NASA क्यों खोज रहा है चंद्रमा की धूल से निपटने के तरीके

नासा पहले भी चंद्रमा की धूल (Lunar Dust) से परेशानियां झेल चुका है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

NASA चंद्रमा (Moon) पर आर्टिमिस सहित अपने भावी अभियानों के लिए वहां की धूल (Lunar Dust) से पैदा होने वाली समस्याओं का हल तलाश रहा है.

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    नासा (NASA) पांच दशक से भी ज्यादा समय के बाद चंद्रमा (Moon) पर इंसान भेजने की तैयारी कर रहा है. अपने आर्टिमिस कार्यक्रम के तहत वह साल 2024 में एक महिला और एक पुरुष को चंद्रमा की सतह पर कुछ लंबे समय के लिए उतारेगा. इसके लिए उसे बहुत सी चुनौतियों को पार पाना है. इनके अलावा नासा एक और समस्या से निजात पाने का प्रयास  कर रहा है. वह है चंद्रमा की धूल (Lunar Dust) की वजह होने वाली दिक्कतें. यह धूल पृथ्वी की धूल से बहुत ही अलग होती है जो कई लिहाज से बहुत ही ज्यादा खतरनाक है.

    पहले भी आई थीं परेशानियां
    दरअसल जब नासा के अपोलो 11 अभियान के तहत पहली बार इंसान को चंद्रमा पर उतारा गया था तभी चंद्रमा की धूल एक बहुत बड़ी समस्या बनकर सामने आई थी. चंद्रयात्रियों ने पाया कि कैसे यह धूल उनके कामकाज में बाधा बन रही है. यह धूल कैमरे लैंस पर आई, रेडिएटर को ज्यादा गर्म कर दिया और इसने स्पेस सूट को भी नुकसान पहुंचाया.

    नासा की चिंता
    नासा को अब इस बात कि चिंता है क पिछली बार की तरह इस बार भी कहीं उसके उन्नत उपकरणों को नुकसान ना पहुंचा दे. क्लीवलैंड स्थित नासा के ग्लेन रिसर्च सेंटर के पैसिव डस्ट शेडिंग मटेरियल प्रोग्राम के प्रमुख अन्वेषणकर्ता शैरोन मिलर ने प्रेस रिलीज में कहा था  कि अपोलो अभियान से शोधकर्ताओं ने सीखा था कि चंद्रमा की धूल का आकार 20 माइक्रोन (लगभग 0.00078 इंच) से भी कम हो सकती है.

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    नासा का आर्टिमिस मिशन (Artemis Mission) तीन चरणों में होगा जिसके अंतिम चरण में यात्री चंद्रमा पर पहुंचाए जाएंगे. (तस्वीर: NASA)


    कैसे गर्म हुए उपकरण
    मिलर ने बताया कि अपोलो11 यान के कुछ उपकरण ज्यादा गर्म हो गए क्योंकि चंद्रमा की धूल के कारण उनसे ऊष्मा बाहर नहीं निकल सकी. इसके अलावा उपकरणों में यांत्रिक अवरोध जैसी समस्या भी देखी गई थी. उन्होंने बताया कि चंद्रमा की धूल बहुत ही महीन, खुरदुरी और कांच के टुकड़ों की तरह तीखी होती है जिससे वह केवल साधारण व्यवधान से ज्यादा खतरनाक होती है.

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    पृथ्वी की धूल से ज्यादा खतरनाक
    चंद्रमा की धूल पृथ्वी पर पाई जाने वाली धूल से ज्यादा खतरनाक है. चंद्रमा की सतह पर हवा नहीं चलती है, इसलिए कही पर भी जमा होने पर धूल के कण अपनी जगह से निकलते नहीं हैं जैसे की पृथ्वी पर होता है. इससे यह धूल किनारों पर और भी तीखी हो जाती है. नासा के ग्लेन रिसर्च सेंटर के ही लूनार डस्ट मिटिगेशन प्रोजेक्ट की प्रोजेक्ट मैनेजर एरिका मोंटबैच ने बयान में बताया कि चंद्रमा की धूल रेगोलिथ से हुई है जो चंद्रमा पर मौजूद चट्टान और खनिज हैं. इस धूल में महीन कणों के धार दार किनारे होते हैं.

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    सबसे पहले नासा के अपोलो-11 (Apollo-11) अभियान के यात्रियों को चंद्रमा की धूल से समस्या का सामना करना पड़ा था. (तस्वीर: Pixabay)


    एक सा बर्ताव नहीं सब जगह
    नासा ने इस बात का भी खुलासा किया कि चंद्रमा की धूल का बर्ताव हर जगह एक सा नहीं होता. चंद्रमा की भूमध्य रेखा या उच्च भूमि या फिर चंद्रमा के पिछले हिस्से की धूल का बर्ताव अलग होता है. सूर्य की ओर के हिस्से की धूल हमेशा ही सौर विकिरण का सामना करती है. इस वजह से उनसमें धनात्मक विद्युत आवेश रहता है. इस वजह से उससे हर चीज चिपकने की कोशिश करती है जैसा कि पृथ्वी पर होता है.

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    नासा ने उठाया यह कदम
    इस समस्या से निपटने के लिए नासा ने साल 2019 में लूनार सरफेस इनोवेश इनिशिएटिव (LSII) की स्थापना की है जिसका काम विभिन्न एजेंसियों  से समन्वय कर नई तकनीकों को ईजाद करने के लिए मंथन करना है जो चंद्रमा की सतह के अन्वेषण के लिए आवश्यक होंगी.

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