जानिए क्या बता रहे हैं नासा के मंगल पर खोजे गए एक अरब साल पुराने रेत के टीले

मंगल (Mars) ग्रह पर ये टीले (Dunes) एक अरब साल से सुरक्षित है जिससे वैज्ञानिक हैरान हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

नासा (NASA) वैज्ञानिकों ने मंगल (Mars) ग्रह पर एक अरब साल पुराने रेत के टीले (Sand Dunes) खोजे हैं. उन्हें इससे वहां की जलवायु (Climate) के बारे में जानकारी मिलने की उम्मीद है.

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    हाल ही में अंतरिक्ष शोधकर्ताओं (Space Researchers) ने मंगल  (Mars) ग्रह पर शोध में तेजी से प्रगति की है. मंगल के अन्वेषण में अमेरिकी स्पेस एजेंस नासा (NASA) ही नहीं बल्कि चीन, यूएई जैसे अनेक देशों ने इसमें अपनी सक्रियता दिखाई है. नासा भी मंगल पर इंसान भेजने के लिए हर तरह के शोध में जुटा हुआ है. नासा के वैज्ञानिकों ने मंगल पर हवा से बने रेत का टीले देखे हैं जो करीब एक अरब साल पहले चट्टान बन गए थे.

    नहीं गंवाया मूल रूप
    इन पुराने टीलों का काफी मात्रा में अपरदन हुआ था फिर भी इन्होंने अपना मूल रूप नहीं खोया है. शोधकर्ताओं का कहना है कि ये टीले समय के साथ कैसे कायम रह सके इसके अध्ययन से मंगल के न केवल भूगर्भीय इतिहास का पता चलेगा, बल्कि इस ग्रह पर अवसादी प्रक्रियाओं के बारे में पता चल सकेगा.

    बहुत कम देखने को मिलता है ऐसा
    इन ऐतिहासिक संरचनाओं का मेलास चास्मा ड्यून्स नाम दिया गया है. इस बारे में बात करते हुए  प्लैनेटरी साइंस इंस्टीट्यूट के ग्रह विज्ञानी मैध्य चोनाकी ने बताया, “इस तरह का सरंक्षण रेत के टीलों में बहुत ही कम देखने को मिलता है खास तौर से तब जब अपरदन की प्रक्रिया निरंतर जारी हो. टीले पर जमाव के अन्य भूगर्भीय ईकाइयों के साथ इसके संबंध और आधुनिक अपरदन की दर के आधार पर हमने अनुमान लगाया है कि यह करीब एक अरब साल पुराना होना चाहिए.”

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    वैसे तो मंगल (Mars) पर टीले (Dunes) बहुत हैं, लेकिन यह खास तरह के टीले पहली बार देखे गए हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


    कैसे अंदाजा लगाया इनके समय का
    यह अध्ययन JGR प्लैनेट्स में प्रकाशित हुआ है. शोधकर्ताओं ने बताया कि मेलास चास्मा पुरातन टीलों के आकार, लंबाई, ऊंचाई, ढाल के अनुसार हाल के बने टीलों से मेल खाते हैं, इससे पता चलता है कि मंगल की जलवायु और वायुमंडल में हवा की दिशाओं सहित लंबे समय में बहुत कम बदलाव हुआ है.

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    ऐसे बने होंगे ये टीले
    वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि कुछ टीले अपने अंदर दसियों मीटर की सामग्री समेटे हैं जो  ऐसा लगता है कि किसी विनाशकारी ज्वालामुखी घटना के कारण बने होंगे. इससे यह भी पता चला है कि ज्वालामुखी प्रस्फोट से जो वाष्पशील पदार्थ निकले होंगे उससे इन टीलों को समय के साथ सख्त होने और जमने में मदद मिली होगी.

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    मंगल (Mars)की सतह (Surface) के देख कर लगता है कि वहां हवा की गतिविधियां नहीं के बराबर होती हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर NASA)


    पानी के भंडार भी
    इससे पहले मंगल के प्रोब मार्स एडवांस राडार ऑफ सबसर्फेस एंड आयनोस्फियर साउंडिग (MARSIS) ने साल 2018 में लाल ग्रह की सतह के नीचे एक पानी की विशाल भंडार खोजा था जो बर्फ की सतह के करीब 1.5 किलोमीटर नीचे था. वहीं यूरोपियन स्पेस एजेंसी के मार्स एक्सप्रेस स्पेसक्राफ्ट ने भी मंगल के दक्षिणी ध्रुव के नीचे बर्फ के नीचे झीलें देखी हैं. अब तक मंगल पर बर्फ के नीचे तीन पानी की झीलें देखी जा चुकी हैं.

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    मंगल पर इतने सारे शोध या तो वहां जीवन के संकेत खोजने के लिए किए जा रहे हैं या फिर ऐसी स्थितियों की तलाशने में किए जा रहे हैं जो जीवन का समर्थन करने में मददगार हों. नासा की पूरी कोशिश है कि जब वह मंगल पर अपने यात्रियों को अगले दशक में भेजेगा, तब मंगल के हालातों से जितनी सहायता उन्हें मिल सकती है मिल जाए. इसके लिए नासा ने मंगल पर खास पर्सिवियरेंस रोवर भी भेजा है जो अगले साल फरवरी में वहां तक पहुंच जाएगा.

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