केवल 17 मिलीसेंकेड के आंकड़ों से मिली गुरू पर उल्कापिंड के टकराव की जानकारी

गुरू ग्रह (Jupiter) पर उल्कापिंड के टकराव (Meteoroid Impact) बहुत ही कम दिखाई दे पाते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

गुरू ग्रह (Jupiter) पर उल्कापिंड के टकराव (Meteoroid Impact) बहुत ही कम दिखाई दे पाते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

नासा (NASA) के जूनो यान (JUNO) से मिले 17 मिलीसेकेंड के आंकड़ों से ही गुरू ग्रह (Jupiter) पर उल्कापिंड (Meteoroid) के टकराव की बहुत सी जानकारी वैज्ञानिकों ने निकाल ली.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 26, 2021, 3:33 PM IST
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अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा (NASA) के अंतरिक्ष यान जूनो (Juno) गुरु ग्रह (Jupiter) की बहुत सी जानकारी हासिल कर चुका है. अब शोधकर्ताओं ने पिछले साल ग्रूह पर हुए एक उल्कापिंड (Meteoroid) के टकराव की घटना देखी है. वैसे तो गुरू पर उल्कापिंडों का टकराव असामान्य बात नहीं है, लेकिन उसे देख पाना पृथ्वीवासियों के लिए बहुत दुर्लभ घटना है. शोधकर्ताओं ने इस घटना के बारे में कुछ दिलचस्प जानकारी भी हासिल कर ली है जिसमें उल्कापिंड का भार भी शामिल है.

क्या बहुत आम हैं वहां उल्कापिंड टकराव
गुरू ग्रह के ऊपरी वायुमंडल में एक बहुत ही चमकीले उल्कापिंड विस्फोट की तस्वीर कैद करने का दावा किया जा रहा है जिसे बोलाइड कहा जता है. यह दावा साउथवेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट की अल्ट्रावॉयलेट स्पेक्ट्रोग्राफ (UVS) टीम ने किया है. इंस्टीट्यूट के बयान में इस शोध की प्रमुख लेखिका डॉ रोहिणी जाइल्स ने कहा है कि गुरू में हर साल बहुत सारे उल्कापिंड टकराव होते हैं.

अवलोकन की चुनौती
डॉ जाइल्स का कहना है कि गुरू पर टकराव की घटनाएं बहुत ही कम समय के लिए होती हैं. यही वजह है कि इन घटनाओं को देख पाना बहुत ही असामान्य बात हो जाती है. जहां तक पृथ्वी से ही इन टकरावों को देखने की बात है. केवल बड़े ही टकरावों को यहां से देखा जा सकता है. इसके अलावा खगोविद को बहुत ही भाग्यशाली होना होगा जिससे वह आउसी समय टेलीस्कोप पर सही जगह पर फोकस कर करे जिसेस वह घटना देखी जा सके.



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नासा (NASA) का जूनो यान खास तौर गुरू ग्रह (Jupiter) के अध्ययन के लिए भेजा गया है. (तस्वीर: NASA)


कुछ ही मिली सेंकेंड की तस्वीरें
पिछले 20 सालों में गैरपेशेवर खगोलविद गुरू ग्रह पर इस तरह के केवल छह ही टकराव देख सके हैं. साउथवेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं का अवलोकित किया गया बहुत ही कम समय में किया गया है. उन्होंने केवल 17 मिलीसेकेंड में लिया है और शोधकर्ता यह भी नहीं जान सके समयावधि के बाहर क्या हुआ.

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क्या पता चला, इससे शुरूआत
गाइल्स ने बताया कि हम यही जानते हैं कि उनकी टीम को घटना के पहले और बाद के घुमाव में इसके किसी तरह के संकेत देखने को नहीं मिले. शोधकर्ताओं ने यह पाया कि यह चमकीली घटना ट्रांजिएंट ल्यूमिनस इवेंट (TLE) नहीं है. टीएलई वह प्राकशीय घटना है जो समतापमंडल और मीजोस्फियर के बीच की ऊंचाई पर होती है और केवल एक या दो मिलीसेंकेड की घटना होती है. इनका संबंध केवल तूफान के दौरान विद्युतीय गतिविधि से होता है.

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गुरू ग्रह (Jupiter) पर उल्कापिंड के टकराव को देख पाना बहुत ही किस्मत का काम है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


उल्कापिंड के टकराव जैसा ही है यह टकराव भी
लेकिन इस चमकीली घटना का समय और प्रकाशीय आकार उल्कापिंडों के टकराव से बहुत मेल खाता है. शोध के मुताबिक यह तीखी चमक आंकड़ों में साफ दिखाई दी है क्योंकि इसके प्रकाशीय विशेषताएं गुरू ग्रह के ऑरोर से आने वाली पराबैंगनी विकिरणों से काफी अलग हैं.

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क्या हो सकता है टकराने वाले पिंड का भार
इस टकराव के पराबैंगनी स्पैक्ट्रम से पता चला है कि यह उत्सर्जन एक ब्लैकबॉडी से आ रहा है. गाइल्स के अनुसार इस ब्लैकबॉडी का तापमान 9328 डिग्री सेल्सियस होगा जो ग्रह के बादलों के 140 मील ऊपर है.  इस चमक की तीव्रता से शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया है कि टकराने वाले इस उल्कापिंड का भार 250 से 1500 किलोग्राम होना चाहिए.
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