दर्द को कम सहन कर पाते थे हमारे ये पूर्वज, जानिए कैसे जाना वैज्ञानिकों ने

दर्द को कम सहन कर पाते थे हमारे ये पूर्वज, जानिए कैसे जाना वैज्ञानिकों ने
दर्द की संवेदनशीलता हमारे पूर्वज निएंडर्थाल में ज्यादा रहा करती थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

एक शोध में पाया गया है कि हमारे पूर्वजों की निएंडर्थाल (Neanderthal) प्रजाति के लोग दर्द (Pain) के प्रति आज के इंसान के मुकाबले ज्यादा संवेदनशील (Sensitive) थे.

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दर्द (Pain) के मामले में लोगों की अलग अलग सहनशीलता (Sensitivity) होती है. कहा जाता है कि कुछ लोगों को कम दर्द होता है कुछ लोगों को ज्यादा. लेकिन हाल ही में हुए एक अध्ययन में  वैज्ञानिकों ने अपने अनुवाशिंकी (Genetics) अध्ययन में पाया है कि हम इंसानों के पूर्वजों की एक प्रजातियों में दर्द के प्रति संवेदनशीलता कुछ ज्यादा थी. जब कि आज के लोगों में उतनी संवेदनशीलता नहीं हैं. इसका मतलब यह हुआ कि आज के इंसानों को दर्द कम महसूस होता है.

किस पूर्वज प्रजाति पर हुआ अध्ययन
शोधकर्ताओं ने निएंडर्थाल प्रजाति के जीन्स का अध्ययन किया. इंसानों के ही पूर्वजों में एक माने जाने वाली निएंडर्थाल प्रजाति के मनुष्यों के बारे में कहा जाता है कि वे शिकारी थे और जंगल में अपने भोजन जमा किया करते थे. वे शारीरिक रूप से बहुत तनावपूर्ण जीवन जिया करते थे. इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने इस प्रजाति के जीन्स का अध्ययन कर पाया कि वे जीन्स का वह कौन सा हिस्सा है जो उनके दर्द के अहसास में योगदान देता है.

तीन म्यूटेशन का योगदान
हाल ही में हुए इस शोध से खुलासा हुआ है कि हिमयुग के दौर में रहने वाले हमारे ये पूर्वजों में दर्द सहन करने की क्षमता आज के इंसानों के मुकाबले कम थी. हमारे पूर्वजों की यह प्रजाति आज से कीरब 40 हजार साल पहले ही विलुप्त होकर उससे बेहतर और उन्नत की प्रजाति में बदल गई.  जेनेटिक वैज्ञानिकों यानि कि अनुवांशिकविदों ने पता लगाया है कि निएंडर्थाल लोगों की एक जीन में तीन म्यूटेशन हुए थे जिनका संबंध हमारे दिमाग और रीढ़ में दर्द की संवेदनाएं पहुंचाने से संबंध था.



एक नहीं बहुत से लोगों की जीन्स में पाया गया यह म्यूटेशन
नैव1.7 प्रोटीन वाली जीन का म्यूटेटेड संस्करण बहुत से निएंडर्थाल जीनोम को दोनो क्रोमोजोम समूह में पाया गया. इससे पता चलता है कि पूरी जनसंख्या में यह म्यूटेशन हुआ था. यह अध्ययन जर्मनी में लेइप्जिग के मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर इवोल्यूशनरी एंथ्रोपोलॉजी और स्टॉकहोम में कारोनिंस्का इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं की किया है. इस अध्ययन के नतीजे करेंट बायोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं.

Pain
आज भी पुराने जीन म्यूटेशन के कारण कई लोगों के दर्द ज्यादा महसूस होता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


आज भी कई लोगों में पाया जाता है यह म्यूटेशन
शोधकर्ताओं का इसमें सबसे अजीब बात यह पता चली कि आज के कुछ इंसानों में भी निएंडर्थाल के जमाने के नैव1.7 का सोडियम चैनल किसी रूप में पाया जाता है. इससे कुछ सोडियम और पोटेशियम के आयन उनकी कोशिका में प्रवेश कर जाते हैं जिसे कोशिका से संकेत तेजी से आ जा पाते हैं. यानि कि उनकी संवेदनशीलता ज्यादा हो जाती है.

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बहुत सी अनुवांशिकी विविधताएं
निएंडर्थाल हमारे सीधे पूर्वज नहीं हैं. निएंडर्थाल, उनके एशियाई संबंधी डेनिसोवांस और आज के इंसानों के उस समय के पूर्वजों का अलग अलग विकास हुआ था, लेकिन कालांतर में ये प्रजातियां मिश्रित हो गईं. जिससे बहुत से अनुवांशिकी विविधताएं देखने को मिली. इसके बाद आज के होमोसेपियंस देखने को मिले.

DNA
यह अंतर केवल एक जीन म्यूटेशन की वजह से है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


तो आज के इंसानों कैसे हुई तुलना
शोधकर्ताओं के अनुसार सोडियम चैनल हमारी दर्द संबंधी संवेदनाओं के पैदा करने और उन्हें दिमाग तक पहुंचने में अहम भूमिका निभाते हैं. अब उनका लक्ष्य इस म्यूटेशन की आधुनिक मानवों उपस्थिति का अध्ययन करना था, और इसके लिए उन्होंने यूके के 3,62,000 लोगों से पूछे गए दर्द संबंधी  सवालों का भी अध्ययन किया. इन सवालों के जवाबों से मिले आंकड़ों की तुलना उन्होंने जीन प्रोफाइल से की.

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इस तुलना में शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन लोगों में चैनल नैव1.7 का निएंडर्थाल वेरिएंट था उन्होंने दर्द ज्यादा अधिक महसूस किया. जबकि जिनलोगों में यह वेरिएंट नहीं था उन्होंने कम दर्द महसूस किया. तो अगर आपको दर्द के प्रति औरों के मुकाबले कुछ ज्यादा संवेदनशीलता है तो इसका जिम्मेदार वह निएंडर्थाल वेरिएंट हो सकता है.
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