वो शख्स, जिसने गांधी की हत्या में साथ दिया और गोडसे के साथ फांसी चढ़ा

नारायण दत्तात्रेय आप्टे को जब अंबाला जेल में फांसी हुई तो उसकी उम्र 38 साल की थी. कुछ लोग उसे ब्रिटिश खुफिया एजेंट भी बताते हैं

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: January 30, 2019, 7:13 AM IST
वो शख्स, जिसने गांधी की हत्या में साथ दिया और गोडसे के साथ फांसी चढ़ा
नारायण दत्तात्रेय आप्टे (फाइल फोटो)
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: January 30, 2019, 7:13 AM IST
महात्मा गांधी के हत्यारे के रूप में नाथूराम गोडसे का नाम तो पूरी दुनिया जानती है लेकिन उस शख्स को शायद ही कोई जानने की कोशिश करता है, जिसे गोडसे के साथ गांधी की हत्या के लिए फांसी की सजा मिली थी, जो गोडसे के साथ ही अंबाला जेल में फांसी पर लटकाया गया था.

ये दूसरा शख्स नारायण दत्तात्रेय आप्टे था. जिसके बारे में बहुत तरह की बातें भी कही जाती रही हैं. 10 फरवरी 1949 में गांधी की हत्या के मामले में सुनवाई कर रही अदालत जिन दो लोगों को फांसी की सजा सुनाई थी, उसमें आप्टे भी था.

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क्या वो वाकई ब्रिटिश खुफिया एजेंट था

1966 में जब सरकार ने दोबारा गांधी हत्या मामले को खोला तो जस्टिस जेएल कपूर की अगुवाई में जांच कमीशन का गठन किया गया. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में आप्टे के बारे में कहा कि वो ऐसा शख्स था, जिसकी सही पहचान को लेकर शक है. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में उसे भारतीय वायुसेना का पूर्व कर्मी भी बताया.

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इसी रिपोर्ट के बिना पर जब अभिनव भारत मुंबई नाम की संस्था ने तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर से जानकारी मांगी. तो उन्होंने कहा कि विभिन्न स्तरों पर की गई छानबीन के बाद रिकॉर्ड बताते हैं कि आप्टे कभी एयरफोर्स में नहीं रहा. बाद में अभिनव भारत के प्रमुख डॉक्टर पंकज फडनिस ने कहा कि उनकी रिसर्च कहती है कि आप्टे ब्रिटिश खुफिया एजेंसी फोर्स 136 का सदस्य था. गांधीजी पर तीन गोलियां तो गोडसे के रिवाल्वर से निकली थीं लेकिन चौथी गोली आप्टे ने चलाई थी.
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नाथूराम गोडसे और सावरकर के साथ नारायण आप्टे (फाइल फोटो)


पुणे के जाने माने विद्वान ब्राह्मण परिवार से था
विकीपीडिया के अनुसार आप्टे आकर्षक व्यक्तित्व का शख्स था, उसने बांबे यूनिवर्सिटी से साइंस में ग्रेजुएशन करने के बाद कई तरह के काम किए. इसमें टीचिंग भी शामिल थी. वो ऐसे परिवार से था, जिसकी पुणे में संस्कृत विद्वानों के ब्राह्मण परिवार के रूप में धाक थी.
विकीपीडिया कहती है कि जब दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सावरकर ने हिंदू महासभा के लोगों से अंग्रेजों की मदद करने की अपील की तो वो वो पुणे क्षेत्र में सेना का रिक्रूटर बन गया. फिर वो अस्थायी तौर पर फ्लाइट लेफ्टिनेंट भी बना.

गांधीजी का पार्थिव शरीर (फोटो-गैटी इमेज)


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वैवाहिक जीवन अच्छा था
नारायण आप्टे ने 1939 में अहमदनगर में टीचर की नौकरी करने के दौरान हिंदू महासभा के साथ खुद को जोड़ा था. फिर अपनी पारिवारिक स्थितियों के काऱण उसे पुणे के अपने पुश्तैनी घर में संयुक्त परिवार की देखभाल के लौटना पड़ा. उसकी पत्नी भी पुणे के असरदार परिवार से थी. दोनों का वैवाहिक जीवन अच्छा बताया जाता है. उसका एक बेटा भी था, जिसकी तबीयत खराब ही रहती थी.

सावरकर करते थे आर्थिक मदद
बाद में उसने गोडसे के साथ मिलकर "अग्रणी" के नाम से अखबार निकालना शुरू किया. ये हिंदू विचारधारा को जगह देने वाला अखबार था. कांग्रेस आमतौर पर उसके निशाने पर होती थी.

सावरकर पुणे में नारायण आप्टे के अखबार के दफ्तर में. (फाइल फोटो)


विकीपीडिया का कहना है कि ये अखबार घाटे में था. बंद होने की कगार पर पहुंच गया, तब सावरकर की आर्थिक मदद से इसे ऑक्सीजन मिली. बाद में सावरकर इस अखबार को जारी रखने के लिए लगातार ठीक ठाक अार्थिक मदद करते रहे थे.

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जेल में किताब भी लिखी
आजादी के बाद जब सरकार ने उस अखबार को आपत्तिजनक पाते हुए बंद किया तो आप्टे ने "हिंदू राष्ट्र" के नाम से नया अखबार निकालना शुरू कर दिया. राबर्ट पेन की किताब "द लाइफ एंड डेथ ऑफ महात्मा गांधी" कहती है आप्टे जेल में आदर्श कैदी की तरह था. जेल में उसने भारतीय चिंतन पर एक किताब भी लिखी.
अंतिम दिन
15 नवंबर को जब अंबाला जेल में फांसी दी जाने वाली थी, तब आप्टे शांत और अपने आपमें मगन था. फांसी की ओर जाते हुए गोडसे तो अखंड भारत के नारे लगा रहा था तो आप्टे और मजबूत आवाज में अमर रहे कहकर उसका साथ दे रहा था. दोनों को साथ में फांसी दी गई. फांसी का फंदा खींचते ही आप्टे की तुरंत मौत हो गई

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