झूठे जासूसी केस में फंसे वो नंबी नारायणन, जिनकी कहानी पर बनाई माधवन ने फिल्म

नंबी के रोल में नज़र आएंगे माधवन.

नंबी के रोल में नज़र आएंगे माधवन.

बायोपिक (Bollywood Biopic) का दावा नहीं है, लेकिन आर माधवन स्टारर नई फिल्म रॉकेट्री (Rocketry-The Nambi Effect) बेशक नंबी नारायणन की कहानी पर आधारित है, जिन्हें इसरो में जासूसी करने के उस केस में प्रताड़ना झेलना पड़ी थी, जो बाद में बेबुनियाद साबित हुआ.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 5, 2021, 11:01 AM IST
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अभिनेता आर माधवन (R Madhavan Starrer Movie) पहली बार निर्देशन में हाथ आज़मा रहे हैं. अपनी पहली ही निर्देशित फिल्म 'रॉकेट्री - द नंबी इफेक्ट' में माधवन खुद एक रॉकेट वैज्ञानिक (Rocket Scientist) की मुख्य भूमिका निभाते दिख रहे हैं. इस फिल्म के ट्रेलर ने इंटरनेट पर धूम मचा दी है, तो लोगों की दिलचस्पी बढ़ गई है कि आखिर नंबी नारायणन कौन (Who is Nambi Narayanan) हैं, जिनके जीवन पर यह फिल्म आधारित है. इससे पहले कि आप इन गर्मियों में यह फिल्म देखें, जानिए कि 2019 में पद्मभूषण (Padma Bhushan) से नवाज़े गए नंबी नारायणन कितने महत्वपूर्ण व्यक्तित्व रहे हैं और किस फर्ज़ी केस ने एक ड्रामा फिल्म के लिए स्क्रिप्ट दी.

एक नज़र में नंबी नारायणन

तमिलनाडु से ताल्लुक रखने वाले वैज्ञानिक और एयरोस्पेस इंजीनियर नंबी इसरो के सायरोजेनिक्स विभाग के प्रमुख थे, जब वो एक जाली जासूसी कांड में फंसे. नवंबर 1994 में नंबी पर आरोप लगा था कि उन्होंने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़ी कुछ गोपनीय सूचनाएं विदेशी एजेंटों से साझा की थीं. इस केस के बारे में आगे चर्चा करेंगे, पहले आपको नंबी के बैकग्राउंड के बारे में बताते हैं.

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तमिल ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाले नंबी की मुलाकात 1966 में विक्रम साराभाई से हुई थी, जो उस समय इसरो के चेयरपर्सन थे. तब नंबी रॉकेट के लिए पेलोड इंटिग्रेटर के तौर पर काम कर रहे थे. साराभाई चूंकि योग्य लोगों को ही भर्ती करने के पक्ष में थे इसलिए नंबी ने एमटेक के लिए तिरुवनंतपुरम के इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया था.

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नंबी इसरो के वैज्ञानिक और एयरोस्पेस इंजीनियर रहे.


साराभाई की कोशिशों से नंबी को नासा फेलोशिप मिली थी और वहां से उन्होंने केमिकल रॉकेट प्रोपल्शन में मास्टर की डिग्री हासिल की, वो भी सिर्फ दस महीने के भीतर जो कि रिकॉर्ड था. अमेरिका में उन्हें जॉब का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन वो भारत लौटे. यहां नंबी ने 1970 के दशक की शुरूआत में फ्यूल रॉकेट तकनीक की शुरूआत की, जबकि एपीजे अब्दुल कलाम की टीम सॉलिड मोटर पर काम कर रही थी.



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नंबी भविष्य के लिए नई तकनीक पर काम करना चाहते थे इसलिए उन्हें सतीश धवन और यूआर राव जैसे दिग्गजों का सपेार्ट भी मिला. नंबी को कामयाबी भी मिली और उन्होंने भारत में पहली बार लिक्विड प्रोपलेंट मोटर विकसित कर ली थी. फ्रंटलाइन की खबर की मानें तो भारत ने यह तकनीक रूस को 235 करोड़ रुपये में बेचने के लिए 1992 में डील भी की थी, लेकिन अमेरिकी दखलंदाज़ी से यह संभव न हो सका.

इस अंतर्राष्ट्रीय डील और क्रायोजेनिक इंजन के मामले ने तूल पकड़ा और बात 1994 के एक जासूसी स्कैंडल तक पहुंच गई, जिसके घेरे में नंबी आए और उन पर जासूसी के आरोप लगे. इसी केस पर बनी माधवन की फिल्म का ट्रेलर रिलीज़ हो चुका है.

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क्या था केस और कैसे हुए अहम फैसले?

विदेशी एजेंटों को 'फ्लाइट टेस्ट डेटा' करोड़ों में बेचने के आरोपी नंबी को इंटेलिजेंस ब्यूरो ने गिरफ्तार कर पूछताछ की थी. नंबी ने दावा किया कि दबाव में उनसे इसरो के टॉप अधिकारियों के खिलाफ बयान लिये गए. यही नहीं, नंबी ने ये आरोप भी लगाए कि जब उन्होंने जांच एजेंसी के चाहे अनुसार झूठे इल्ज़ाम कबूल नहीं किए तो उनके साथ अमानवीय बर्ताव किया गया.

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1996 में सीबीआई ने नंबी के खिलाफ लगे आरोपों को निराधार कहा. 1998 में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने भी इन आरोपों को खारिज किया. लेकिन देर हो चुकी थी, एक वैज्ञानिक का करियर और महत्वाकांक्षा का दौर चौपट हो चुका था. 2001 में नंबी के रिटायर होने का वक्त आ गया. लेकिन नंबी ने आगे केस लड़ने का फैसला किया.

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सितंबर 2018 में नंबी की झूठे केस में गिरफ्तारी और उन पर हुए टॉर्चर की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने जांच की. जांच के बाद केरल सरकार को आदेश दिया गया कि मानसिक प्रताड़ना के हर्जाने के तौर पर नंबी को 50 लाख रुपये दिए जाएं. केरल सरकार ने आदेश मानते हुए 1.3 करोड़ रुपये का भुगतान नंबी को किया.

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2019 में नंबी को पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था.


इसके बाद 2019 में नंबी को भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया गया और अब उनके जीवन में इस झूठे केस को आधार बनाकर आर माधवन फिल्म लेकर आ रहे हैं, जिसके निर्देशक होने के साथ ही निर्माता और लेखक भी माधवन ही हैं.
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