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nasa to explore alien life on distant worlds by swarm of tiny swimming robots viks

नासा के छोटे तैरने वाले रोबोट की सेना खोजेगी पृथ्वी के बाहर जीवन

इस तरह के अभियान में एक पृथ्वी (Earth) से अलग ही तरह के जीवन के मिलने की उम्मीद है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: NASA/JPL-Caltech)

इस तरह के अभियान में एक पृथ्वी (Earth) से अलग ही तरह के जीवन के मिलने की उम्मीद है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: NASA/JPL-Caltech)

नासा (NASA) की जेट प्रपल्शन लैबोरेटरी में पृथ्वी (Earth) के बाहर जीवन के तलाश के लिए एक अद्भुद अवधारणा पर काम चल रहा है. इसमें ऐसे मोबाइल फोन के आकार के रोबोट (Tiny Robots) के झुंड को गुरु और शनि के चंद्रमाओं की मोटी बर्फीली सतह के नीचे महासागरों में छोड़ने की प्रणाली तैयार की जा रही है जहां ये छोटे रोबोट विचरण करते हुए जीवन के संकेतों का अन्वेषण करने का काम करेंगे.

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पृथ्वी के बाहर जीवन (Life beyond Earth) की तलाश हमारे सौरमंडल में ही पूरी हो सकती है. वैज्ञानिकों को काफी उम्मीद है कि गुरु और शनि ग्रह के चंद्रमा (Moons of Jupiter and Saturn) जिनकी सतह बर्फ की पर्पटी से ढकी है, के नीचे मौजूद पानी में जीवन का एक अलग स्वरूप हो सकता है. वहां ऐसे हालात हो सकते हैं जिनमें जीवन का पनपना पूरी तरह से संभव है. नासा (NASA) की जेट प्रपल्शन लैबोरेटरी एक रोचक अवधारणा पर काम कर रही है जिसमें ऐसे ग्रह अभियानों में सतह के नीचे के महासागरों में जीवन के संकेत तलाश हो सकेगी.

कैसे पहुंचेंगे उस संसार में
नासा के मुताबिक एक दिन सेलफोन के आकार के छोटे रोबोट की सेना गुरु के चंद्रमा यूरोपा और शनि के चंद्रमा एनसेलाडस की मीलों मोटे बर्फीले खोल के नीचे के पानी में विचरण कर सकेंगे. इससे वे एलियन जीवन के प्रमाण की तलाश करेंगे. इन्हें एक पतले बर्फ को पिघलाने वाले प्रोब के अंदर पैक किया जाएगा जो जमी हुई पर्पटी में सुरंग बनाएगा और पानी के नीचे इन रोबोट के झुंड को छोड़ देगा.

किसने दी है ये अवधारणा
यह अवधारणा साउथ कैलिफोर्निया में स्थित नासा के के जेट प्रपल्शन लैबोरेटरी के रोबोटिक्स मैकेनिकल इंजीनियर इथन स्केलर ने दी है जिसे उन्होंने सेंसिंग विद इंडिपेंडेंट माइक्रो स्विमर्स  (SWIM) नाम दिया है. स्केलर की इस अवधारणा को हाल ही में नासा के इनोवेटिव एडवांस कॉन्सेप्ट्स (NIAC) कार्यक्रम के तहत फेस 2 फंडिंग के तहत  छह लाख डॉलर का पुरस्कार मिला है.

परीक्षण की तैयारी
इससे पहले NIAC फंडिंग के पहले चरण में एक लाख 25 हजार डॉलर दिए गए थे जिससे वे डिजाइन विकल्पों और उसकी व्यवहार्यता का अध्ययन कर सकें. इन दोनों पुरस्कार राशियों से स्केलर और उनकी टीम आने वाले दो सालों में अपने 3 डी प्रोटोटाइप बना कर उसका परीक्षण कर सकेंगे.

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इस अभियान में मीलों मोटी बर्फीली सतह में सुरंग बनाकर महासागर में रोबोट (Robots) छोड़े जाएंगे. (प्रतीकात्मक तस्वीर: NASA/JPL-Caltech)

छोटे रोबोट के फायदे
स्केलर की बड़ी खोज उनके छोटे तैराक रोबोट हैं जो दूसरे ग्रहों के महासागारों में अन्वेषण करने वाले प्रस्तावित रोबोट से काफी छोटे हैं.  इससे उनकी वैज्ञानिक पहुंच में बहुत विस्तार  हो सकेगा. और उन्हें भारी संख्या में बर्फीले प्रोब में रखा जा सकेगा. इससे ऐसे संसारों में जीवन की तलाशने की संभावना बढ़ जाएगी और साथ ही ऐसे संसारों की आवासीयता का भी अध्ययन किया जा सकेगा.

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भारी संख्या का फायदा
स्केलर ने बताया कि उनका विचार यही था कि हम सौरमंडल के नए और रोचक अन्वेषण के तरीकों के साथ छोटे रोबोटिक्स को कहां ले जाकर लागू कर सकते हैं. छोटे तैरने वाले रोबोट के समूह के साथ हम महासागरों के विशाल क्षेत्र का अवलोकन और अध्ययन कर सकेंगे जहां बहुत सारे रोबोट एक ही क्षेत्र से बहुल आंकड़े देकर मापन में मददगार होंगे.

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इसमें ऐसी व्यवस्था भी है जिससे छोड़े गए रोबोट (Robots) का सतह से संपर्क बना रहे और उन्हें वापस भी लाया जा से. (प्रतीकात्मक तस्वीर: NASA/JPL-Caltech)

कैसा होगा आकार
इन रोबोट की लंबाई केवल 5 इंच या 12 सेमी की होगी, आयतन में 60-75 क्यूबिक सेमी होगा और 25 सेमी के व्यास वाले, 10 सेमी लंबे क्रायोबोट में ऐसे चार दर्जन रोबोट समाकर केवल 15 प्रतिशत आयतन घेरेंगे. नासा का यूरोपा क्लिपर अभियान साल 2024 में प्रक्षेपित होगा और 2030 में गुरु के इस चंद्रमा पर उतरेगा.लेकिन क्रायोबोट की अवधारणा आगे के समय के लिए भी तैयार की जा रही है.

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इस अभियान में एक संवेदनशील हिस्सा होगा उस जगह का चयन जहां से सुरंग बनाकर उपकरणों और रोबोट को महासागर में उतारा जाएगा. शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसी व्यवस्था बनाई जाएगी कि ये रोबोट वापस सतह पर लाए जा सकें और फिर दूसरी जगह सुरंग कर फिर से अन्वेषण किया जा सके क्योंकि जरूरी नहीं जहां सुरंग बनेगी उसके नीचे जीवन हो ही. जैसे अगर मंगल पर एक इंजेन्युटी हेलीकॉप्टर की जगह बहुत से हेलीकॉप्टर होते तो हमें मंगल के बारे में काफी कुछ पता चल गया होगा. SWIM के पीछे यही धारणा है.

Tags: Earth, Nasa, Research, Science, Space

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