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बहुत आसान है X आकार की गैलेक्सी का निर्माण, संयोग से हुआ खुलासा

यह गैलेक्सी (Galaxy) एक सिम्यूलेशन प्रक्रिया के नतीजे के तहत बनी थी. (तस्वीर: Aretaios Lalakos/Northwestern University)

यह गैलेक्सी (Galaxy) एक सिम्यूलेशन प्रक्रिया के नतीजे के तहत बनी थी. (तस्वीर: Aretaios Lalakos/Northwestern University)

एक्स आकार की गैलेक्सी (X Shaped Galaxy) पर एक शोध में खगोलभौतिकविदों ने चौंकाने वाले नतीजे पाए हैं. सामान्यतः बहुत ही क ...अधिक पढ़ें

हाइलाइट्स

एक्स आकार की गैलेक्सी बहुत कम देखने को मिलती है.
इस तरह की गैलेक्सी वैज्ञानिकों के लिए आज भी रहस्य ही हैं.
शोध में पता चला है कि इनके निर्माण बहुत आसानी से हो जाता है.

खगोलविदों को ब्रह्माण्ड (Universe) में सामान्यतः अंडाकर गैलेक्सी ही दिखाई देती हैं जिनके केंद्र में एक सुपरमासिव ब्लैक होल (Black Hole) होता है. लेकिन कभी कभी  उन्हें एक्स के आकार की बहुत ही अलग तरह की गैलेक्सी (X shaped Galaxy) भी दिखाई दे जाती हैं जो पिछले दो दशकों से रहस्य बनी हुई हैं. अभी तक उनके बारे में ज्यादा विस्तार से जानकारी हासिल नहीं हो सकी थी जिसमें सबसे बड़ी बात यही थी कि उनका निर्माण कैसे होता है. नए अध्ययन में इन्हीं एक्स आकार की रेडियो गैलेक्सी की निर्माण प्रक्रिया का संयोग से एक सिम्यूलेशन  के जरिए पता चला है कि इनका निर्माण बहुत आसानी से हो सकता है.

चार दिशा में निकलते हैं जेट
एक्स आकार की गैलेक्सी आमतौर पर रेडियो टेलीस्कोप के जरिए देखी जाती हैं. ये एक्स आकार बानाती हुआ चार दिशाओं में जेट का उत्सर्जन करती दिखाई देती हैं जबकि सामान्य गैलेक्सी के केंद्र से केवल दो ही दिशा में जेट निकलती दिखाई देती है.

कहीं ज्यादा संख्या में होती हैं ये
इस अध्ययन में यह भी कहा गया है ये एक्सआकार की रेडियो गैलेक्सी जितना समझा जा रहा था, उससे कहीं ज्यादा संख्या में बनती हैं और सामान्य रूप से मिल सकती हैं.  नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी का यह अध्ययन एस्ट्रोफिजिक्स जर्नल लैटर्स में प्रकाशित हुआ है.  इसमें पहली बार बड़े पैमाने पर एक गैलेक्सी एक्रीशन सिम्यूलेशन बनाया गया है जिसमें सुपरमासिव ब्लैक होल से बहुत दूर से आती हुई गैलेक्टिक गैस का पता लगाया गया था.

पूरी तरह से अप्रत्याशित नतीजा
नॉर्थवेस्टर्न के खगोलवभौतिविदों ने अपने प्रतिमान में सामान्य स्थितियों को सुपरमासिव ब्लैक होल की पदार्थ निगलने की प्रक्रिया पर लागू किया और उसके जेट और एक्रीशन डिस्कके सिम्यूलेशन के जरिए निर्माण किया और उन्हें अप्रत्याशित रूप से एक एक्स आकार की रेडियो गैलेक्सी नतीजे के तौर पर हासिल हुई जिसने शोधकर्ताओं को चौंका दिया.

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सामान्य गैलेक्सी के ब्लैक होल से दो ही जेट (Jets) निकलती हैं, लेकिन एक्स आकार की गैलेक्सी से जेट चार दिशा में निकलती हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

शुरुआत में कमजोर जेट का निर्माण
हैरानी की बात यह है कि शोधकर्ताओं ने इस गैलेक्सी का एक्स आकार जेट और ब्लैक होल में गिरती हुई गैसे के बीच की अतंरक्रिया के जरिए हासिल किया. सिम्यूलेशन के शुरुआत में अंतर गिरती हुई गैस पहले नए निर्मित जेट से टकरा कर अलग दिशा में गई जो कभी चल रहे थे, कभी बंद हो जाते थे, कभी डगमगाते हुए दिखाई देते थे और अलग अलग दिशा में जाते हुए एक एक्स का आकार बना रहे थे.

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सरल स्थितियों से जटिल नतीजे
लेकिन अंततः ये जेट मजबूत होने लगते हैं और फिर गैस को चीरते हुए सटीक निकलते पाए जाते हैं. वे डगमगाना बंद करते हैं और एक ही अक्ष में स्थिर रहने लगते हैं. इसअध्ययन की अगुआई करने वाले खगोलभौतिविद एरिटाइयोस लालाकोस ने बताया कि उनहें पाया कि सरल समरूप शुरुआती स्थितियों में भी हमें बहुत जटिल नतीजे मिल सकते हैं.

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एक्स रेडियो गैलेक्सी (X Radio Galaxy) के निर्माण की धारणा इससे पहले स्पष्ट नहीं थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: NRAO/AUI/NSF; SARAO; DES)

अब तक ये थी धारणा
रेडियो गैलेक्सी की सामान्य व्याख्या यही है कि  दो गैलेक्सी टकराती हैं जिससे उनके सुपरमासिव ब्लैक होल का विलय होता है जिससे अवशेषी ब्लैक होल की स्पिन और उनके जेट कि दिशा में बदलाव आ जाते हैं.  एक विचार यह भी कि जेट का आकार तब बदलता है जब एक अकेले सुपरमासिव ब्लैक होल की जेट विशाल स्तर परआवरण की गैस से अंतरक्रिया करते हैं. लेकिन पहली बार शोधकर्ताओं ने पाया है कि एक्स आकार की रेडियो गैलेक्सी बहुत ही ज्यादा सरल तरह से बनती हैं.

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रेडियो गैलेक्सी प्रकाश उत्सर्जन के साथ भारी मात्रा में रेडियो उत्सर्जन करने के लिए जानी जाती है जिस वजह से इन्हें रेडियो गैलेक्सीकहा जाता है. पहली बार 1992 में एक्स गैलेक्सी नाम आकार के कारण दिया गया था. इस तरह की गैलेक्सी सभी रेडियो गैलेक्सी  की केवल 10 प्रतिशत हिस्सेदारी ही रखती हैं. लोलाकोस का मानना है कि इस तरह की गैलेक्सी बहुत सारी मात्रा में तो बनती होंगी, लेकिन वे बहुत कम समय तक ही कायम रह पाती होंगी. यही वजह है कि ये बहुत ही कम मात्रा में दिखाई देती हैं.

Tags: Galaxy, Research, Science, Space

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