गहरे अंतरिक्ष में पहले जैविक प्रयोगों के लिए तैयार हैं नासा के सैटेलाइट

नासा (NASA) ने इस अभियान को आर्टिमिस-1 अभियान के साथ प्रक्षेपित करने के लिए तैयार किया है. (तस्वीर: Pixabay)

नासा (NASA) ने इस अभियान को आर्टिमिस-1 अभियान के साथ प्रक्षेपित करने के लिए तैयार किया है. (तस्वीर: Pixabay)

यह पहली बार है कि गहरे अंतरिक्ष (Deep Space) में विकिरणों (Radiation) का कोशिकाओं (Cells) पर लंबे प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा.

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इन दिनों नासा (NASA) के और चंद्रमा के अभियानों की ही खूब चर्चा हो रही है. लेकिन नासा इनके अलावा भी कई और अभियानों पर भी काम कर रहा है. ऐसे ही एक मिशन के लिए नासा ने अपना एक अंतरिक्ष यान (Space Craft) तैयार कर उसका परीक्षण कर लिया है. यह यान सुदूर अंतरिक्ष में कुछ जैवप्रयोग (Bioexperiments) करेगा.बायोसेंटिनल मिशन के लिए यह यान गहरे अंतरिक्ष में अपनी तरह के पहले लंबे जैवप्रयोग करेगा.

उड़ान के लिए तैयार

बायोसेंटिनल अभियान उड़ान भरने के लिए लगभग तैयार है. इस अभियान के लिए 14 किलोग्राम के 6 10 x 20 x 30 सेमी के आकार के छोटे सैटेलाइट तैयार हो चुके हैं. सिलिकॉन वैली में एम्स रिसर्च सेंटर में नासा के वैज्ञानिकों की टीम फ्लोरीडा से इन उपग्रहों के प्रक्षेपणों की तैयारी में लगी है. सेंटियल की उड़ान चंद्रमा से आगे जाएगी और यह सूर्य की कक्षा में जाएगा.

13 छोटे सैटेलाइट के क्यूबसैट
सेंटियल 13 छोटे सैटेलाइट क्यूबसैट में से एक है जो आर्टिमिस -1 मिशन के साथ प्रक्षेपित किया जाएगा. एमीज रिसर्च सेंटर के क्वालिटी एशोयरेंस इंजीनियर ऑस्टिन बोई ने बायोसैंटियल सोलर सेल का परीक्षण किया है. उन्होंने यान से सिस्टम पर इलेक्ट्रॉनिक रेडिएशन के प्रभाव का परीक्षण भी किया.

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नासा (NASA) का यह सैटेलाइट आर्टिमिस-1 के साथ भेजा जाएगा. (तस्वीर: NASA)


छह महीने तक होंगे प्रयोग



बायोसेंटियल गहरे अंतरिक्ष में पहला जैविक प्रयोग करेगा. इसमें छह महीने के वैज्ञानिक शोध में गहरे अंतरिक्ष में विकिरण के लंबे समय के प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा. इसमें बढ़ते हुए खमीर के डीएनए सुधार का अध्ययन होगा. छोटे से तरल भरे डिब्बों में खमीर की कोशिकाओं पर विकिरण के प्रभावों का मापने के लिए माइक्रोफ्ल्यूड का उपयोग किया जाएगा.

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डाइ के रंग के बदलाव से होगी पहचान

इस माइक्रोफ्लूडिक सिस्टम में एक डाई का उपयोग होगा जो खमीर की कोशिकाओं की गतिविधियों को पढ़ने का काम करेगा. इसमें डाइ का रंग नीले से गुलाबी हो जाएगा. खमीर और इंसानी कोशिकाएं ही प्रकार की जैविक प्रक्रियाओं का उपयोग करते हैं. इसमें खराब डीएनए की मरम्मत शमिल है. बायोसेंटियल के प्रयोग गहरे अंतरिक्ष में लंबे मानव प्रवास के संबंधित विकिरण झोखिम को समझने में मददगार हो सकते हैं.

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सूक्ष्म जीवों (Micro organism) के लेकर छह महीने के लिए पहली बार इस तरह के प्रयोग होंगे. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


खमीर की कोशिकाएं

यहां लॉरेन लिडेल ने एक माक्रोस्कोप का उपयोग कर खमीर कोशिकाओं का गिनने का काम करते हुए यह सुनिश्चित किया कि सही संख्याओं में कोशिकाएं बायोसेंटिनल माइंक्रोफ्ल्यूडिक प्रयोग में गई हैं. वहां मिशन के प्रमुख मैकेनिकल इंजिनियर और स्ट्रक्चरल इंजिनियर अब्राहम रैडेमाचेर, प्रमुख इंटीग्रेशन एंड टेस्ट स्पेशलिस्ट वैज्ली मैनोलेस्कू और इलेक्ट्रिकल इंजीनियर जेम्स मिल्क ने सौर पैनल को स्थापितक कर स्पेसशिप के सस्पेंशन का परीक्षण किया.

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15 साल के प्रयोग पहली बार गहरे अंतरिक्ष में

एमीज रिसर्च सेंटर पिछले 15 सालों से क्यूबसैट के रूप में छोटे सैटेलाइट के जरिए पृथ्वी की निचली कक्षा में सूक्ष्मजीवों पर प्रयोग कर रहा है, लेकिन बायोसेंटियल अब गहरे अंतरिक्ष में पहला जैविक प्रयोग होगा. इंटीग्रेशन और टेस्ट इंजिनियर डैन रोवैन क्यूबसैट बायोसेंटिनल के आंतरिक मामलों में काम करते हैं. उन्होंने बताया कि रेडियो संचार, बैटरी, दूसरे यान के सिस्टम जैसी चीजों पर खास ध्यान दिया जा रहा है.
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