भारत में आज पहली बार: खोजा गया रमन प्रभाव, जिसके लिए मिला नोबेल पुरस्कार

सीवी रमन  ने 28 फरवरी 1928 को रमन प्रभाव के प्रयोग में सफलत पाई थी.  (फाइल फोटो)

सीवी रमन ने 28 फरवरी 1928 को रमन प्रभाव के प्रयोग में सफलत पाई थी. (फाइल फोटो)

28 फरवरी 1928 को महान वैज्ञानिक सर सीवी रमन (CV Raman) ने अपने मशहूर रमन प्रभाव (Raman Effect) की खोज की थी. इसी खोज के सम्मान में 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (National Science Day) मनाया जाता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 28, 2021, 6:48 AM IST
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28 फरवरी भारत के इतिहास (Indian History) में बहुत अहम दिवस के रूप में दर्ज है. इस दिन साल 1928 में भारत में पहली एक बहुत ही खास वैज्ञानिक खोज (Scientific Research)  हुई थी जिसकी वजह से भारतीय वैज्ञानिक सीवी रमन (CV Raman) को नोबेल पुरस्कार मिला था. यह पहला मौका था जब किसी भारतीय को विज्ञान के लिए नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) लेकिन इससे भी बड़ी थी वह खोज जो आज रमन प्रभाव (Raman Effect) के नाम से जानी जाती है. डॉ सीवी रमन के सम्मान में आज ही के दिन भारत में 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (National Science Day) मनाया जाता है.

एक सवाल से शुरू हुआ शोध
रमन प्रभाव वास्तव में सैक्ट्रिक ऑफ लाइट यानि प्रकाश का विकीर्णन या बिखराव का सिद्धांत है. साल 1921 में  जब रमन लंदन से बम्बई के लिए लौट रहे थे, तो उस यात्रा के पंद्रवें दिन वे शाम को कुछ चिंतन कर रहे थे. तब उन्हें भूमध्यसागर के गहरे नीले रंग ने आकर्षित किया और उनके दिमाग में सवाल कौंधा कि यह रंग नीला क्यों है.

28 फरवरी को मिली सफलता
रमन के दिमाग में यह सवाल गहरे बैठ गया था. इसका जवाब पाने के लिए उन्होंने बहुत सारे प्रयोग किए और अंततः 28 फरवरी 1928 को उन्हें सफलता मिली. इसीलिए 28 फरवरी को ही राष्ट्रीय विज्ञान दिवस का दर्जा दिया गया है. रमन ने बर्फ के पारदर्शी टुकड़ों और प्रकाश मरकरी आर्क लैम्प के साथ प्रयोग किया और बर्फ से गुजरने के बाद चमकने वाले प्रकश के स्पैक्ट्रम रिकॉर्ड किए. इन प्रकाश की वजह से स्पैक्ट्रम में बनी रेखाओं को ही बाद में रमन रेखाएं नाम दिया जो वास्तव मे रमन प्रभाव की बनती हैं.



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इस खोज के सम्मान में ही 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (National Science Day) के रूप में मनाया जाता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


क्या है रमन प्रभाव
रमन प्रभाव वास्तव में प्रकाश के प्रकीर्णन या बिखराव की प्रक्रिया है जो माध्यम के कणों की वजह से होती है. यह बिखराव तब होता है जब प्रकाश किसी माध्यम में प्रवेश करता है और उसके कारण उसके तरंगदैर्ध्य या वेवलेंथ में बदलाव आ जाता है. जब प्रकाश की किरण एक धूल मुक्तर पारदर्शी रसायन से गुजरती है, प्रकाश का छोटा हिस्सा जिस दिशा में जाना चाहिए उससे भटक जाता है.

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फोटोन का अणुओं से टकराव
प्रकाश फोटोन जैसे कणों से मिलकर बनता है जिनकी ऊर्जा उस आवर्ति की आनुपातिक होती है जिससे वह यात्रा करती है. फोटोन के माध्यम के अणुओं से उच्च गति से टकराने पर वे अलग अलग दिशाओं में बिखर जाते हैं. यह बिखराव अणुओं से टकराव के कोण पर निर्भर करता है. ज्यादातर टकराव प्रत्यास्थ यानि इलास्टिक होता है. फोटोन अपनी ऊर्जा कायम रखते हुए अपनी ही गति से दिशा बदल लेते हैं.

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सीवी रमन (CV Raman) ने अपनी खोज इस सवाल से शुरू की थी कि समुद्र का रंग नीला क्यों दिखता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


ऐसा दिखाई देता है रंग
ऐसा भी होता है कि कुछ फोटोन अणुओं से टकराने पर उर्जा अवशोषित या प्रदान कर देते हैं जिससे प्रकाश की आवृति कम हो जाती है, तरंगदैर्ध्य भी बदलता है और इसी का नतीजा होता है की माध्यम का रंग दिखाई देता है. आकाश का नीला रंग, समुद्र का नीला रंग, शाम को आसामान का लाल या दूसरे रंग का दिखाई देना सभी रमन प्रभाव की वजह से होते हैं.

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रमन प्रभाव ने स्पैक्ट्रोमैट्री में अपना अलग स्थान बनाया जिससे रमन स्पैक्ट्रोमैट्री का जन्म हुआ जिसके भौतिकी और रसायन शास्त्र में बहुत सारे उपयोग सामने आते रहे. रमन प्रभाव को दुनिया के वैज्ञानिकों ने हाथों हाथ लिया. खोज के पहले सात सालों में ही करीब 700 शोधपत्रों में रमन प्रभाव का जिक्र था.
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