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मिल गया पृथ्वी पर दूसरा ब्रह्माण्ड, ऐसा क्यों कह रहे हैं नासा के वैज्ञानिक

Vikas Sharma | News18Hindi
Updated: May 20, 2020, 5:49 PM IST
मिल गया पृथ्वी पर दूसरा ब्रह्माण्ड, ऐसा क्यों कह रहे हैं नासा के वैज्ञानिक
.नासा ने एक अध्ययन के लिए अंटार्कटिका को चुना था जहां उन्हें यह घटना देखने को मिली.

नासा के वैज्ञानिकों के अंटार्कटिका (Antarcitca) पर कॉस्मिक किरणों (Cosmic Rays) के अनोखी बारिश देखी है जिससे उन्हें लगता है कि यह एक समांतर ब्रह्माण्ड (Parallel Universe) हो सकता है.

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नई दिल्ली:  दुनिया में कोई भी घटना होती है, तो वैज्ञानिक उसकी विज्ञान के नियमों के तहत व्याख्या करते हैं. लेकिन कई बार ऐसी घटनाएं भी होती हैं जो वैज्ञानिकों को बहुत नामुमकिन सा निषकर्ष निकाले पर मजबूर कर देती हैं. ऐसा ही एक निष्कर्ष वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका (Antarctica) में देखी गई एक घटना से निकाला. वैज्ञानिकों को अनुमान है कि इस घटना से साबित हो सकता है कि हमारे आसपास ही एक दूसरा यानि समांतर ब्रह्माण्ड (Parallel Universe) है.

आखिर क्या हो गया ऐसा
आमतौर पर कॉस्मिक किरणों की बारिश अंतरिक्ष  में होती है और यह हमारे आकाश में दिखती है, लेकिन अगर यह बारिश धरती से हो तो वैज्ञानिकों के तो सारे सिद्धांत ही गलत साबित होने लगेंगे और यही हुआ है.इसी लिए वैज्ञानिकों यह निष्कर्ष तक खारिज करने की स्थिति में नहीं हैं कि इसका कारण एक समांतर ब्रह्माण्ड तक हो सकता है.

क्या थी यह घटना



इस पूरे मामले को समझने के लिए हमें शुरू से समझना होगा. नासा के वैज्ञानिक अंटार्कटिका का एक प्रयोग कर रहे थे. शोधकर्ताओं ने एक गुब्बारे पर लगे रडियो डिटेक्टर के आंकड़ों का अध्ययन किया जो खासतौर पर अंटार्कटिका के लिए छोड़ा गया था. यह रेडियो डिटेक्टर उन कॉस्मिक किरणों को पकड़ सकता है जो अंतरिक्ष से आकर अंटार्कटिका की बर्फ पर टकराकर परावर्तित होकर ठंडी शुष्क हवा में लौटती हैं.



ये किरणें अंटार्कटिका की बर्फ से आ रही थीं.


लेकिन अंटार्कटिका ही क्यों
वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका का चुनाव इस लिए किया था क्योंकि इन किरणों को पर व्यवधान कम से कम होगा. यहां न तो किसी वायु प्रदूषण और न ही किसी ध्वनि व्यवधान की संभावना थी. नासा के इस रेडियो डिटेक्टर का नाम अंटार्कटिका इम्पल्सिव ट्राजिएंट एंटीना (ANITA) है.

क्या देखा गया प्रयोग में
ANITA ने अपने 2006 और 2014 की उड़ान के दौरान एक उच्च ऊर्जा कणों को निकलते देखा. इसे वैज्ञानिकों ने कणों का एक फुव्वारा कहा. अध्ययन में पाया गया कि ये कण परावर्तन (Reflection) से नहीं बल्कि उत्सर्जन से नीचे से ऊपर की ओर जा रहे थे. यानि यह एक तरह से कॉस्मिक किरणों की उल्टी बारिश हो रही थी. 2016 में हुए अध्ययन में पाया की वाकई यह कॉस्मिक किरणों की बारिश है.

तो समांतर ब्रह्माण्ड कैसे?
इस प्रयोग से वैज्ञानिकों को लगता है कि उन्होंने यह प्रयोग करते हुए एक समांतर ब्रह्माण्ड का प्रमाण ढूंढ लिया है. यह एक बहुत बड़ा दावा हो सकता है, लेकिन इसका आधार शोधकर्ता यह बताते हैं उन्होंने ऐसी जगह मिली है जहां भैतिकी की मानक नियम लागू नहीं होते. इसी लिए इस जगह को एक समांतर ब्रह्माण्ड की संज्ञा दी जा रही है.

Nasa
इस घटना ने वैज्ञानिकों को शोधपत्र जारी करने पर मजबूर कर दिया.


तो फिर समय के पीछे जाता हुआ ब्रह्माण्ड कैसे
शोधकर्ताओं का लगता है कि इस तरह की उल्टी बारिश यानि कि कणों का उल्टी दिशा में उत्सर्जित होना यह दर्शाता है कि ये कण समय के विपरीत दिशा में लौट रहे हैं. इसीलिए उन्हें लगता है कि हमारे पास ही एक समांतर ब्रह्माण्ड मौजूद है.

शोधपत्र जारी करने को मजबूर हुए शोधकर्ता
हवाई यूनिवर्सीटी के भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर पीटर ग्रोहैम ने कहा, “ऐसा लगता है कि कॉस्मिक किरणें बर्फ से निकल रही थीं. यह काफी अजीब बात है. यह भौतिकी मान नियमों के विरुद्ध दिखाई देता है. इसी लिए हमने इस पर शोध पत्र जारी करने का फैसला किया.“

ऐसे घटना तो समांतर ब्रह्माण्ड में ही हो सकती है
इस खोज से ऐसा लगता है कि संकेत ऊपर जा रहे कणों से आ रहे थे. जो बर्फ से निकलने से पहले पृथ्वी की सतह के अंदर से एक सुरंग के जरिए आ रहे होंगे. लेकिन कॉस्मिक किरणें इतनी बड़ी संख्या में ऐसे नहीं आ सकतीं.  ऐसा लगता है कि ये कॉस्मिक किरणें पृथ्वी की अंदर विस्फोटित  हुए सुपरनोवा से आ रहीं थीं.

प्रोफेसर ग्रोहैम का कहना है कि सभी लोग इस अवधारणा को स्वीकार नहीं कर पाएंगे. अभी भले ही कुछ सिद्ध न किया जा पा रहा हो, लेकिन यह तय है कि यह वैज्ञानिकों को खोज के अनंत संभावना देता दिखाई दे रहा है.

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First published: May 20, 2020, 5:47 PM IST
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