
Sanjay Srivastava
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: April 30, 2019, 9:14 PM IST
दुनिया भर में बुर्के पर पाबंदी को लेकर बहस और नाराजगी तेज हो गई है. कोलंबो धमाकों के बाद श्रीलंका में 28 अप्रैल को बुर्के पर प्रतिबंध लगा दिया गया. इससे पहले दुनिया के 13 अन्य देश भी बुर्के पर बैन लगा चुके हैं. हर बार ऐसा कोई भी कदम नाराजगी और विरोध को जन्म देता रहा है. लिहाजा फिर बुर्के पर पाबंदी से दुनिया भर में कोहराम मच गया है. मुस्लिमों में खासी नाराजगी है. भारत में देवबंद के उलेमाओं ने तड़ से गहरी आपत्ति जाहिर कर दी.

श्रीलंका में बुर्के पर पाबंदी लगाने की मुख्य वजह सुरक्षा कारण है. इतने बड़े आतंकवादी हमले के बाद पूरा देश अब भी सदमे में है. ईस्टर के दिन कोलंबो के चर्चों और होटलों में जो धमाके हुए, उसके पीछे श्रीलंका के ही एक कट्टरवादी मुस्लिम संगठन का हाथ बताया जाता है. जिसके तार आतंकवादी संगठन आईएस से जुड़े हुए थे.



आतंकियों के आत्मघाती दस्ते में एक महिला भी शामिल थी जो बुर्के में होटल के अंदर गई थी. इन्हीं सब वजहों से श्रीलंका के राष्ट्रपति ने 28 अप्रैल को घोषणा की कि सुरक्षा कारणों से अब देश में सार्वजनिक स्थानों पर बुर्के का इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा.

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ये हैं वो देश जहां बुर्का पर पाबंदी है
श्रीलंका के अलावा आंशिक या पूरे तौर पर जिन देशों में बुर्का पहनने पर पाबंदी लगा रखी है, उनमें आस्ट्रिया, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, बेल्जियम, ताजकिस्तान, तंजानिया, बुल्गारिया, कैमरून, चाड, कांगो, गैबन, नीदरलैंड्स, चीन और मोरक्को शामिल हैं. यानी केवल यूरोप ही नहीं बल्कि अफ्रीकी देशों में इस तरह का बैन लगा हुआ है.

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क्या होता है बुर्का  
बुर्का का मतलब है अपने चेहरे को खास परिधान के जरिए ढंकना, जिससे कोई उसे देख नहीं सके.  मुस्लिम महिलाएं इसे पहनती हैं. इसे उनके कल्चर से जोड़कर भी देखा जाता है. बुर्के को लेकर कई देशों में तो खासे कड़े रिवाज हैं, जहां इसे पहनना अनिवार्य है. नहीं पहनने पर वो सजा की हकदार होती हैं. बुर्के भी कई रूप हैं.मसलन-अबाया, चादोर, हिजाब, जिलाब, खिमार और निकाब. अलग-अलग देशों में इसको पहनने के तरीके भी अलग हैं.

श्रीलंका में नाराजगी
श्रीलंका सरकार के बुर्का पर प्रतिबंध की घोषणा के बाद से वहां मुसलमानों में गुस्सा है. उनका कहना है कि सरकार जानबूझकर एक मजहब को निशाना बना रही है. श्रीलंका की महिलाओं में खासतौर पर इससे  नाराजगी है.

क्या कह रहा है देवबंद
एशिया के मुस्लिमों के बीच देवबंद के फतवों को गंभीरता से लिया जाता है. देवबंद के उलेमाओं ने कहा है कि श्रीलंका की हुकूमत एक फिरके को टारगेट कर रही है, जो सही सोच नहीं है. हालांकि उलेमाओं ने कोलंबो धमाकों की भी निदा की है.

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संयुक्त राष्ट्र भी इसे गलत मानता है
हालांकि यहां ये बताना जरूरी है कि संयुक्त राष्ट्र ने एक साल पहले 2018 में अपनी ह्यूमन राइट्स कमेटी के जरिए बुर्का पर प्रतिबंध को गलत बताया था. उसका कहना है कि ये महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन तो है ही साथ ही धार्मिक तौर पर उनके विश्वासों को ठेस पहुंचाना भी.

बुर्का परंपरा को इस्लाम में उनकी संस्कृति से भी जोड़कर देखा जाता रहा है


हालांकि दुनिया भर में बहुत से मुस्लिम स्कॉलर महिलाओं को बुर्का में रखने को सही नहीं मानते हैं. उनका कहना कि महिलाओं के लिए ऐसा करना कतई जरूरी नहीं है.

क्या कहता है कुरान
मौलाना फिरंगी महली की दलील है कि कुरान में अल्लाह ने पैगम्बर मोहम्मद का उद्धरण देते हुए बताया, “अपनी बीवियों, बेटियों और मुसलमानों की औरतों से कह दो कि अपने ऊपर चादर लटका लिया करें. इससे बहुत जल्द उनकी पहचान हो जाएगी और फिर वे सतायी नहीं जाएंगी.”

मौलाना ने कहा कि परदा शरीयत का अहम हिस्सा है. श्रीलंका में बुर्का पर पाबंदी को लेकर मौलाना ने कहा, मजहबी आजादी का हक हर एक को हासिल है और इसमें मुसलमान भी शामिल हैं.

बुर्का का इतिहास
ज्यादातर लोगों को लगता होगा कि बुर्के की प्रथा इस्लाम के साथ आई होगी, लेकिन ऐसा नहीं है. इसका इतिहास इस्लाम से ज्यादा पुराना है. पहली सदी से पहले बेंजाटाइन साम्राज्य, जिसे पूर्वी रोमन साम्राज्य भी कहा जाता था, उसमें महिलाएं सिर को बांधती थीं लेकिन चेहरा नहीं ढंकती थीं. लेकिन अरब देशों में जहां तेज धूप रहती है और रेत भरी हवाएं चलती थीं, वहां महिलाएं चेहरे को बचाने के लिए उसे विशेष परिधानों से ढंकती थीं, ताकि वो रेत और धूप से बची रहें.

इतिहास बताता है कि बुर्का इस्लाम से ज्यादा पुराना है. अलबत्ता इस्लाम ने उसे अपने मजहब का हिस्सा बना लिया


इस्लाम से पहले से था चेहरे को ढंकने का रिवाज
पहली सदी में ग्रीक ज्योग्राफर स्त्राबो ने लिखा है कि उसने पहली सदी में मध्य दुनिया के देशों में महिलाओं को चेहरा ढंके हुए देखा था. अफगानिस्तान और कई अन्य देशों में भी इस्लाम से पहले इस तरह से चेहरा ढंका जाता था. बालों को बचाने के लिए सिर को कपड़े से बांधकर रखते थे. जब इस्लाम आया, तो उसने इस परिपाटी को अपनी संस्कृति का हिस्सा बना लिया.
पर्दा प्रथा का ही एक पहलू है बुर्का का चलन. बुर्का एक तरह का घूंघट है जो मुस्लिम समुदाय की महिलाएं और लड़कियां कुछ खास जगहों पर खुद को पुरुषों की निगाह से अलग रखने के लिए इस्तेमाल करती हैं.

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भारत में पर्दा प्रथा इस्लाम की देन
भारत में हिन्दुओं में पर्दा प्रथा इस्लाम की देन है. इस्लाम के प्रभाव से और इस्लामी आक्रमण के समय खुद के बचाव के लिए हिंदू स्त्रियां भी पर्दा करने लगीं. इस प्रथा ने मुग़ल शासकों के दौरान अपनी जड़ें काफी मज़बूत कीं. वैसे इस तरह की प्रथा की शुरुआत भारत में12वीं सदी में मानी जाती है. प्राचीन भारत में बहुएं भी पर्दे में लोगों के सामने नहीं आती थीं. वो अपना सिर खुला ही रखती थीं.

संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार कमेटी ने जरूर एक साल पहले बुर्का प्रतिबंध को गलत ठहराते हुए इसे महिलाओं के अधिकारों पर आघात बताया था


भारत के संदर्भ में ईसा से 500 वर्ष पूर्व रचित 'निरुक्त' में इस तरह की प्रथा का वर्णन कहीं नहीं मिलता. निरुक्तों में संपत्ति संबंधी मामले निपटाने के लिए न्यायालयों में स्त्रियों के आने-जाने का उल्लेख मिलता है. न्यायालयों में उनकी उपस्थिति के लिए किसी पर्दा व्यवस्था का विवरण ईसा से 200 वर्ष पूर्व तक नहीं मिलता. इस काल के पूर्व के प्राचीन वेदों तथा संहिताओं में पर्दा प्रथा का विवरण नहीं मिलता.

कैसे आतंकी उठा रहे थे बुर्के का फायदा
ज्यादातर देशों में, जहां बुर्के पर प्रतिबंध लगाया गया है, उनका कहना है कि बुर्के के आड़ में आतंकवादी अपना काम करके निकल जाते थे और पता भी नहीं लगता था कि बुर्के के अंदर कोई महिला या पुरुष. यूरोपीय देशों में कई आतंकवादी घटनाओं में ये वाकया हुआ. कई आपराधिक वारदातों में भी ये बात सामने आई कि अपराधी बुर्का पहनकर पहुंचे, जिससे उनकी जांच नही हो पाई कि बुर्के की आड़ में कौन है.

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