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मिल्की वे में मिले 500 प्रकाशवर्ष चौड़े छेद ने वैज्ञानिकों को किया हैरान

यह गड्ढा खगोलविदों ने हमारी ही गैलेक्सी (Galaxy) मिल्की वे में खोजा है. (तस्वीर: Alyssa Goodman/Center for Astrophysics _ Harvard & Smithsonian)

यह गड्ढा खगोलविदों ने हमारी ही गैलेक्सी (Galaxy) मिल्की वे में खोजा है. (तस्वीर: Alyssa Goodman/Center for Astrophysics _ Harvard & Smithsonian)

मिल्की वे (Milky Way) गैलेक्सी के पर्सियस और टॉरस तारामंडल (constellation) में एक 500 प्रकाशवर्ष चौड़ा एक छेद (Giant Cavity Space) मिला है जिसकी उत्पत्ति की वजह उन्हें स्पष्ट नहीं हो पा रही है.

  • News18Hindi
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    हमारी मिल्की वे (Milky Way) गैलेक्सी का गहराई से अध्ययन कनरे वाले खगोलविदों ने अंतरिक्ष में एक विशाल गड्ढे (Giant Cavity) की खोज की है. यह गोलाकार छिद्र आसमान में दिखने वाले पर्सियस और टॉरस तारामंडलों में देखा गया है. यह छिद्र 500 प्रकाशवर्ष चौड़ा है. माना जा रहा है कि यह पुरातन सुपरनोवा (Supernova) से बना था जो एक करोड़ साल पहले विस्फोटित हुआ है. यह छिद्र असमान्य कहा जा रहा है कि क्योंकि यह ऐसी जगह मिला है जहां तारों का निर्माण हो रहा है. इसके अलावा इसकी उत्पत्ति का कारण भी वैज्ञानिक अभी तक स्पष्ट रूप से पता नहीं लगा सके हैं.

    यह नई खोज संयोग से तब हुई जब खगोलविद आसपास के क्षेत्र के आणविक बादलों के 3डी नक्शे का अध्ययन कर रहे थे. यह रहस्यमयी छेद पर्सियस और टॉसर के आणविक बादलों से घिरा हुआ  है.  यह वह क्षेत्र है जहां बादलों का निर्माण होता है. खगोलविदों ने इस छेद का नाम ‘पर टाउ शेल’ रखा है. यह अध्ययन एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लैटर्स में प्रकाशित हुआ है.

    दोनों तारमंडल की आणविक बादलों का संबंध
    इस अध्ययन के अनुसार पर टाउ शेल ऐसे त्रिआयामी परिघटना का अवलकोन दिखाता है, जिससे सैद्धांतिक रूप से आणविक बादलों और तारों के निर्माण होता है जो पुराने तारों और सुपरनोवा घटनाओं के कारण होती हैं. हार्वर्ड और स्मिथसन के खगोलभौतिक केंद्र की शोधकर्ताओं की टीम का मानना है कि इस अध्ययन की पड़ताल बता रही है कि पर्सियस और टॉरस के आणविक बादल अंतरिक्ष एक दूसरे से स्वतंत्र संरचना नहीं हैं.

    दो कारण हो सकते हैं
    शोधकर्ताओं का कहना है कि दोनों ही तारामंडल के आणविक बादलों का निर्ण किसी सुपरनोवा के प्रभाव के कारण हुआ है. इस विशाल बुलबुले की सतह पर सैकड़ों तारे बन रहे हैं या फिर पहले से ही मौजूद हैं. शोधकर्ताओं के पास इसकी दो व्याख्याएं हैं. या तो बुलबुले के केंद्र में से एक सुपरनोवा विस्फोट हुआ और उससे गैस बाहर की ओर धकेल दी गईं  जिसे हमें पर्सियस-टॉरस सुपरशेल कहते हैं. या फिर एक के बाद लाखों सालों तक सुपरनोवा की शृंखला से यह विशाल बुलबुला बना.

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    शोधकर्ताओं ने पहली बार आणविक बादलों (Atomic Cloud) की त्रिआयामी तस्वीर निकली है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    गाइगा वेधशाला के आंकड़े
    ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है वहीं मानव की तकनीकी पहुंच का भी, जिससे वह अंतरिक्ष की और गहराई से जानकारी हासिल कर पा रहा है. ताजा जानकारी बुलबुले के थ्रीडी मैप का नतीजा है जो यूरोपीय स्पेस एजेंसी की अंतरिक्ष वेधशाला गाइगा के आंकड़ों का उपयोग कर बनाए गए हैं. मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर एस्ट्रोलॉजी के शोधकर्ताओं ने धूल की जानकारी निकालने और थ्रीडी मैप के आधार पर बुलबुले का अध्ययन किया.

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    पहली बार बने थ्रीडी नक्शे
    पहली बार आणविक बादलों के ये त्रिआयामी नक्शे बनाए गए हैं. इससे पहले की बादलों की सभी तस्वीरें द्विआयामी थीं. इस अध्ययन की अगुआई करने वाली शोधकर्ता कैथरीन जुकर का  कहना है कि इन बादलों को दशकों से देखा जा सकता था, लेकिन उनके सही आकार की जानकारी नहीं मिल सकी थी. इनकी दूरी का भी स्पष्टता से पता नहीं चल पा रहा था.

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    मिल्की वे (Milky Way) गैलेक्सी में इस तरह की संरचना पहली बार देखने को मिली है. (तस्वीर: NASA_JPL-Caltech)

    बिना सिम्यूलेशन के
    जुकर ने बताया कि खगोलविदों ने अब तक सिम्यूलेशन्स के जरिए इस चीजों का परीक्षण किया लेकिन यह पहली बार है कि  बिना सिम्यूलेशन के त्रिआयामी स्तर के दृश्यों की थ्योरी और अवलोकनों की तुलना की और इस बात की जांच की कि कौन सी थ्योरी सही तरह से इन पर काम कर रही है.

    सौरमंडल बनाने वाली धूल में मिले जीवन निर्माण करने वाले मूल तत्व

    शोधकर्ताओं ने पहली बार इस वास्तविकता के खगोलीय दृश्यावली सार्वजनिक तौर पर जारी की है जिससे लोग इस छेद और उसके आसपास के आणविक बादलों के बारे में जान सकें. इसके लिए उन्हें केवल क्यूआर कोड को स्कैन करना होगा और सारी जानकारी उनके स्मार्टफोन पर उपलब्ध हो जाएगी.

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