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जब NASA के अपोलो-15 के यात्रियों ने चंद्रमा पर चलाया था पहला रोवर

चंद्रमा (Moon) पर गया दुनिया का पहला रोवर, अपोलो15 अभियान में भेजा गया था. (तस्वीर: NASA)

चंद्रमा (Moon) पर गया दुनिया का पहला रोवर, अपोलो15 अभियान में भेजा गया था. (तस्वीर: NASA)

नासा (NASA) ने पचास साल पहले चंद्रमा (Moon) पर दुनिया का पहला रोवर (Rover) अपोलो15 अभियान के तहत भेजा था जिसे अमेरिका के चंद्रमा अन्वेषण अभियान के गौरवशाली उपलब्धि माना जाता है.

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    पिछले कुछ सालों में चंद्रमा (Moon) और मंगल के लिए रोवर (Rover) भेजने के चलन तेज हो गया है. ऐसा लगता है कि अब किसी ग्रह पर यान उतरने की जगह अब रोवर ही उतरा करेंगे. लेकिन पृथ्वी  से बाहर सबसे पहला रोवर चंद्रमा पर भेजा गया था. आज से 50 साल पहले नासा (NASA) ने चंद्रमा पर अपोलो 15 अभियान के तहत रोवर भेजा था. 1971 में जुलाई के अंतिम सप्ताह हुई इस कवायद नासा की बहुत बड़ी उपलब्धि मानी गई थी. इस घटना को कई अंतरिक्ष अनुसंधान प्रेमियों, इतिहासकारों और लेखकों ने अमेरिका के चंद्रमा अन्वेषण अभियान के गौरवशाली प्रतीक के रूप में याद किया.

    इस अभियान में डेव स्कॉट, जिम इरविन सहित दूसरे अंतरिक्ष यात्री पहली बार चंद्रमा पर गए थे. यह रोवर छह घंटे तक चंद्रमा पर चला था, इसके बाद जब स्कॉट और इरविन अपने लैंडर फाल्कन की ओर लौट रहे थे, तब स्कॉट रायस्लिंग क्रेटर के पश्चिम में अचानक रोवर से बाहर निकल गए थे.

    नमूने उठाने के लिए बनाया बहाना
    जियोलॉजी में प्रशिक्षित स्कॉट ने रोवर से बाहर निकलते ही तेजी से एक काला लावा का पत्थर उठा लिया. स्कॉट जानते थे इस छेद भरे पत्थर की अहमियत पृथ्वी के वैज्ञानिकों के लिए क्या है. वे इस पत्थर को खोना नहीं चाहते थे, लेकिन अगर वे इसे उठाने के लिए इजाजत मांगते को समय की कमी के कारण उन्हें इजाजत नहीं मिलती. इसके लिए स्कॉट ने एक कहानी बनाई की उनके सीटबेल्ट में समस्या आई थी जिससे उलझते हुए वे रोवर से बाहर निकल गए थे.

    खास हो गया पत्थर
    यह नमूना जब पृथ्वी पर पुहंचा और स्कॉट ने पत्थर की कहानी बताई तो यह सीटबेल्ट रॉक के नाम से मशहूर हो गया था जो अपोलो-15 अभियान में मिला सबसे कीमती भूगर्भीय खोज माना गया. अंतिम अपोलो अभियान में चंद्रमा से लाए गए अन्य नमूनों की तरह सीटबेल्ट रॉक भी पृथ्वी पर नहीं आ पाते अगर चंद्रमा पर रोवर नहीं भेजा गया होता.

    पहले से हो रही थी तैयारी
    नासा का यह लूनार रोविंग व्हीकल मोड़ा जा सकता था और काफी टिकाऊ माना जाता था. बैटरी से चलने वाला यह रोवर बोइंग और जर्नल मोटर्स ने मिलकर बनाया था. कई लोग इसे अपोलो इस रोवर पर नई किताब खिलने वाले अर्ल स्विफ्ट का कहना है कि क्रू वाले हर अपोलो अभियान में  अंतिम तीन अपोलो अभियान के लिए इस रोवर के लिए तैयारी की जा रही थी.

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    नासा (NASA) का अपोलो-15 अभियान अपोलो शृंखला का अंतिम अभियान था. (तस्वीर: NASA)

    पहले से हो रही थी तैयारी
    नासा का यह लूनार रोविंग व्हीकल मोड़ा जा सकता था और काफी टिकाऊ माना जाता था. बैटरी से चलने वाला यह रोवर बोइंग और जर्नल मोटर्स ने मिलकर बनाया था. कई लोग इसे अपोलो इस रोवर पर नई किताब, ‘एक्रॉ द एयरलेस विल्ड: द लूनार रोवर एंड द ट्रम्फ ऑफ द फाइनल मून लैंडिंग्स‘ खिलने वाले अर्ल स्विफ्ट का कहना है कि क्रू वाले हर अपोलो अभियान में  अंतिम तीन अपोलो अभियान के लिए इस रोवर के लिए तैयारी की जा रही थी.

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    बहुत सारी डिजाइन पर किया गया था विचार
    इस रोवर को जो एक कार के रूप में डिजाइन की गई थी. 1960 के दशक से ही तैयार किया जाने लगा था.  इसके लिए इंजीनियरों ने की तरह के विचारों को आजमाया था जिसमें टैंक की तरह के व्हीकल, उड़ती कार और  अलग-अलग डिजाइन की कार भी शामिल थीं. इसके अलावा पोगो स्टिक और मोटरसाइकल जैसे सुझाव भी शामिल थे.

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    इस रोवर (Rover) को एक खास कार की तरह डिजाइन किया गया था जिसे बहुत से लोग अब भी कार कहते हैं. (तस्वीर: NASA)

    कैसा था अनुभव
    वैसे तो इस रोवर को पृथ्वी की अद्वितीय कार की तरह डिजाइन किया गया था, लेकिन यह अमेरिकी ऑटोमोबाइल उद्योग के भी संकेत था और उस समय अमेरिकी लोगों का इस उद्योग से भावनात्मक जुड़ाव भी कम नहीं था. एक बार रोवर के चंद्रमा तक पहुंचने के बाद जब एस्ट्रोनॉट्स ने इस रोवर की यात्रा की तो उन्हें उसका सफर अजीब सा लगा. स्कॉट ने इसे स्पीडबोट का सा अनुभव बताया.

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    इस फोल्डेबल कार को अलग से किसी यान में ना भेजकर अपोलो-15 के यात्रियों के साथ ही भेजा गया. इसका भार 500 पाउंड से कम रखा जाना था, लेकिन इंजीनियरों को यह भी सुनिश्चित करना था कि वह अपने से दोगुना भार भी वहन कर सके. इसके साथ ही इसे 500 डिग्री फेहरनहाइट जैसे चरम तापमान सहने की क्षमता भी दे की चुनौती थी.

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