10 साल की कोशिश के बाद लौटे पृथ्वी से चंद्रमा पर भेजे गए लेजर संकेत

10 साल की कोशिश के बाद लौटे पृथ्वी से चंद्रमा पर भेजे गए लेजर संकेत
चंद्रमा पर संकेत भेजकर उसे लौटाने की कोशिश पिछले दस सालों से चल रही थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

नासा (NASA) पिछले दस सालों से अपने चंद्रमा (Moon) पर लेजर संकेत (Laser Signal) भेज रहा था, लेकिन वे वापस (Reflect) नहीं आ रहे थे. ये अब संभव हो सका.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 13, 2020, 5:58 PM IST
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हाल ही में वैज्ञानिकों को पृथ्वी (Earth) से लेजर संकेत (Signals) भेज कर उन्हें वापस हासिल करने की उपबल्धि प्राप्त हुई है. वे इसके लिए पिछले 10 साल से काम पर रहे थे. दरअसल 1969 में नासा ने चंद्रमा (Moon) की सतह पर कुछ पैनल छोड़े थे. ये पैनल प्रकाश को प्रतिबिंबित कर सकते हैं. लेकिन नासा के लूनार रेकोनायसेंस ऑर्बिटर (Lunar Reconnaissance Orbiter, LRO)  की मदद से वैज्ञानिक यह मुश्किल उपलब्धि दस साल के प्रयासों के बाद हासिल कर सके.

2009 से शुरू हुए ये प्रयास
नासा ने अपना LRO अंतरिक्ष में साल 2009 में भेजा था जो चंद्रमा का अध्ययन उसकी कक्षा में रहते हुए कर रहा है. जब से LRO चंद्रमा की कक्षा में रह कर चंद्रमा के चक्कर लगा रहा है,  तभी से वैज्ञानिकों ने उस पर लगे छोटे से रिफ्लेक्टर पर लेजर बीम फेंकना शुरू कर दिया था. इस रिफ्लेक्टर का आकार पेपरबैक उपन्यास के आकार का है. लेकिन सफलता उन्हें अब मिली है.

पहली बार मिले रिफ्लेक्टर से संकेत
अपने फ्रेंच साथियों के साथ नासा ने हाल ही में इस बात की घोषणा की है कि उसे पहली बार इस रिफ्लेक्टर से संकेत वापस मिले हैं.  पहली बार ऐसा हुआ है कि लेजर बीम LRO से पृथ्वी पर प्रतिबिंबित हुई हैं. इस नतीजे से ब्रह्माण्ड की भौतिकी को समझने के लिए होने वाले लेजर प्रयोगों की संख्या अब बढ़ने वाली है. नासा के मैरीलैंड के ग्रीनबेल्ट स्थित गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सैंटर के प्लैनेटरी वैज्ञानिक इरवान माजारिको ने बताया, “लेजर रेंजिंग विज्ञान बहुत विशाल क्षेत्र है.



लेसर रिफ्लेक्टर्स क्यों?
लेजर रिफ्लेक्टर्स वैज्ञानिकों को नई खोजों में मदद कर सकते हैं. पृथ्वी से चंद्रमा पर स्थित रिफ्लेक्टर्स के बीच की सटीक दूरी पता कर सकते हैं और साथ ही चंद्रमा और पृथ्वी के बीच की सटीक दूरी भी. इससे यह भी पता चल सकता है कि चंद्रमा पृथ्वी से वास्तव में किस गति से दूर जा रहा है. ऐसी ही मापन के जरिए ही पता चला है कि चंद्रमा की क्रोड़ परत तरल है. यानि ऐसे अध्ययन से काफी कुछ पता चल सकता है.
और भी जानकारी मिलने की उम्मीदLRO का रिफ्लेक्टर डिजाइन में मदद करने वाली गोडार्ड प्लैनेटरी वैज्ञानिक जियाओली सन ने बताया, “और ज्यादा जानने के लिए सबसे पहले हमें पृथ्वी के स्टेशन और चंद्रमा रिफ्लेक्टर्स के बीच की दूसरी जाननी होगी. इस बारे में सटीक मापन से हमें हमारे सौरमंडल के विकास और गरुत्व के बारे में जानकारी मिल सकेगी.जितना सोचा था उसके करोड़ों साल बाद पैदा हुआ था चंद्रमाबहुत मुश्किल था प्रयोग में सटीकता लानाइस प्रयोग में सटीकता लाना बहुत मुश्किल होगा जो की प्रकाश का कुछ हिस्सा धूल वगैरह की वजह से बीच में खो जाता है. इसके लिए और ज्यादा प्रकाश भेज कर यह प्रयोग करना होगा. LRO का रिफ्लेक्टर भी चुनौतीपूर्ण है. ये अपोलो 11 और 14 के छोटे पैनलों के आकर के दसवें हिस्से से भी छोटा है. इसमें केवल कोने 12 क्यूब मिरर हैं. इसके अलावा लेजर स्टेशन का मौसम, पृथ्वी चंद्रमा और सूर्य के बीच  आपस की स्थिति भी इस प्रयोग पर खासा असर डालेंगे.लगातार मिली असफलताइन्ही तमाम मुश्किलों की वजह से ही पिछले एक दशक के बहुत से प्रयासों के बाद नासा के गोडार्ड वैज्ञानिक LRO के रिफ्लेक्टर तक पहुंच नहीं बना पा रहे थे.  जब तक कि उन्होंने फ्रेंच वैज्ञानिकों के साथ मिलकर काम नहीं नहीं किया


इस तकनीक से हुआ फायदा
फ्रांस के कोटे डी एजुर यूनिविर्सिटी की टीम ने एक आधुनिक तकनीक विकसित की जिससे एक इंफ्रारेड तरंग को LRO तक भेजा सकता है. इंफ्रारेड तरंग का फायदा यह होता है कि यह हमारे वायुमंडल को भेद सकती है. जबकिइसेस पहले वैज्ञानिक हरे रंग की तरंग की प्राकश तरंग को वहां भेजने की कोशिश कर रहे थे.

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फिर भी आई ये परेशानी
लेकिन इंफ्रारेड तरंग से भी ग्रासे टेलीस्कोप हजारों फोटोन्स में से केवल करीब 200 फोटोन ही वापस पा सका. वैज्ञानिकों ने पाया कि इस प्रयोग से उन्हें इस बात की पुष्टि करने में मदद मिली कि चंद्रमा की सतह पर दशकों से धूल जमा हो रही है. वैज्ञानिकों का काम यहीं खत्म नहीं हुआ है. वे और अध्ययन कर नई जानकारी लेना चाहते हैं और बेहतर के साथ ज्यादा संकेतों को वापास पृथ्वी पर लाना चाहते हैं.
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