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अब नासा बना रहा है ज्वालामुखी का पूर्वानुमान लगाने वाले ड्रोन

अब नासा बना रहा है ज्वालामुखी का पूर्वानुमान लगाने वाले ड्रोन

ज्वालामुखी के अवलोकन के लिए ड्रोन (Drone) को खास तरह से तैयार करना पड़ता है. (तस्वीर: NASA)

ज्वालामुखी के अवलोकन के लिए ड्रोन (Drone) को खास तरह से तैयार करना पड़ता है. (तस्वीर: NASA)

प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के टोंगा में हुए ज्वालामुखी विस्फोट (Tonga Volcano) बहुत ही कम होने वाली घटना है जिसकी वजह से वैज्ञानिक इसका गहराई से अध्ययन करना चाहते हैं. इसके लिए वे विशेष तरह के ड्रोन (Drones) की सहायता ले रहे हैं. इसमें एस2 नाम की ड्रोन अनमैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम ने नासा के सहयोग के साथ विकसित किया है जो ज्वालामुखी के समय बहुत ही मुश्किल आकाशीय स्थितियों में उनका अवलोकन कर सकेगा.

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    टोंगा (Tonga) में ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruption) पृथ्वी के इतिहास एक बहुत बड़ी घटना है. इस घटना ने पूरे प्रशांत महासागर और वायुमडंल में हलचल मचा दी थी. हुंगा टोंगा हुंगा हापाई में हुए इस ज्वालामुखी विस्फोट के बाद राख और धुएं का गुबार दक्षिण प्रशांत की हवाओं में छा गया जिसके बाद वैज्ञानिक उसका कई लिहाज से अध्ययन कर रहे हैं इसके लिए भी इस ज्वालामुखी विस्फोट की स्थितियों का नजदीकी से अध्ययन किया जा रहा है. इसके लिए ड्रोन (Drone) बहुत उपयोगी उपकरण हैं. नासा ऐसे विशेष ड्रोन को बनाने में सहयोग कर रहा है.

    ड्रोन उपयुक्त हैं ऐसे अध्ययन के लिए
    इस मामले में सबसे अहम जरूरत यह है कि ज्वालामुखी विस्फोट का पूर्वानुमान कैसे लगाया जा सकता है. ड्रोन कई तरह के उपयोगों के लिए विशेष तौर पर डिजाइन किए जाते हैं जिससे वे चुनौती पूर्ण वातावरण में पहुंच कर वह अवलोकन कर सकें जहां इंसानों का पहुंचना मुश्किल है. इस लिहाज से ज्वालामुखी के लिए भी ड्रोन एक उपयुक्त उम्मीदवार हैं.

    आसान नहीं ड्रोन के लिए
    अब वैज्ञानिक ड्रोन को ज्वालामुखियों के अध्ययन के लिए भी उपयोगी पा रहे है. पिछले साल सितंबर में भी अलास्का के मकूशिन ज्वालामुखी का भी ड्रोन द्वारा सफल अवलकोन किया था. लेकिन यह भी सच है कि ज्वालामुखी का अवलोकन आसान नहीं है. ज्वालामुखी विस्फोट से हवा में ऐसा माहौल बन जाता है जो ड्रोन के संचालन आसान नहीं होता है.

    खास तरह के सेंसर वाला उपकरण
    अर्थ साइंस विभाग के फ्लौरेन श्वानडर का कहना है, “हमें ज्वालामुखी के आसापास पैदा हुई हानिकारक गैसों और अस्थिर उड़ान वाली स्थितियों के लिए वास्तव में बहुत महबूत होने पड़ा. इसके लिए हमने  गैस महसूस करने वाला उपकरण बनाया जिससे ज्वालामुखी की अस्थिरता की पहचान की जा सके.”

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    इस प्रोजेक्ट में नासा (NASA) की प्रमुख भागीदारी है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे का भी सहयोग
    अमेरिका के अनमैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम नासा और ब्लैक स्विफ्ट टेक्नोलॉजी की साझेदारी का नतीजा है. इसका नतीजा यह रहा कि अब एस2 जैसा विमान विकसित होकर हमारे सामने है. अमेरिका के जियोलॉजिकल सर्वे के जुड़ने के बाद यह विमान गैस की पहचान करने वाले नए पेलोड से सुसज्जित है.

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    तस्वीरें लेने में सक्षम
    अपनी प्रदर्शन उड़ान के लिए एस2 में स्वचालित तंत्रों और प्रोग्राम किए हुए उड़ान योजना का उपयोग किया गया. इस उड़ान में विमान उस ऊंचाई पर पहुंचा जहां से वह उच्च विभेदन दिखाई देने वाले प्रकाशीय और ऊष्मीय तस्वीरें लेने में सक्षम था. तस्वीरों से इस बात की पुष्टि हो सकी कि भौतिक स्वरूपों में बदलाव जो जमीन के नीचे ज्वालामुखी सक्रियता को दर्शाते हैं.

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    ज्वालामुखी (Volcano) की राख और हानिकारक गैसों के बीच ऊपर से तस्वीरें लेना आसान काम नहीं है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

    क्षमताओं में इजाफा करने का प्रयास
    नासा का कहना है कि उड़ानों ने यह भी दर्शाया कि विमानों में लगी सेंसरों की गैस पहचानने की क्षमता ज्वालामुखी के नीचे उबल रहीं गतिविधियों के बदलावों के संकेत भी दे सकती हैं. नासा के जारी किए बयान में ब्लैक स्विफ्ट टैक्नोलॉजी के कार्यकारी प्रमुख एक एलेस्टोन ने बताया कि उनका लक्ष्य यूएएस के क्षमताओं को बढ़ाते रहना था.

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    इस सिसस्टम की सबसे खास बात यही है कि खतरों के बहुत मुश्किल हालात को पहचान कर यह वापस आ सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि बिना किसी पायलट के वैज्ञानिक मंच से ही सुरक्षित उड़ना भविष्य में रोजमर्रा के कार्यों के लिए भी उपयोगी बना देगा.

    Tags: Earth, Nasa, Research, Science

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