मुसलमान नहीं छापते ​थे उर्दू अखबार 'वंदे मातरम', जानें पूरा सच सबूतों के साथ

वायरल दावों का सच : बंकिमचंद्र की जयंती और लोकसभा में राष्ट्रगीत वंदे मातरम के विरोध के बाद गरमाई राजनीति के बीच सोशल मीडिया पर आपको पुराने उर्दू अखबार की तस्वीरों के साथ दावा मिलेगा कि अखंड भारत में वो अखबार मुसलमान निकाला करते थे.

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: June 27, 2019, 3:08 PM IST
मुसलमान नहीं छापते ​थे उर्दू अखबार 'वंदे मातरम', जानें पूरा सच सबूतों के साथ
20वीं सदी में छपने वाला उर्दू अखबार वंदे मातरम. लाल घेरे में छुपा है सच.
Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: June 27, 2019, 3:08 PM IST
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की 181वीं जयंती मनाई जा रही है और देश भर में नेता उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं. दूसरी तरफ, लोकसभा के मानसून सत्र के दौरान मुस्लिम सांसद के आपत्ति दर्ज कराए जाने के बाद राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' को लेकर सांप्रदायिक राजनीति भी गरम है. ऐसे में सोशल मीडिया पर इस तरह के संदेश प्रसारित किए जा रहे हैं कि 20वीं सदी में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लाहौर से 'वंदे मातरम' टाइटल से एक डेली उर्दू अखबार छापा जाता था, जिसके प्रकाशक और संपादक मुसलमान हुआ करते थे. लेकिन, जानिए कि ये कितना सही है और क्या है इस अखबार का सच.

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पहले जानिए बंकिमचंद्र के रचे 'वन्दे मातरम' गीत की कहानी. 19वीं सदी में जब ब्रिटिश शासकों ने सरकारी समारोहों में 'गॉड सेव द क्वीन' गीत को अनिवार्य कर दिया था, तब अंग्रेजों की इस तानाशाही से खिन्न सरकारी अधिकारी बंकिमचंद्र ने संस्कृत और बांग्ला में रचे बसे वन्दे मातरम गीत की रचना की. पहले इस गीत में दो ही पद्यांश थे लेकिन बाद में जब बंकिमचंद्र ने आनंदमठ उपन्यास लिखा, तब भारत मां को दुर्गा के रूप में वर्णित करते हुए इस गीत को विस्तार दिया.

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वंदे मातरम के र​चयिता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय


वंदे मातरम ऐसे बना राष्ट्रगीत
इस गीत का असर जंगल में आग की तरह हुआ. संन्यासी विद्रोह के साथ ही, क्रांतिकारियों ने स्वाधीनता संग्राम में 'वंदे मातरम' को नारा बना लिया. बरसों तक नारे और भारत मां की वंदना के तौर पर ये गीत गूंजता रहा. साल 1937 में राष्ट्रगान व राष्ट्रगीत चुनने के मुद्दे पर कांग्रेस ने चिंतन किया. जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित समिति, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे, ने पाया कि इस गीत के शुरुआती दो पद तो मातृभूमि की प्रशंसा में थे, लेकिन बाद के पदों में देवी-देवताओं का जिक्र था. इसलिए यह निर्णय लिया गया कि इसे राष्ट्रगीत के तौर पर स्वीकारा जाए और शुरुआती दो पदों को ही राष्ट्र-गीत के रूप में समझा जाए.
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भगत सिंह के चाचा ने बनाई थी वंदे मातरम सोसायटी
इतिहासकार यशपाल व ग्रोवर लिखित किताब 'आधुनिक भारत के इतिहास' में उल्लेख है कि 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम के बाद पंजाब में क्रांति की लहर दौड़ी थी और 20वीं सदी में कई नेता क्रांति के लिए जनसमर्थन जुटाने में मशगूल थे. 1916 के आसपास सरदार अजीत सिंह ने वंदे मातरम सोसायटी की स्थापना की थी, जिसका मकसद स्वाधीनता संग्राम की भावना को प्रसारित करना और अनेक माध्यमों से क्रांति के लिए सहयोग हासिल करना था. शहीद भगत सिंह के चाचा के तौर पर ज़्यादा पहचाने जाने वाले अजीत सिंह की बनाई इस सोसायटी में लाला लाजपत राय जैसे कई लोकप्रिय नेता जुड़े थे.

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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लाला लाजपत राय.


लालाजी ने शुरू किया वंदे मातरम अखबार
इसी सोसायटी के सहयोग से 1920 में लाला लाजपत राय ने लाहौर से उर्दू में 'वंदे मातरम' शीर्षक से डेली अखबार का प्रकाशन शुरू किया. यशपाल एंड ग्रोवर की किताब के अलावा इतिहासकार विपिन चंद्रा की किताब 'भारत का स्वाधीनता संग्राम' में भी इस सोसायटी और अखबार की कहानी का उल्लेख मिलता है. वहीं, जे नटराजन लिखित किताब 'हिस्ट्री ऑफ इंडियन जर्नलिज़्म' में उल्लेख है कि लालाजी ने इस अखबार को शुरू करवाया और दिल्ली में सरदार मोहन सिंह साहनी इस अखबार का संपादन करते थे.

उर्दू में उस दौरान 50 से ज़्यादा छोटे-छोटे अखबार छपते थे और प्रताप, मिलाप, वीर भारत, तेज, हिंद समाचार, प्रभात, सदाकत जैसे अखबारों का प्रकाशन या संपादन हिंदू पत्रकार या क्रांतिकारी किया करते थे. कुछ उर्दू अखबारों का प्रकाशन और संपादन उस वक्त मुसलमान भी बराबरी से कर रहे थे.

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वंदे मातरम अखबार को लेकर छपी एक भ्रामक खबर.


सोशल मीडिया कर रहा है भ्रमित
यूट्यूब, फेसबुक, ट्विटर और वॉट्सएप जैसे सोशल मीडिया मंचों पर इस तरह के संदेश प्रसारित किए जा रहे हैं कि उर्दू अखबार वंदे मातरम मुसलमानों द्वारा प्रकाशित या संपादित किया जाता था. ये दावे गलत हैं, जिसके प्रमाण दिए जा चुके हैं. मीडिया समूहों की कुछ वेबसाइटों पर भी सोशल मीडिया में चल रहे इसी तरह के दावों के आधार पर खबरें लिख दी गई हैं लेकिन सच क्या है? ये जानने के लिए या तो इतिहास की प्रामाणिक किताबें टटोलें या फिर गूगल पर टाइप करें : लाला लाजपत राय+उर्दू डेली+वंदे मातरम (अंग्रेज़ी में टाइप करें) तो आपको ऐसे सर्च रिज़ल्ट्स मिलेंगे, जो बता देंगे कि सच क्या है.

शेयर की जा रही तस्वीरों में ही हैं सबूत
सोशल मीडिया पर जो दावे किए जा रहे हैं, उनके साथ लाहौर से छपने वाले उर्दू अखबार वंदे मातरम के 1931 और 1927 के एक संस्करण की तस्वीरें शेयर की जा रही हैं. ज़ाहिर है कि उर्दू में लिखा हुआ है और अगर आप उर्दू पढ़ना नहीं जानते हैं तो किसी जानकार को ये तस्वीर दिखाकर पुष्टि करें. चार लाल घेरों में क्या लिखा है, ये जानकर समझें पूरा सच.

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लाहौर से प्रकाशित उर्दू डेली वंदे मातरम की ये तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर हो रही है.


फैक्ट 1 : 1931 के संस्करण की इस तस्वीर में सबसे ऊपर लिखा है The Daily Bande Mataram. उसके नीचे उर्दू में लिखा है 'रोज़ाना बंदे मातरम'. ये अखबार के टाइटल्स हैं. उर्दू टाइटल के नीचे पहले लाल घेरे में लिखा है : 'संपादक - पंडित करमचंद शुक्ल'.
फैक्ट 2 : संपादक के नाम के नीचे जो दाएं हाथ पर जो पहला बॉक्स लाल घेरे में है, उसमें लिखा है 'जिल्द 12'. इसका मतलब है कि अखबार के प्रकाशन का वो 12वां साल था.
फैक्ट 3 : इस घेरे के नीचे तीसरे लाल घेरे में अखबार की मुख्य खबर छपी है जिसका शीर्षक है 'सरदार भगत सिंह, मिस्टर राजगुरु, मिस्टर सुखदेव की नाशों की बेहुरमती की तहकीकात'.
फैक्ट 4 : चौथे लाल घेरे में अखबार के निचले भाग यानी एंकर स्टोरी के तौर पर खबर छपी है, जिसका शीर्षक है 'जेल की तंगो तारीक कोठरी में बंद सरदार भगत सिंह का अपने हाथ से लिखा आर्टिकल'.
फैक्ट 5 : 1927 के संस्करण की तस्वीर ऊपर चस्पा है. जिसमें टाइटल के ऊपर लाल घेरे में लिखा है 'ओम'.

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अरबिंदो घोष द्वारा प्रकाशित वीकली बंदे मातरम की तस्वीर. स्रोत: विकिपीडिया.


आखिर में, ये भी जानें चूंकि बंकिमचंद्र का गीत 'वंदे मातरम' बेहद लोकप्रिय था और नारा बन चुका था इसलिए कई तरह के साहित्य और सूचनाओं में इसका अलग तरह से इस्तेमाल हो रहा था. 1905 में अरबिंदो घोष ने अंग्रेज़ी में इसी टाइटल से साप्ताहिक अखबार निकाला था.

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First published: June 27, 2019, 2:34 PM IST
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