ईरान का रहस्यमयी गांव, जहां सिर्फ बौने बसते रहे

ईरान में माखुनिक नाम के इस गांव को बौनों का गांव कहा जाता है
ईरान में माखुनिक नाम के इस गांव को बौनों का गांव कहा जाता है

लिलीपुट ऑफ ईरान (Lilliput of Iran) कहलाने वाले इस गांव माखुनिक (Makhunik) में अब भी बहुत से घर ऐसे हैं, जहां केवल 2 से ढाई फीट ऊंचाई वाले लोग ही जा सकें.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 19, 2020, 3:09 PM IST
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अफगानिस्तान-ईरान की सीमा से सटा हुआ एक ईरानी गांव अपने-आप में अनोखा है. माखुनिक नाम के इस गांव को बौनों का गांव (Makhunik, village of little people in Iran) कहा जाता है. यहां की लगभग पूरी आबादी आज से लगभग 200 साल पहले इतने कम कद की होती थी कि उनके घर से लेकर जरूरत की दूसरी चीजें भी एकदम छोटी बनाई जाती थीं. आज भी माखुनिक में बहुत से मकान मिनिएचर मकान की तरह दिखते हैं. हालांकि अब यहां के लोगों के कद थोड़े बढ़े हैं लेकिन तब भी ये औसत ऊंचाई से कम ही हैं. जानिए, क्या है बौनों के इस गांव का रहस्य.

पहली बार आया चर्चा में
साल 2005 में गांव का नाम इंटरनेशनल मीडिया की सुर्खियां बना, जब वहां खुदाई के दौरान एक ममी मिली. उसकी लंबाई केवल 25 सेंटीमीटर थी. इससे पहले भी कई बार चर्चा हुई थी कि ईरान के इस गांव में आज से दो-तीन सौ साल पहले बौने रहते होंगे. ममी मिलने के बाद विशेषज्ञ इसे पक्का मानने लगे. वहीं कई विशेषज्ञों का कहना है कि ममी समय से पहले जन्मे किसी बच्चे की भी हो सकती है. जो भी हो, इस बात में कोई शक नहीं कि पहले इस गांव में कम कद के लोग रहते रहे होंगे.

village of little people
बंजर होने के कारण माखुनिक इलाके में लोगों की आवाजाही नहीं थी

तो आखिर क्या वजह है कि पूरे के पूरे गांव में कम कद के लोग हों!


इसके पीछे एक्सपर्ट कुपोषण को जिम्मेदार ठहराते हैं. तेहरान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक चूंकि ये ईरान का काफी बंजर इलाका है, लिहाजा यानी अनाज और फल-फूल की पैदावार नहीं थी. जो थोड़ी बहुत चीजें उपजती भी थीं, वो बेर, शलजम और जौ जैसी चीजें थीं. गांव के लोग इसे ही खाकर गुजारा करते रहे. धीरे-धीरे उनमें शारीरिक विकास घटने लगा और फिर कम कद वाले लोगों से गांव भर गया.

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धीरे-धीरे बढ़ा कद
बंजर होने के कारण इस इलाके में लोगों की आवाजाही भी नहीं थी, लिहाजा आवागमन का भी कोई जरिया नहीं था. यानी ये भी नहीं हो सकता था कि गांव के लोग बाहर जाकर खाने-पीने के बढ़िया सामान ला सकें. बीसवीं सदी के बीच में ही इस गांव तक सड़कें बनीं. इसके बाद गांव के लोग बाहरी दुनिया से जुड़े और शहर आकर रोजगार करने लगे. इस तरह से गांव के लोगों को खानपान सुधरा और धीरे-धीरे उनका कद भी बढ़ा.

village of little people
ये गांव अनोखेपन के कारण लिलीपुट ऑफ ईरान कहलाता है


पानी में मर्करी ज्यादा होना भी कारण
गांव और इसके आसपास के काफी बड़े इलाके में पानी में मर्करी की अधिकता है. इस वजह से भी कद पर असर पड़ा और लोगों की हाइट कम होती गई. अब शहरों से जुड़ने और खानपान में बदलाव के बाद शारीरिक विकास तो हुआ लेकिन अब तक गांव के लोग औसत से कम कद के ही हैं. लिलीपुट ऑफ ईरान कहलाने वाले इस गांव में, जैसा कि बीबीबी की एक रिपोर्ट बताती है, लगभग 200 घर हैं. इनमें से लगभग 80 घर अब भी ऐसे हैं, जिनमें 2 से 3 फीट के लोग ही रह सकें. वहां घरेलू जरूरतों के सारे सामान भी छोटे-छोटे हैं.

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कैसी है यहां के घरों की खासियत
यहां के घर फिलहाल ईरान में काफी लोकप्रिय हो रहे हैं. ये निथोलिथिक काल (Neolithic Era) के घरों से प्रेरित दिखते हैं. बता दें कि ये काल पाषाण युग के खत्म होने से ठीक पहले का समय था, जब इंसानों ने घर बनाना और खेती करना तक सीख लिया था. घर मिट्टी और खपरैल से बने हुए हैं, जिनमें कम से कम खिड़कियां हैं. किसी-किसी घर में एक भी खिड़की नहीं. विशेषज्ञ मानते हैं कि ये मौसम की मार से बचने के लिए किया जाता रहा होगा.

village of little people
अब भी माखुनिक गांव में आर्थिक बदहाली है


भविष्य में बढ़ सकता है रोजगार
ट्रांसपोर्ट शुरू होने के बाद से इस बंजर गांव से लोगों का बाहर जाना तो शुरू हुआ है लेकिन तब भी यहां आर्थिक बदहाली है. सूखे के कारण यहां खेती का काम नहीं होता, न ही कोई दूसरा रोजगार है. यही वजह है कि यहां के युवा ईरान के शहरों का रुख करने लगे.

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वैसे इस गांव का आर्किटेक्ट अपने आप में बहुत अनूठा है. यही वजह है कि कुछ जानकारों को उम्मीद है कि इस गांव में सैलानियों की तादाद बढ़ेगी. पर्यटन बढ़ने से यहां के लोगों के लिए रोज़गार भी बढ़ेगा.

चीन में भी है बौनों का गांव 
इसी तरह से चीन में शिचुआन प्रांत के एक गांव को भी दुनियाभर में बौनों का गांव कहा जाता है. यांग्सी नाम के इस गांव की आधी से ज्यादा आबादी की ऊंचाई लगभग 2 फीट है. यहां के लोगों की ऊंचाई कम क्यों है, ये बात आज भी रहस्यों के साये में है. वैज्ञानिकों ने यहां की मिट्टी से लेकर पानी और हवा तक का अध्ययन किया लेकिन कुछ भी ऐसा अलग-सा सामने नहीं आया, जो इसकी पक्की वजह बता सके. साल 1997 में इसकी वजह इस जगह के जमीन के अंदर पारा होने की बात वैज्ञानिकों ने कही थी लेकिन ये बात प्रमाणित नहीं हो सकी.
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