क्या हिमालय के बर्फीले पहाड़ों में जासूसी उपकरण छिपाए गए हैं?

खुफिया अधिकारियों ने मिलकर नंदा देवी पर जासूसी उपकरण लगाने की कोशिश की- सांकेतिक फोटो

खुफिया अधिकारियों ने मिलकर नंदा देवी पर जासूसी उपकरण लगाने की कोशिश की- सांकेतिक फोटो

चीन के परमाणु परीक्षण (nuclear test by China) के सालभर बाद भारत और अमेरिका ने मिलकर उसकी जासूसी की ठानी. दोनों के खुफिया अधिकारियों ने मिलकर नंदा देवी (Nanda Devi) में जासूसी उपकरण लगाने की कोशिश की.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 21, 2021, 1:09 PM IST
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उत्तराखंड में 7 फरवरी को आई जल त्रासदी के बाद शवों को निकालने का क्रम अब भी जारी है. इस बीच स्थानीय लोग कई तरह की बातें कर रहे हैं, जैसे सर्दियों में आखिर ग्लेशियर क्यों फटा? बता दें कि स्थानीय लोगों के मुताबिक हिमालय में बर्फ के काफी नीचे परमाणु उपकरण दबे हुए हैं. वे वैज्ञानिकों की जलवायु परिवर्तन की थ्योरी को नकारते हुए इसी बात को सच्चा बता रहे हैं. जानिए, क्या है स्थानीय लोगों के इस यकीन के पीछे की कहानी.

इस बारे में समय-समय पर इंटरनेशनल और नेशनल मीडिया में भी आता रहा. कहानी शुरू होती है 60 के दशक से. साल 1965 के अक्टूबर में अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के साथ मिलकर भारतीय इंटेलिजेंस IB ने चीन की जासूसी करने की ठानी. योजना ये थी कि वे नंदादेवी की ऊंचाई पर जासूसी उपकरण लगा देंगे तो नीचे चीन की गतिविधियों पर नजर रखेगा.

जासूसी से पहले इसका ट्रायल अलास्का में किया जा चुका था- सांकेतिक फोटो (pixabay)


कथित तौर पर दोनों देशों के जासूस मिलकर अपने साथ न्यूक्लियर-पावर्ड मॉनिटरिंग डिवाइस ले जाने में कामयाब भी हो गए. इससे सालभर पहले ही साल 1964 में चीन में पहला न्यूक्लियर टेस्ट हुआ था और अमेरिका और रूस दोनों परेशान थे. इधर भारत से भी चीन के रिश्ते खास अच्छे नहीं थे. ऐसे में चीन पर नजर रखने के प्रयास जैसी बात आसानी से गले उतरने लायक है.
जासूसी से पहले इसका ट्रायल अलास्का में किया जा चुका था. वहां की माउंट मैककिनले पहाड़ी पर इस काम में भारत की मदद अमेरिका ने की थी. इसके बाद दोनों टीमें अपने साथ प्लूटोनियम कैप्सूल और दूसरे स्पाई उपकरण लेकर पहुंची. योजना के मुताबिक ये उपकरण नंदा देवी के लगभग 8000 मीटर ऊंचाई पर रखना था. हालांकि तभी बर्फीला तूफान आया और अधिकारियों को जान बचाने के लिए उतराई की तरफ लौटना पड़ा. इस बीच भारी होने के कारण उपकरण वहीं छोड़ दिए गए.

Nanda Devi secret device
कभी पता नहीं लग सका कि आखिर भारी उपकरण कहां गायब हुए


इस बारे में टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें खुद इस अभियान में शामिल कैप्टन मनमोहन सिंह कोहली, जो कि अब लगभग 88 साल के हैं, ने इस बारे में बताया था. उपकरणों में छह फुट लंबा एंटीना, दो रेडियो कम्युनिकेशन सेट, और प्लूटोनियम कैप्सूल थे. बाद में टीमें अगले ही साल दोबारा उस जगह पहुंची, जहां उपकरण छोड़े गए थे लेकिन वहां कुछ नहीं मिला. साल 1967 में फिर वहां गए लेकिन निराशा ही हाथ लगी.



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आखिरकार साल 1968 में मिशन अधूरा छोड़ना पड़ गया लेकिन ये कभी पता नहीं लग सका कि आखिर प्लूटोनियम से भरे उपकरण कहां गायब हुए. बता दें कि प्लूटोनियम नाभिकीय रिएक्टर में ईंधन का काम करता है और रेडियोएक्टिव होने के कारण काफी खतरनाक माना जाता है.

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कैप्टन कोहली के मुताबिक चूंकि ये एक सीक्रेट मिशन था इसलिए इस बारे में उस समय किसी को नहीं बताया गया. डिवाइस की लाइफ लगभग 100 साल थी यानी अब भी कुछ समय बाकी है. तो ऐसे में अगर ये किसी तरह से भी ऋषिगंगा में पहुंच गया तो पानी की अशुद्दि का डर हो सकता है. दूसरा अनुमान ये है कि चूंकि डिवाइस काफी गर्म होती है तो एक बार ग्लेशियर को छूने के बाद ये बर्फ को पिघलाती हुई सीधे अंदर जाती रहेगी, जब तक कि सतह की न छू ले.

Nanda Devi secret device
प्लूटोनियम नाभिकीय रिएक्टर में ईंधन का काम करता है


इस मिशन के बारे में अब किताबों में भी जिक्र है. 'नंदा देवी- अ जर्नी' में ब्रिटिश यात्रा लेखक ह्यूग थॉम्पसन ने अपनी किताब में इस बारे में लिखा है. वे बताते हैं कि चूंकि मिशन में भारत के साथ अमेरिकी टीम भी शामिल थी, लिहाजा रंग गहरा दिखाने के लिए उन्हें सूरज की धूप में टैन किया गया ताकि स्थानीय लोगों को शक न हो. खुद को पर्वतारोही दिखाते हुए दोनों टीमों ने उपकरण इन्सटॉल करने के लिए काफी मशक्कत की थी लेकिन ऐसा हो नहीं सका.

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साल 1978 के अंत में पहली बार इस ऑपरेशन की बात सार्वजनिक तौर पर हुई. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने खुद संसद में इस बारे में कहा था. इसके बाद ही वॉशिंगटन पोस्ट ने भी इस मिशन को अमेरिका की चीन पर जासूसी की तरह लिखा था. हालांकि कहीं भी ये साफ नहीं है कि मिशन पूरी तरह फेल हुआ या फिर आंशिक तौर पर सफल भी हुआ. ये भी हो सकता है कि सीक्रेट मिशन होने के कारण इस बारे में बात तो की जा रही है लेकिन सच्चाई नहीं बताई जा रही हो. जो भी हो, उत्तराखंड में बसे स्थानीय लोग लगातार इस बारे में बात करते हैं और फरवरी के पहले सप्ताह में ग्लेशियर फटने के लिए भी उन्होंने इसी अनदेखे डिवाइस को दोषी बताया था.
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