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अयोध्या मामले में नेहरू, लालबहादुर शास्त्री और गोविंद वल्लभ पंत क्यों थे शर्मिंदा

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: November 9, 2019, 11:12 AM IST
अयोध्या मामले में नेहरू, लालबहादुर शास्त्री और गोविंद वल्लभ पंत क्यों थे शर्मिंदा
नेहरू को महसूस होने लगा था कि कांग्रेस के शीर्ष नेता सांप्रदायिक भाषा में बात करने लगे हैं

Ram Janmbhoomi Babri Masjid Dispute Case: अयोध्या (Ayodhya) में 50 के दशक में सांप्रदायिक हालात बिगड़ने लगे थे. इसने तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू (Pandit Jawaharlal Nehru) को विचलित कर दिया था.

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  • Last Updated: November 9, 2019, 11:12 AM IST
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1949 में शुरू हुए अयोध्या विवाद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को विचलित कर दिया. उन्हें लग रहा था कि कांग्रेस के ही कुछ शीर्ष नेता सांप्रदायिक भाषा में बातें करने लगे हैं. ये स्थिति उनके लिए नागवार थी. नेहरू ने यूपी की घटनाओं पर अगर खुद शर्मिंदा पाया तो संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने भी उन्हें पत्र लिखकर कहा कि वो शर्मिंदा हैं. उस समय यूपी के गृह मंत्री लालबहादुर शास्त्री थे, उन्होंने भी तत्कालीन घटनाओं पर खेद जाहिर किया.

अयोध्या मामले में कई पत्र लिखने के बाद प्रधानमंत्री नेहरू ने 17 अप्रैल 1950 को फिर गोविंद बल्लभ पंत को पत्र लिखा:

‘‘शाहजहांपुर के बारे में आपके पत्र के लिए शुक्रिया. मुझे पूरा भरोसा है कि उत्तर प्रदेश में हाल ही में पेश आई दिक्कतों के बारे में आपकी सरकार ने सख्त और कारगर कदम उठाए होंगे. मुझे यह जानकर खुशी है कि आप की कार्रवाई और आपने जो समझौता किया, उसके फलस्वरूप हालात अब स्थिरता की ओर बढ़ रहे हैं.
यूपी में हाल ही में हुई घटनाओं ने मुझे बुरी तरह दुखी किया है. या यों कहें कि लंबे समय से मैं जो महसूस कर रहा हूं, यह उसका मिलाजुला असर है. लोगों की मौत और हत्याओं की खबर बहुत दुखदायी होती है, लेकिन इससे मैं उतना परेशान नहीं होता. जो चीज मेरा दिल को कचोटती है, वह है मानव मूल्यों को पूरी तरह पतन. और हद तो तब हो जाती है, जब इस तरह की हरकतों को वाजिब ठहराया जाता है.

मैं लंबे समय से महसूस कर रहा हूं कि सांप्रदायिकता के लिहाज से यूपी का माहौल बुरी तरह बिगड़ता जा रहा है. बल्कि यूपी मेरे लिए एक अजनबी जमीन होती जा रही है. मैं खुद को उसमें फिट नहीं पाता. यूपी कांग्रेस कमेटी, जिसके साथ में 35 साल तक जुड़ा रहा, अब इस तरह काम कर रही है, जिसे देखकर मैं आश्चर्य में पड़ जाता हूं. इसकी आवाज उस कांग्रेस की आवाज नहीं है, जिसे मैं जानता हूं, बल्कि यह आवाज उस तरह की है जिसका मैं पूरी जिंदगी विरोध करता रहा हूं. पुरुषोत्तम दास टंडन, जिनसे मुझे दिली मोहब्बत है और जिनका मैं सम्मान करता हूं, वह लगातार भाषण दे रहे हैं. वह भाषण मुझे कांग्रेस के बुनियादी उसूलों के खिलाफ नजर आते हैं. विशंभर दयाल त्रिपाठी जैसे दूसरे कांग्रेस मेंबर इस तरह के आपत्तिजनक भाषण दे रहे हैं, जैसे भाषण हिंदू महासभा के लोग देते हैं.’’

गौरतलब है कि नेहरू के लाख विरोध के बावजूद पुरुषोत्तमदास टंडन कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे. उन्हें सरदार पटेल का समर्थन हासिल था. पटेल के निधन के बाद नेहरू टंडन का इस्तीफा कराने में कामयाब हो पाए थे.

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यह एक किस्म का लकवा है..
बहरहाल पत्र में नेहरू आगे कहते हैं, ‘‘अनुशासनात्मक कार्रवाई के बारे में हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन सांप्रदायिकता के मामले में कांग्रेस की नीति में जो बुनियादी बिगाड़ आ रहा है, उसे हम लगातार स्वीकार किए जा रहे हैं.

नेहरू ने संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को खत में लिखा, मैं लंबे समय से यूपी नहीं आया हूं, मुझे वहां आने में हिचक होने लगी है. मैं वहां बुरी तरह असहज महसूस करता हूं.


अगर समुद्र ही अपना खारापन छोड़ दे, तो फिर खारापन लाएंगे कहां से.
मैं लंबे समय से यूपी नहीं आया हूं, इसकी एक वजह तो यह है कि मेरे पास वक्त की कमी है, लेकिन असली वजह यह है कि मुझे वहां आने में हिचक होने लगी है. मैं अपने पुराने सहयोगियों के साथ विवाद में पड़ना नहीं चाहता और लेकिन मैं वहां बुरी तरह असहज महसूस करता हूं. मैं देखता हूं कि जो लोग कभी कांग्रेस के स्तंभ हुआ करते थे, आज सांप्रदायिकता ने उनके दिलो-दिमाग पर कब्जा कर लिया है. यह एक किस्म का लकवा है, जिसमें मरीज को पता तक नहीं है कि वह लकवाग्रस्त है. मस्जिद और मंदिर के मामले में जो कुछ भी अयोध्या में हुआ और होटल के मामले में फैजाबाद में जो हुआ, वह बहुत बुरा है. लेकिन सबसे बुरी बात यह है कि यह सब चीजें हुईं और हमारे अपने लोगों की मंजूरी सी हुईं और वे लगातार यह काम कर रहे हैं.
मुझे लगता है कि कुछ वजहों से बल्कि सियासी वजहों से हम इस बीमारी के बारे में बहुत ज्यादा काहिल हो गए हैं. यह पूरे देश में और हमारे अपने प्रांत में फैल रही है. कई बार मुझे लगता है कि मैं सारे काम छोड़ कर इसी मुद्दे पर काम में जुट जाऊं. हो सकता है एक दिन मैं यही करूं. अगर मैं यह करता हूं तो यह क्रूसेड होगा और मैं अपनी पूरी ताकत से इस काम में लगूंगा.

वो लोग संस्कृति के मामले में सबसे पिछड़े हुए हैं
इसी पत्र में उन्होंने लिखा,
" मेरा दिल कहता है कि जो लोग कांग्रेस में काम कर रहे हैं, उनके दिल अभी भी काफी हद तक मजबूत हैं और उन्हें हम अपनी बात समझा सकते हैं, लेकिन नेतृत्व कमजोर है और वह लगातार गलत चीजों के साथ समझौता कर रहा है. यही वजह है कि हमारे कार्यकर्ता भटक रहे हैं.
हमारी बड़ी-बड़ी बातों से कोई देश हमारे बारे में कुछ भी सोचता रहे, लेकिन हकीकत यही है कि हम पिछड़े हुए लोग हैं, जो संस्कृति के मामले में सबसे ज्यादा पिछड़े हुए हैं. वही लोग संस्कृति के बारे में सबसे ज्यादा बात कर रहे हैं.’’

नेहरू ने तत्कालीन कांग्रेस पर प्रहार किया और लिखा कि हमारा नेतृत्व लगातार गलत चीजों के साथ समझौता कर रहा है. यही वजह है कि हमारे कार्यकर्ता भटक रहे हैं.


पंत ने लिखा मैं शर्मिंदा हूं 
22 अप्रैल को पंत ने जवाबी पत्र में लिखा: प्रांत के कुछ भागों में जो ज्यादतियां हुई हैं, उनके लिए मैं शर्मिंदा हूं. हालात मोटे तौर पर सामान्य हो रहे हैं, लेकिन यह तथ्य कि हम हालात को इस कदर बिगड़ने से रोक नहीं सके, मुझे लगातार शर्मिंदा कर रहा है.’’

किस होटल का जिक्र किया था नेहरू ने 
नेहरू जी के पत्र में होटल का जिक्र आया है. दरअसल, फैजाबाद में एक मुस्लिम के होटल को प्रशासन ने खाली करा लिया और अगले ही दिन एक हिंदू ने उस पर कब्ज़ा कर लिया था.
ये सब चीजें नेहरू और हिंदुस्तान के लिए नासूर बनती जा रही थीं. 18 मई 1950 को नेहरू ने बिधान चंद्र रॉय को पत्र लिखा:
‘‘16 मई के आपके पत्र के लिए धन्यवाद. इस पत्र में आपने मुझे ढाका में आपकी बैठक के बारे में जानकारी दी. ऐसा लगता है कि बैठक काफी अच्छी रही. यह बात स्पष्ट है कि आप जिन मुश्किलों का सामना कर रहे हैं, उसमें कुछ व्यवहारिक दिक्कतें हैं, लेकिन उससे भी बड़ी चुनौती मनोवैज्ञानिक दिक्कतों की है, क्योंकि दोनों ही पक्षों के मन में संदेह घर कर गया है.
आपकी यह बात सही है कि मौलवी और मौलाना परेशानी खड़ी कर सकते हैं. दूसरी वजहों के अलावा इसका एक आर्थिक कारण भी है, क्योंकि जहां भी मुस्लिम पर्सनल लॉ मौजूद है, वहां वे काजी या किसी किस्म के न्यायिक अधिकारी बनना चाहते हैं. लेकिन हमारे पास अपने मौलवी और मौलाना भी हैं. यह बात अलग है कि हम उन्हें दूसरे नाम से पुकारते हैं.

नेहरू ने संयुक्त प्रांत के तत्कालीन गृह मंत्री लालबहादुर शास्त्री को भी पत्र लिखा बताया कि क्या घटनाएं हो रही हैं


नेहरू का लालबहादुर शास्त्री को पत्र 
9 जुलाई 1950 को नेहरू जी ने संयुक्त प्रांत के गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री को पत्र लिखा:
‘‘अक्षय ब्रह्मचारी (फैजाबाद जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष) कल मुझसे मिलने आए थे. उन्होंने अयोध्या में जो हुआ, उसके बारे में विस्तार से मुझे बताया. इसमें से बहुत सी बातें मैंने पहले सुनी थीं और बहुत सी बातें मेरे लिए नई थीं. आपको यह सब बातें अवश्य ही पहले से पता होंगी, इसलिए मैं उन्हें दोहरा नहीं रहा हूं. हालांकि मैंने अक्षय से कहा है कि इस मामले में वह आप के संपर्क में रहें.
जैसा कि आप जानते हैं कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद का मामला हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है. यह ऐसा मुद्दा है जो हमारी संपूर्ण नीति और प्रतिष्ठा पर गहराई से बुरा असर डाल रहा है, लेकिन इसके अलावा मुझे ऐसा लगता है कि अयोध्या में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. इस बात का पूरा अंदेशा है कि इस तरह की समस्याएं मथुरा और दूसरे स्थानों पर फैल जाएं. मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात से हो रही है कि हमारा कांग्रेस संगठन इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहा है और राघवदास और विशंभर दयाल त्रिपाठी जैसे कई कद्दावर कांग्रेसी नेता उस तरह का प्रोपोगंडा चला रहे हैं, जिसे हम सिर्फ सांप्रदायिक कह सकते हैं और जो कांग्रेस की नीति के खिलाफ है.

पत्र में फिर अयोध्या के होटल का जिक्र
इसी पत्र में उन्होंने आगे लिखा, अक्षय ने मुझे बताया कि अयोध्या में किसी मुसलमान का एक होटल है, स्टार होटल. इस होटल को धारा 144 के अंतर्गत दिसंबर में खाली करने का आदेश दिया गया और अगले ही दिन किसी हिंदू ने इस होटल पर कब्जा कर लिया. और उसके 4 दिन बाद उन्होंने इस में एक नया होटल शुरू कर दिया, जिसका नाम गोमती होटल रखा गया. यह चल रहा है. मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आ रही कि किस कानून के तहत, किस नीति के तहत, समझदारी के किस पैमाने के तहत, यह काम किया गया और किसने यह करने की अनुमति दी.

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First published: November 9, 2019, 6:24 AM IST
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