नासा के शोध ने बताया, मंगल पर कितनी देर टिक सकेंगे पृथ्वी के सूक्ष्मजीव

मंगल ग्रह (Mars) के हालातों में सूक्ष्मजीवन कितना जिंदा रह सकेगा यह अहम सवाल है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

मंगल ग्रह (Mars) के हालातों में सूक्ष्मजीवन कितना जिंदा रह सकेगा यह अहम सवाल है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

मंगल (Mars) के पर सूक्ष्मजीव (Microorganisms) जिंदा रह पाएंगे या नहीं यह जानने के लिए नासा (NASA) ने जर्मन एरोस्पेस सेंटर के साथ मिल कर प्रयोग किया जिसमें उन्हें मंगल जैसे हालात वाली जगह पर भेजा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 25, 2021, 1:32 PM IST
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मंगल ग्रह (Mars) पर इस महीने दुनिया के तीन देशों के अभियान पहुंचे हैं. पृथ्वी (Earth) के बाहर जीवन की संभावनाओं की तलाश और सौरमंडल के इतिहास की जानकारी हासिल करने के लिहाज से मंगल दुनिया का एकमात्र और हमारे सबसे पास का ग्रह (Planets) है जहां हमारे मानव अभियान तक भेजे जा सकते हैं. इसीलिए मंगल ग्रह का इतना ज्यादा अध्ययन हो रहा है. इन्हीं में एक नासा और जर्मन एरोस्पेस सेंटर (German Aerospace Center) के हालिया अध्ययन से पता चला है कि पृथ्वी के जीव (Organisms) मंगल पर कुछ समय के लिए भी जीवित नहीं रह पाएंगे

2019 में हुआ था प्रयोग
यह अध्ययन एक प्रयोग पर किया गया है जो साल 2019 में शुरु किया था. इसके तहत दोनों स्पेस एजेंसियों को यह अध्ययन करना था कि पृथ्वी से मंगल पर भेजे गए सूक्ष्मजीव लाल ग्रह पर कितने समय तक जिंदा रह सकते हैं. शोधकर्ताओं ने 2019 में मार्सबॉक्स प्रयोग (MARSBOx experiment) के तहत पृथ्वी की समतापमंडल (stratosphere) में कुछ फफूंद और बैक्टीरिया को भेजा.  इस प्रयोग का उद्देशन्य यह पता लगाना था कि क्या मंगल पर जीवन कायम रहने की कोई संभावना है या नहीं.

लेकिन क्या मंगल पर भी
एक जाहिर सवाल यही पैदा होता है कि क्या समतापमंडल के हालात मंगल ग्रह से बहुत अलग नहीं होंगे. इस पर शोधकर्ताओं का कहना है कि समतापमंडल की हालात मंगल ग्रह के सतही वायुमंडल के हालातों से बहुत ज्यादा मिलते जुलते हैं और वह नमूनों की जांच के लिए बिलकुल आदर्श जगह है. अब शोधकर्ताओं की पड़ताल के नतीजे फ्रंटियर्स इन माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं.



क्या हुआ इस प्रयोग में जीवाणुओं का
अपने अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह चर्चा की है कि कैसे काले सांचे में जीवाणु जीवित बचे रह सके. शोधकर्ताओं ने पाया कि सूक्ष्मजीव मंगल की सतह पर कुछ देर ही जीवित रह सकते हैं, लेकिन उन्होंने यह भी पाया कि पृथ्वी पर वापस आने पर जीवाणु फिर से जिंदा हो सकते हैं.

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सूक्ष्मजीव (Microorganisms) का रह पाना ही मंगल (Mars) पर इंसान के रहने का आधार बन सकेगा.(प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


खास कंटेनर में रखा गया सूक्ष्मजीवों को
वैज्ञानिकों की टीम ने एस्परगिलस निगेर और सालिनिस्पेरा शैबलैनसिस स्टाफायलोकोकस  कापिटिस सहित कुछ फफूंद के जीवाणुओं के साथ बुटियॉक्सला स्पे. मेज आईएम-9 बैक्टीरिया कोशिकाओं को मार्सबॉक्स नाम के एक एल्यूमीनियम कंटेनर में रखा. कंटेनर में नमूनों की दो सतहें थी. नीचे वाली को विकिरण से सुरक्षित रखा गया था जिससे नासा विकिरण के प्रभाव का दूसरी स्थिति को प्रभावों से अलग अध्ययन कर सके.

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गुब्बारे में रखककर भेजा
नासा ने यह बॉक्स एक गुब्बारे में रख कर समतापमंडल भेजा. जहां नमूनों को मंगल जैसे हालात का सामना करना पड़ा और उनका वास्ता पराबैंगनी विकिरण से हुआ. यह स्थिति आम सनबर्न बनने वाले प्रकाश से हजार गुना ज्यादा खतरनाक है. मंगल पर भी वायुमंडल की कोई सुरक्षा परत नहीं हैं जो सूर्य से आने वाली पराबैंगनी विकिरणों को रोक सके.

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सूक्ष्मजीवों (Microorganisms) से ग्रहों और वहां से पृथ्वी पर संक्रमण के आदान प्रदान का खतरा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


बहुत अहम हो सकते हैं सूक्ष्मजीव
जर्मन एरोस्पेस सेंटर की टीम की सदस्य कैथरीना सिएम्स न बताया कि लंबे मंगल अभियान के साथ हमें मंगल पर मानव से जुड़े सूक्ष्मजीवों के जिंदा रहने के बारे में भी सोचना होगा. क्योंकि कुछ मंगल यात्रियों के स्वास्थ्य के लिए खतरा हो सकते हैं तो वहीं कुछ बहुत जरूरी भी हो सकते हैं. कुछ खाना बनाने के लिए अहम होंगे.

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इसके अलावा नासा की यह कोशिश भी है कि चंद्रमा और मंगल इंसानी संक्रमण से मुक्त बने रहें.  एजेंसी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि गलती से भी पृथ्वी से दूसरे ग्रहों पर जीव और संक्रमण वहां नहीं पहुंच जाएं. इसी के साथ दूसरे ग्रह से संक्रामक जीव पृथ्वी पर ना पहुंच जाएं यह खतरा भी है.  ऐसे में इस तरह के प्रयोग बहुत ही अहम हो जाते हैं.
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