पसीने में नहीं होती कोई गंध, तब क्यों लगता है ऐसा?

पसीने में नहीं होती कोई गंध, तब क्यों लगता है ऐसा?
पसीने की अपनी कोई गंध नहीं होती है, इसके लिए एक खास तरह का एंजाइम जिम्मेदार है - सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

पसीना अपने-आप में गंधरहित होता है लेकिन एक खास तरह के बैक्टीरिया के कारण इससे तेज गंध आने लगती है. वैज्ञानिक अब इस बैक्टीरिया को टारगेट करने जा रहे हैं.

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वैज्ञानिकों ने पता लगा लिया है कि अंडरआर्म्स ((बांहों के नीचे का हिस्सा) से आने वाली तेज गंध आखिर क्यों आती है. उनके मुताबिक इसके लिए पसीना अपने-आप में जिम्मेदार नहीं. पसीने की अपनी कोई गंध नहीं होती है, बल्कि इसके लिए एक खास तरह का एंजाइम जिम्मेदार है. वैज्ञानिकों ने इसे BO एंजाइम नाम दिया, जिसके कारण ही पसीने से गंध आती है.

यॉर्क यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इसपर रिसर्च की. इस दौरान पाया गया कि पसीने के कारण बांहों के नीचे बैक्टीरिया जमा हो जाते हैं. उनसे एक खास तरह का एंजाइम निकलता है, जो गंध की वजह होता है. इसे समझने के लिए ये देखा गया कि गंध कैसे बनती है. इस बारे में द गार्डियन में आई रिपोर्ट में सीनियर माइक्रोबायोलॉजिस्ट प्रोफेसर गेविन थॉमस ने पूरी प्रक्रिया समझाई. वे बताते हैं कि इंसानी शरीर से निकलने वाले पसीने की गंध को थियोअल्कोहल कहते हैं. ये खुद-बखुद पसीने से नहीं निकलती. बल्कि इसकी वजह होते हैं वे बैक्टीरिया जो पसीने से पैदा होते हैं और शरीर में ही अपना भोजन खोजते हैं. इसी दौरान एंजाइम्स निकलते हैं, जिससे गंध आती है.

इंसानी शरीर से निकलने वाले पसीने की गंध को थियोअल्कोहल कहते हैं (Photo-pixabay)




वैसे तो शरीर के दूसरे हिस्सों से भी पसीना आता है लेकिन उससे ऐसी गंध नहीं आती है. खास अंडरआर्म्स से तेज गंध की वजह वहां के खास बैक्टीरिया हैं, जिन्हें Staphylococcus hominis कहते हैं. जब वे आर्मपिट से निकलने वाले पसीने, जिसे Cys-Gly-3M3SH कहते हैं, में आहार खोजते और खाना शुरू करते हैं जो गंधरहित पसीना गंधयुक्त हो जाता है.
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वैसे इंसानी शरीर में दो तरह की पसीने की ग्रंथियां होती हैं. पहले तरह की ग्रंथियों को एक्राइन कहते हैं. ये पूरे शरीर में होती हैं. यही वो सिस्टम है जो शरीर का तापमान संतुलित रखता है. दूसरी तरह की ग्रंथियों को एप्रोक्राइन ग्लैंड कहते हैं. ये वहां खुलती हैं, जहां बाल होते हैं. ये जननांगों के साथ अंडरआर्म्स में भी पाई जाती हैं. इनके काम के बारे में भी खास जानकारी नहीं है. वैज्ञानिक मानते हैं कि कूलिंग सिस्टम में ही ये भी काम करते होंगे.

वैज्ञानिकों की यह रिसर्च साइंटिफिक रिपोर्ट जर्नल में आई है. इसमें वैज्ञानिकों ने विस्तार से बताया है कि कैसे अंडरआर्म्स में Staphylococcus बैक्टीरिया पसीने को अपने आहार में बदलते हैं, जिसके कारण थियोअल्कोहल बनता है. यही वो गंधयुक्त पसीना है, जिसे दूर करने के लिए लोग डिओ या परफ्यूम लगाते हैं. असल में हमारी नाक थियोअल्कोहल के लिए काफी संवेदनशील होती है और इसकी हल्की सी भी गंध खटकने लगती है. यही वजह है कि पसीने की गंध दूर से भी पता लग जाती है.

अंडरआर्म्स में Staphylococcus बैक्टीरिया पसीने को अपने आहार में बदलते हैं (Photo-pixabay)


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अब इस रिसर्च की मदद से पसीने को खत्म किए बगैर उसकी गंध दूर करने के तरीके खोजे जा रहे हैं. इसके लिए एक निजी कंपनी की मदद ली जा रही है ताकि वे ही बैक्टीरिया दूर किए जा सकें जो BO एंजाइम पैदा करते हैं, वहीं बाकी बैक्टीरिया को कोई नुकसान न पहुंचे. इस तरह का डियो बनाया जा सके तो वो स्किन के लिए भी कोई समस्या नहीं पैदा करेगा. इस बारे में टीम लीड थॉमस बताते हैं कि अगर ऐसा डियो बन सके जो सिर्फ Staphylococcus hominis बैक्टीरिया को टारगेट करे तो सबसे बढ़िया होगा. इससे उन बैक्टीरिया को खतरा नहीं होगा जो शरीर की सेहत के लिए जरूरी हैं.

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वैज्ञानिकों ने इस Staphylococcus hominis बैक्टीरिया के जेनेटिक रिलेशन्स को भी देखने की कोशिश की. इस दौरान पाया गया कि ये अकेला नहीं, बल्कि इस प्रजाति के अंदर दर्जनों बैक्टीरिया हैं. हालांकि इनमें से कुछ ही बैक्टीरिया ने अपने पूर्वजों से BO एंजाइम बनाने का गुण लिया है. वैसे पसीने की गंध प्यूबर्टी की उम्र में ही आनी शुरू होती है, तो इसका जननांगों से भी संबंध माना जा रहा है.
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