नन, जिसने कहा 'मुझे मार डालो', सिपाही, जिसने कहा 'नहीं चलाऊंगा गोली'

म्यांमार में सेना के तख्तापलट के बाद फोर्स विरोध प्रदर्शनों को कुचल रही है.

म्यांमार में सेना के तख्तापलट के बाद फोर्स विरोध प्रदर्शनों को कुचल रही है.

म्यांमार की चुनी हुई नेता आंग सान सू की (Aung San Suu Kyi) को जबरन हटाने, कैद करने के बाद सत्ता जब सेना ने अपने हाथ में ले ली, तबसे यानी करीब डेढ़ महीने से आंदोलन (Myanmar Movement) हो रहे हैं, जो अब ऐतिहासिक रूप ले चुके हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 14, 2021, 8:00 AM IST
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इतिहास की सबसे यादगार कहानियां वो हैं, जहां युद्ध के तांडव के बीच प्यार और इंसानियत की कविता रची गई है. मौजूदा समय में धरती के कई हिस्से जंग से सने हुए हैं, जहां से रह-रहकर मानवता की पुकार उठती है. मानवीय संवेदनाओं को झकझोरती ऐसी ही दो कहानियां म्यांंमार (Human Stories from Myanmar) से गूंज रही हैं, जिनमें एक सिपाही सीमाएं लांघकर भारत में प्रवेश (Myanmar Policemen Enter India) करता है तो एक नन खून के प्यासों के सामने घुटने टेककर उन्हें मनुष्यता की सीमा न तोड़ने की दुहाई देती है.

कहानी 1 : अपना ही तो ख़ून है!

​भीड़ जमा होती जा रही थी. नारे लगाती हुई भीड़ रुकने का नाम नहीं ले रही थी. विरोध प्रदर्शन को काबू करने के लिए जो पुलिस बल तैनात था, उसे सेना ने आदेश दिए थे कि किसी भी कीमत पर प्रदर्शन बड़ा न हो पाए, उससे पहले ही उसे कुचल दिया जाए. म्यांमार के खंपाट कस्बे में 27 फरवरी को प्रदर्शन को कुचला जाना था.

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कमांडिंग अफसर ने अपने सिपाहियों से कड़क आवाज़ में कहा 'सबमशीनगन उठाओ और बढ़ रही भीड़ पर गोलियां दाग दो, फायर.' लेकिन लोगों की आंखों में खौल रही नाराज़गी और चेहरे पर दिख रही निडरता का आलम था कि था पेंग ने अपने अफसर का आदेश मानने से इनकार कर दिया.

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म्यांमार में प्रदर्शनकारियों को खदेड़ने के लिए पानी की बौछार व आंसू गैस से लेकर गोलियां तक चलाई जा रही हैं.


सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) को कुचलने के लिए यह अवज्ञा अफसर को कबूल नहीं थी. 'पेंग, गोली चलाओ, यह हुक्म है.' 'गोली नहीं चलाऊंगा सर, यह इरादा है.' और पेंग वहां से चला गया. पेंग को देखकर उसके छह साथियों ने भी ज़ुल्म के हुक़्म से अवज्ञा का रास्ता चुना.



अगले दिन पेंग की पेशी बड़े अफसर के सामने हुई. 'क्या तुम शूट करने के आदेश मानोगे?' 'सॉरी सर, यह रहा मेरा इस्तीफ़ा.' और 1 मार्च को अपने परिवार को खंपाट में ही छोड़कर पेंग सटी हुई सीमा से मिज़ोरम के रास्ते भारत में चला आया क्योंकि वहां उसकी जान को खतरा हो चुका था.

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भारत पहुंचकर उसने अपनी यह कहानी सुनाई उसकी पहचान को काफी हद तक छुपाकर यह कहानी मीडिया में आई. यह कहानी पेंग के अलावा भी कुछ और सिपाहियों की है, जिसके मुताबिक :

हमारे देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन चरम पर पहुंच रहा है और सत्ता द्वारा तख़्तापलट का विरोध कई जगहों पर भड़क रहा है. हमें हुक्म दिए जा रहे थे कि आंदोलन कर रहे लोगों को शूट कर दिया जाए. लेकिन हम वो हिम्मत कहां से लाते कि शांति से जायज़ आंदोलन कर रहे अपने ही लोगों को मार डालें...


कहानी 2 : वीडियो में दर्ज है दर्द

बुद्ध को मानने वाली ज़्यादातर आबादी वाला देश लोकतंत्र की वापसी के लिए आवाज़ उठा रहा है, तो सेना उस आवाज़ को कुचलने के लिए आंसू गैस से लेकर गोली चलाने में भी कोई दया नहीं कर रही. काचीन राज्य के मियिटकिना शहर में देखते ही देखते प्रदर्शनकारी जमा होने लगे तो पूरे जिरह बख्तर के साथ हथियारबंद फोर्स ताकत का प्रदर्शन करने के लिए तैयार हुई.

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वायरल वीडियो में एक नन पुलिस बलों के सामने इस तरह गुहार लगाती नज़र आईं.


वहीं छोटे मासूम बच्चों की हिफाज़त को लेकर डर गई सिस्टर एन रोज़ ने जब देखा कि पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच वो बच्चों के साथ इस ​तरह घिर गईं कि गोली चली तो जान किसी की भी जा सकती थी. सिस्टर रोज़ के पास रास्ता नहीं था, तो वो अपने घुटनों पर बैठकर खून के प्यासों के सामने गिड़गिड़ाने लगीं.

फोर्स के सिर पर जैसे खून सवार था और कान बंद हो चुके थे. 45 वर्षीय सिस्टर रोज़ घुटनों पर बैठकर हाथ जोड़े थीं, तभी फोर्स के एक आदमी ने रोज़ के पीछे खड़े प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं. डरे हुए बच्चों में भगदड़ के हालात बनते देख रोज़ और उनकी साथी नन भी प्रार्थना करती रहीं.

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तभी रोज़ की चीख यूं निकली कि एक पल को आवाज़ गले में दफ़न हो गई. एक प्रदर्शनकारी उनके पीछे से सामने गिरा, जिसके सिर में गोली लगी थी. बस किसी भी पल दुनिया खत्म होने वाली थी. पूरी शिद्दत और दर्द अपनी आवाज़ में भरकर रोज़ ने कहा : 'गॉड के वास्ते मासूमों पर रहम करो, मेरी जान ले लो, लेकिन इन बच्चों और निर्दोषों को बख़्श दो..'

इंसानियत की तबाही

म्यांमार में इन दिनों सेना के तख्तापलट के चलते हर जगह तबाही का मंज़र दिख रहा है. लंबे समय से चल रहे संघर्ष के कारण उत्तरी राज्य काचीन से हज़ारों नहीं लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं. सिस्टर एन इससे पहले भी इसी तरह के खतरे का सामना कर चुकी थीं और अपने साथियों को बचाने के लिए हथियारबंद फोर्स के सामने गिडगिड़ा चुकी थीं.

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म्यांमार की नेता सू की की सत्ता में वापसी की मांग को लेकर भारी विरोध प्रदर्शन जारी हैं.


जब दोबारा रोज़ ने ऐसा ही किया तब उन्हें लोकल बिशप और साथी ननों का साथ मिला और फोर्स के कुछ सिपाही भी घुटनों पर आए. एक तरफ इंसानियत के लिए गुहार और क्रंदन की आवाज़ें हैं तो दूसरी तरफ, म्यांमार में गोलियां इस तरह गूंज रही हैं, जैसे जो सिर नहीं झुकाएगा, वो ज़िंदा बचेगा ही नहीं.

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अब तक म्यांमार के विरोध प्रदर्शनों में करीब 60 लोग फोर्स के हाथों मारे जा चुके हैं. यह आंकड़ा और भी ज़्यादा हो सकता है. लेकिन युद्ध में इंसानियत को घबराना नहीं जागना ही होता है. जैसा कि सिस्टर रोज़ ने कहा भी : 'हमें साहस से काम लेना ही होगा. हम बगैर कुछ भी किए चुपचाप खड़े सब कुछ खत्म होते देख नहीं सकते..'
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