वो पांच देश जहां नहीं होता पेट्रोल-डीजल का इस्तेमाल

गर्मियों के महीनों के दौरान स्कॉटलैंड ने इतनी सौर ऊर्जा इकट्ठी कर ली जो इन शहरों के सारे घरों की पूरी बिजली की मांग को पूरा कर सकती थी.

News18Hindi
Updated: September 13, 2018, 1:16 PM IST
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पेट्रोल डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं और हर तरफ विकल्प की तलाश हो रही है. क्या पेट्रोल और डीजल के बिना जिन शहरों गांवों में आप रहते हैं उनकी कल्पना कर सकते हैं? शायद यह बहुत मुश्किल होगा लेकिन कई देश ऐसे हैं जिन्होंने पर्यावरण को बचाने के लिए और देश के लोगों को सस्ता ईधन देने के लिए पेट्रोल डीजल से मुक्ति पा ली है.

लगभग एक दशक पहले नए ऊर्जा आंदोलन ने दुनिया भर में एक बेहद उग्र लड़ाई का सामना किया. लेकिन आज, दुनिया के वो देश जो पर्यावरण को लेकर चिंतित हैं, वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों को तेजी से गले लगा रहे हैं. ये देश अब भविष्य में पेट्रोलियम और खराब ऊर्जा से मुक्त होने का मार्ग प्रशस्त करने में जुटे हुए हैं. इस प्रक्रिया में, वे विश्व के प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करते हुए राष्ट्रीय ऊर्जा लागतों के बजट में भी बजट कर रहे हैं.

पेट्रोल -डीजल को लेकर शक्तिशाली कॉर्पोरेट अभियानों के बावजूद कुछ देश लोगों को रिन्यूएबल ऊर्जा से वैश्विक उद्योग की जरूरतों को पूरा करने के विकल्प के रूप में लोगों को मना पाए हैं.

ऐसे पांच देश हैं जो पेट्रोल डीजल का इस्तेमाल छोड़ बहुत आगे निकल चुके हैं -

कोस्टा रिका
2015 की शुरुआत से ही, कोस्टा रिका 100% ग्रीन हो चला है. जीवाश्म ईंधन से दूर यह कदम कोस्टा रिका के जंगलों और प्राचीन समुद्र तट बरकरार रखने में मदद करेगा. व्यापक बदलाव से कोस्टा रिका का लोग न केवल अपने प्राकृतिक संसाधनों को बचाएंगे, बल्कि यह सुनिश्चित करेंगे कि देश अपने पारिस्थितिक पर्यटन उद्योग से लाभान्वित रहेगा. हालांकि स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र पर पर्यटन के प्रभावों से सावधान भी रहना होगा.

कोस्टा रिका के रिन्यूएबल एनर्जी को लेकर किये गए प्रयासों में से एक में अपने बढ़ते हाइड्रोइलेक्ट्रिक संरचना को शक्ति देने के लिए बारिश का भरपूर उपयोग करना शामिल है. अविश्वसनीय रूप से यह छोटा सा देश में लैटिन अमेरिका में दूसरा सबसे अच्छा इलेक्ट्रिक इंफ्रास्ट्रक्चर बन गया है. फिर भी, उसने अपनी सारी ताकत एक ही जगह नहीं लगाई है. कोस्टा रिका भू-तापीय स्रोतों, हवा, बायोमास और सौर ऊर्जा उत्पादों से बिजली भी उत्पन्न कर रहा है.



डेनमार्क

डेनमार्क पवनचक्कियों में मामले में दुनिआ भर से ज़्यादा जानकारी रखता है और उनका इस्तेमाल 1970 से ही कर रहा है. पवनचक्की यानि विंडमिल से ही डेनमार्क ने अपने ग्रामीण इलाकों को इतना समृद्ध बनाया है. डेनमार्क ने 1970 के दशक तक अपनी पहली पवन टरबाइन स्थापित की और हाल के वर्षों तक इसे छोड़ा नहीं है. डेनमार्क अब पवन ऊर्जा के लिए दुनिया का अग्रणी देश है. वर्ष 2014 में, डेनमार्क ने विंडमिल उत्पादन के लिए एक विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया. अकेले इस एक स्वच्छ ऊर्जा स्रोत से देश अब कुल बिजली का लगभग 40% आनंद ले रहा है.

नए अध्ययनों से पता चलता है कि डेनमार्क 2020 तक अक्षय संसाधनों द्वारा संचालित 50% होने के अपने आत्मनिर्भर लक्ष्य को पूरा करने के अपने रास्ते पर है. आधे से खुश नहीं, डेनमार्क 2050 तक 100% रिन्यूएबल एनर्जी पर निर्भर होने की होने की उम्मीद करता है. यह एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य है, लेकिन डेनमार्क की हाल की सफलता साबित करती है कि वे स्थिति तक पहुंच सकते हैं. इस महीने, देश ने एक दिन मनाया जिसमें उसने पवन टरबाइन से 140% विद्युत शक्ति खींची.

स्कॉटलैंड
2014 स्कॉटलैंड और नवीनीकरण के लिए एक बहुत अच्छा साल था. दिसंबर 2014 के एक महीने में, स्कॉटलैंड ने अक्षय ऊर्जा में व्यक्तिगत रिकॉर्ड स्थापित किया. अकेले पवन ऊर्जा का उपयोग करके, स्कॉटलैंड ने अपने बढ़ते राष्ट्रीय ग्रिड में लगभग 1300 मेगावाट (मेगावाट-घंटे) प्रदान किया. लगभग 4 मिलियन घरों की बिजली आपूर्ति करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा है.

स्कॉटलैंड अब देश की घरेलू जरूरतों के लगभग 100% उत्पादन और आपूर्ति के लिए पवन ऊर्जा का उपयोग कर रहा है. गर्मियों के महीनों के दौरान, एबरडीन, एडिनबर्ग, ग्लास्गो, और इनवरनेस ने इतनी सौर ऊर्जा इकट्ठी कर ले जो इन शहरों के सारे घरों की पूरी बिल्जी खपत की मांग को पूरा कर सकती थी.

स्कॉटलैंड ने दुनिया में सबसे उन्नत कंप्यूटर संचालित ऊर्जा बुनियादी ढाँचे को बनाने में बड़ी मात्रा में धन का निवेश किया है.



स्वीडन
स्वीडन अपने नॉर्डिक पड़ोसी, डेनमार्क की ही कतार में शामिल हो रहा है. एक सीमित कोयला दृष्टिकोण यानि कोयले के काम से काम इस्तेमाल के साथ न केवल स्वीडन अपने ग्रीन कवर को बढ़ा रहा है बल्कि के अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी भी अब स्वीडन की शान में कसीदे पढ़ रहा है.

लेकिन स्वीडन अकेले कोयले के सीमित इस्तेमाल पर भरोसा नहीं कर रहा है- देश उन्नत बायोमास ऊर्जा प्रणालियों का विकास भी कर रहा है. रणनीति इतनी सफल रही है कि 2010 तक स्वीडन पहले से ही जीवाश्म ईंधन से बायोमास से अधिक ऊर्जा उत्पादन कर रहा था. इस तरह के कदम स्वीडन को हरे देशों की सूची में ला रहे हैं.

फिनलैंड
ऐसा लगता है कि फिनलैंड अपने उत्तरी पड़ोसियों से बिलकुल पीछे नहीं रहना चाहता. पवन ऊर्जा तेजी से देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को बदल रही है. इन हालिया कदमों ने जीवाश्म ईंधन के जलने के कारण देश के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को नाटकीय रूप से कम कर दिया है.

जब स्वीडन योग्य ऊर्जा की बात आती है तो फिनलैंड स्वीडन और डेनमार्क के साथ नहीं है, लेकिन यह तेजी से सही दिशा में आगे बढ़ रहा है. वर्ष 2012 तक, लगभग 34.3% ऊर्जा आवश्यकताओं को कवर करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा का उत्पादन कर रहा था और 2020 तक, यह 40% के करीब होने की उम्मीद है.अपने पड़ोसियों के रास्ते की ओर बढ़ने के साथ, भविष्य फिनलैंड के लिए उज्ज्वल दिखता है.
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