नासा के जूनो यान ने देखीं गुरु ग्रह पर खास ऑरोर प्रक्रियाएं

नासा का जूनो अंतरिक्ष यान (Juno Spacecraft) गुरू और उसके आसपास की बहुत सी नई घटनाओं की जानकारी दे रहा है. (तस्वीर:  NASA)

नासा का जूनो अंतरिक्ष यान (Juno Spacecraft) गुरू और उसके आसपास की बहुत सी नई घटनाओं की जानकारी दे रहा है. (तस्वीर: NASA)

नासा (NASA) के जूनो यान (Juno Spacecraft) ने गुरु ग्रह (Jupiter) पर अनोखे ऑरोर उत्सर्जन Aurora Emissions) देखे हैं जिनको समझने में उन्हें परेशानी हो रही है.

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नासा (NASA) का जूनो अंतिरक्ष यान (Juno Spacecraft) गुरू ग्रह (Jupiter) और उसके आसपास कई ऐसा घटनाओं की तस्वीरें भेज रहा है जो अब तक धरती से अवलोकित नहीं की जा सकीं थीं. हाल ही में जूनो के आंकड़ों के एक अध्ययन में गुरु ग्रह के ध्रुवों पर ऑरोर (Aurora) उत्सर्जन का पता चला है. शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तरह के ऑरोर दूसरे ग्रह पर तो क्या गुरू ग्रह पर भी पहले कभी नहीं देखे गए हैं.

ध्रुवों पर धुंधली फैलती तरंगे

देखने में ये ऑरोर गुरु ग्रह के ध्रुवों पर तरंगित होते लगते हैं. जूनो यान के अल्ट्रावॉयलेट स्पैक्ट्रोग्राफ (UVS) से इन चमकीली घटना को कैद किया गया है जिसमें धुंधले छल्ले के आकार के उत्सर्जन तेसी से 3.3 से 7.7 किलोमीटर प्रति सेंकेंड की गति से फैलते दिखाई दे रहे हैं.

आवेशित कण और मैग्नेटोस्फियर
यह अध्ययन साउथ वेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने किया था जहां ये यूवीएस उपकरण बना था. इंस्टीट्यूट के बयान में शोधकर्ताओं का सुझाव  दिया है कि ये ऑरोर उत्सर्जन आवेशित कणों की वजह से होते हैं जो गुरु ग्रह के विशाल मैग्नेटोस्फियर के किनारे आते हैं. उनकी यह पड़ताल जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च: स्पेस फिजिक्स में प्रकाशित हुई है.

सौर पवनों की भूमिका

बयान में इस अध्ययन के प्रमुख लेखक विंसेंट ह्यू ने बताया है, “हमें लगता है कि ये धुंधले पराबैंगनी उत्सर्जन गुरु ग्रह से लाखों मील दूर गुरु ग्रह के मैग्नेटोस्फियर की सीमा पर सौर पवन के द्वारा बनाए जा रहे हैं. सौर पवन सूर्य के द्वारा उत्सर्जित आवेशित कणों की सुपरसोनिक धारा होती है. गुरु ग्रह के पास पहुंचने पर सौर पवन गुरु ग्रह के मैग्नेटोस्फियर से कैसे अंतरक्रिया करती है, यह स्पष्ट रूप से समझा नहीं जा सका है.



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गुरु ग्रह (Jupiter) पर इससे पहले भी ऑरोर दिखाई दिए हैं जो पृथ्वी से कभी दिखाई नहीं देते. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


एक शक्तिशाली मैग्नेटोस्फियर

पृथ्वी पर भी ऑरोर गुरू ग्रह के ऑरोर की तरह होते हैं जो यहां के मैग्नोटोस्फियर के आवेशित कणों की वजह से बनते हैं. लेकिन गुरू ग्रह का मैग्नेटोस्फियर पृथ्वी के मैग्नेटोस्फियर से 20 हजार गुना ज्यादा शक्तिशाली है. इसका मतलब यह है कि यह सौर पवनों को 60 लाख किलोमीटर दूर तक ही मोड़ सकता है और अपने पास आने नहीं देता है.

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कैसे पता चली दूरी

बयान में इस अध्ययन के सहलेखक और बेल्जियम की लीग यूनिवर्सिटी के बरट्रेंड बोनफोंड ने बताया, “ छल्लों की उच्च अक्षांश पर स्थिति दर्शाती है कि उत्सर्जन पैदा करने वाले कण सुदूर गुरु के मैग्नेटोस्फियर और सौर पवनों की सीमा के पास से आ रहे हैं.”

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सौर पवनों (Solar Wind) और उनसे आने वाले विकिरण की अंतरक्रिया ऑरोर के बनने में भूमिका निभा सकती है. (तस्वीर:NASA @MAVEN2Mars )


प्लाज्मा की अंतरक्रियाएं

जूनो के यूवीएस उपकरण के द्वारा रिकॉर्ड किए गए आवेशिक कण मैग्नेटोस्फियर के बार  आते लगते हैं जहां सौर पवनों का प्लाज्मा गुरु ग्रह के प्लाज्मा से अंतरक्रिया कर रहा है. शायद इसी वजह से रिंग जैसे संरचरना दिख रही है जिसे केल्विन हेम्लोल्ट्ज अस्थिरता कहते हैं. जो गुरु की मैग्नेटिक फील्ड लाइन्स में अंदर तक पहुंच जाती हैं.

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इसके अलावा ऐसा भी हो सकता है कि यह ऑरोर उत्सर्जन दिन के समयके मैग्नेटिक संपर्क घटनाओं के कारण भ हो सकते हैं. इस दौरान दो ग्रहों की मैग्नेटिक फील्ड आपस में मिलती हैं और फिर से जुड़ जाती है. पृथ्वी से वर्षों के अवलोकनों के बाद भी वैज्ञानिक गुरु ग्रह के ऑरोर उत्सर्जनों को समझ नहीं सके हैं. इसकी वजह यह है कि गुरु का मैग्नेटोस्फियर की जटिल गतिकी उसके 10 घंटे के घूर्णन से नियंत्रित होती है.
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