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आजादी मिलने के बाद क्या करना चाहते थे सुभाष चंद्र बोस

Arun Tiwari | News18Hindi
Updated: January 23, 2020, 6:21 AM IST
आजादी मिलने के बाद क्या करना चाहते थे सुभाष चंद्र बोस
नेताजी सुभाष चंद्र बोस आजाद हिंद फौज की महिला विंग रानी झांसी ब्रिगेड के साथ

सुभाष चंद्र बोस आजादी की लड़ाई के दौरान आजाद हिंद फौज के सहयोगियों से अक्सर ये बात कहते थे कि वो देश को आजादी दिलाने के बाद हिमालय जाना चाहते थे. नेताजी बार-बार अपना ये इरादा क्यों जाहिर करते थे. वो हिमालय जाकर क्या करना चाहते थे

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  • Last Updated: January 23, 2020, 6:21 AM IST
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आजादी के बाद देश में अक्सर ये माना जाता था कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस का निधन विमान हादसे में नहीं हुआ है. वो जल्द अज्ञातवास से वापस स्वदेश लौटेंगे और तब देश में आमूलचूल बदलाव आएगा. ये तो चर्चाओं की बात थी लेकिन नेताजी आजादी की लड़ाई के दौरान आजाद हिंद फौज के सहयोगियों से एक खास इच्छा जाहिर करते थे, जिसके लिए वो आजादी के बाद हिमालय जाना चाहते थे.

उनके एक खास सहयोगी एसए अय्यर ने इस बारे में कई बार लिखा भी. इसमें ये बताया गया है कि सुभाष उनसे अक्सर आजादी के बाद एक खास काम करने की इच्छा जाहिर करते थे. वो कहते थे कि खून से सनी दिल्ली जाने वाली सड़क पर वो अपनी क्रांतिकारी सेना का संचालन करेंगे लेकिन जैसे ही उन्हें अपने इस उद्देश्य में सफलता मिल जाएगी, तब वो अपने जीवन के असली ध्येय की ओर मुड जाएंगे.

सुभाष बोस पर लिखी पत्रकार संजय श्रीवास्तव की किताब "सुभाष की अज्ञात यात्रा" में इस बारे में चर्चा की गई है. ये भी बताया गया है कि सुभाष क्यों अक्सर ये बात कहते थे. सुभाष कहते थे," देश को आजादी मिलते ही वो हिमालय चले जाएंगे, जहां वो ध्यान-भजन करेंगे. यही उनके जीवन का असली ध्येय है."
दरअसल आध्यात्म सुभाष के जीवन का एक अनिवार्य और गहन तत्व था, जिसने उनके अंदर किशोरवय से ही पैठ जमा ली थी. जब वो किशोर हो रहे थे, तब उनका रुझान आध्यात्म की ओर होने लगा. तब वो बाबा और साधुओं की तलाश में लग गए. इससे उनके व्यक्तित्व में अजीब सा बदलाव आने लगा. उनके घरवालों ने भी इसे महसूस किया.


क्यों एकांत जगह की तलाश करते थे
साधु और महात्माओं की संगत को तलाशने के चलते वो घर से कई कई घंटों के लिए बाहर रहते. आसपास के उन स्थानों में चले जाते, जहां प्रकृति की छटा होती और एकांत होता. ऐसी जगहों पर वो ध्यान साधना करने लगते. घर में रहने पर वो कोई अंधेरा कमरा तलाशते और वहां बैठकर खुद को ध्यान में डूबोने की कोशिश करते.किताब कहती है," बाद में जब वो जर्मनी और जापान में लंबे समय के लिए रहे तब भी हर हाल में रोज रात में ध्यान साधना जरूर करते थे. वो रोज रात भगवद्गीता पढ़ते थे, इससे उन्हें शांति और शक्ति मिलती थी. हालांकि उनका ज्यादा समय लोगों के बीच बीतता था लेकिन रात में ज्यों एकांत मिलता, वो ध्यान साधना में लीन हो जाते."

किताब "सुभाष बोस की अज्ञात यात्रा" के अनुसार वो जर्मनी और जापान में लंबे समय के लिए रहे तब भी हर हाल में रोज रात में ध्यान साधना जरूर करते थे. वो रोज रात भगवद्गीता पढ़ते थे, इससे उन्हें शांति और शक्ति मिलती थी.


रात का समय उनके आध्यात्मक का समय होता था
जनता के बीच वो मंच पर लंबा भाषण देते थे लेकिन मंच से अलग होते ही एकांत चाहते थे. तब वो कम ही लोगों से बातचीत करते थे. भोजन के बाद वो आमतौर पर विश्राम करते लेकिन अगर उनके पास कोई बुलाया हुआ व्यक्ति आ जाता था तो पूरे घंटे में शायद कुछ ही शब्द बोलते थे. वो उस समय शांति ज्यादा चाहते थे. वो उनका आध्यात्मिक समय होता था.

घंटों ध्यान साधना करते थे
रात में उनका ध्यान लंबा होता था. वो देर रात दो-तीन बजे तक सोते थे लेकिन सबेरे उठने पर चेहरे ताजगी और आभा से भरपूर होता था. सिंगापुर में रहने के दौरान सोने के पहले रामकृष्ण परमहंस आश्रम चले जाते थे. वहां जाकर ध्यान करते थे. उनके रोज के काम और आध्यात्मिक साधना साथ-साथ चलती रहती थी. बर्लिन में जब दूसरे विश्व युद्ध के दिनों में बमबारी की आबाज आती थी, तब वो अपने घर में देर रात तक ध्यान करते रहते थे.

सुभाष बोस रोजाना कई घंटे ध्यान साधना करते थे


मानते थे तंत्र साधना की ताकत
उनकी जीवन की आदतें आमतौर पर सादगी लिये हुए थीं. वो खुद उसी राशन का भोजन करते थे, जो उनके सैनिक करते थे. वो मां काली के भक्त थे. ये भी कहा जाता है कि वो तंत्र साधना की शक्ति मानते थे. जब वो गांधीजी के विरोध के बाद 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए तो कुछ समय बाद रहस्यमय तरीके से बीमार हो गए. तब उनका मानना था कि कांग्रेस के कुछ नेताओं ने उनके खिलाफ तंत्र साधना की थी.

1933 में जब वो एसएस गंगे जहाजे से यूरोप जा रहे थे तो अपने दोस्त दिलीप कुमार रॉय को लिखा, मैं शिव के प्रति ज्यादा भक्तिभाव में रहता हूं. कुछ सालों से मंत्रों की शक्ति को मानने लगा हूं. वाकई मंत्रों में बहुत ताकत होती है. पहले मैं मंत्रों को लेकर सामान्य भाव रखता था. बाद में मैने तंत्र फिलास्फी पढ़ी. कुछ मंत्र तो शक्ति देने के मामले में वाकई अदभुत होते हैं.

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First published: January 23, 2020, 6:21 AM IST
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