क्यों चीनियों की फेवरेट बनी हुई है वुल्फ वारियर मूवी?

क्यों चीनियों की फेवरेट बनी हुई है वुल्फ वारियर मूवी?
चीनी लोगों के बीच वुल्फ वारियर फिल्म काफी लोकप्रिय है (Photo-cnn)

फिल्म में एक चीनी कमांडो अफ्रीका और अफगानिस्तान में अमेरिकियों की जान लेता है. यही बात चीन के लोगों और यहां तक कि सरकार को भी लुभा रही है.

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चीनी लोगों के बीच वुल्फ वारियर (Wolf Warrior) फिल्म काफी लोकप्रिय है. युद्ध पर आधारित फिल्म की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लग जाता है कि चीन की जनता से लेकर सरकार तक इस मूवी के अंदाज में कूटनीतिक चालें चल रही है. फिलहाल कोरोना वायरस को लेकर चीन आरोपों से घिरा हुआ है. तब भी उसका आक्रामक रवैया कम नहीं हो रहा. बल्कि दुनिया की हवा अपने पक्ष में करने के लिए उसने कूटनीतिज्ञों की पूरी फौज खड़ी कर दी है. ये लोग वुल्फ वारियर हैं और चीन की इस कूटनीति को वुल्फ वारियर डिप्लोमेसी (Wolf Warrior diplomacy) कहा जा रहा है.

वो फिल्म, चीन जिसके नक्शे-कदम पर है
ये फिल्म साल 2015 में चीन में बनी. 3डी में बनी इस फिल्म में चाइनीज मार्शल आर्ट खूब दिखा है. साथ ही फिल्म में लोकप्रिय अभिनेता वू जिंग मुख्य भूमिका में है. साल 2015 के बाद फिल्म का सीक्वल वुल्फ वारियर 2 के नाम से 2017 में बना. वैसे पहला पार्ट बनने में पूरे 7 साल लगे. इसने हर बार बेतहाशा कमाई की. खासकर सीक्वल चीन की सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली फिल्म बन गई. लेकिन फिल्म की सबसे खास बात है कि कमर्शियल होने के बाद भी ये पीपल्स लिबरेशन ऑफ आर्मी के लोगों की जांबाजी दिखाती है. इसके लिए सेना की भी मदद ली गई.

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फिल्म में चीनी सेना भयानक आक्रामक और चालाक रही. यही तरीका चीन की सरकार असल में भी अपनाती दिख रही है. इसलिए इसे वुल्फ वारियर डिप्लोमेसी कहा जा रहा है.



इस फिल्म में चीनी सेना भयानक आक्रामक और चालाक रही (Photo-cnn)


क्या है ये डिप्लोमेसी
सीधे शब्दों में कहें तो ये चीन की कूटनीति का नया अंदाज है, जिसमें वो उन सारे देशों से कड़ाई से निपट रहा है, जो चीन के खिलाफ बोलते हैं. ये सब बिल्कुल फिल्म के अंदाज में हो रहा है. पीपल्स लिबरेशन आर्मी पर बनी इस फिल्म की सफलता से चीन की सरकार को बखूबी समझ आ गया कि लोगों के बीच इसकी लोकप्रियता है. यही वजह है कि फिल्म में जैसे वुल्फ वॉर छेड़ा गया, वैसा ही चीन अपने कूटनीतिज्ञों के साथ मिलकर कर रहा है. इस फिल्म में एक चीनी कमांडो अफ्रीका और अफगानिस्तान में अमेरिकियों की जान लेता है. यही इस फिल्म की सबसे खास बात मानी जा रही है. अमेरिका से दुश्मनी और बदला. यही शैली डिप्लोमेट्स में भी दिख रही है.

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बदला है तौर-तरीका
जैसे पहले चीन के डिप्लोमेट सरकारी अधिकारियों से बात करते थे. अब वे सोशल मीडिया पर अपनी आक्रामकता दिखाते हैं. वे हर उस देश या नेता पर सीधा वार करते हैं जो चीन या कम्युनिस्ट पार्टी की आलोचना करता दिखे. वे किसी को नहीं छोड़ते हैं. डिप्लोमेसी का आक्रमक अंदाज वुल्फ वारियर फिल्म की टैग लाइन से मेल खाता है. ये कहता था- कोई चीन का अपमान करता हो तो वो हजार मील दूर होने पर भी नहीं बख्शा जाएगा.

चीन अपने कूटनीतिज्ञों के साथ मिलकर वुल्फ वारियर कूटनीति अपना रहा है


इस डिप्लोमेट ने की शुरुआत
फिल्म और चीनी डिप्लोमेट्स की पहली बार तुलना साल 2019 में हुई. तब पाकिस्तान में चीन के डिप्लोमेट जाओ लिजान (Zhao Lijian) ने ट्विटर पर अमेरिका की बुराई शुरू की. काउंसलर जाओ ने हमले में कहा कि अमेरिका को ह्यूमन राइट्स पर बात करने का कोई हक नहीं, जब खुद उसके यहां रेसिज्म जैसे मामले हैं. इन ट्वीट्स पर काफी बवाल मचा था. यहां तक कि अमेरिकी सरकारी अमला इसमें इनवॉल्व हो गया.

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हालांकि इससे उस डिप्लोमेट का करियर खराब नहीं हुआ, बल्कि उसे प्रमोशन मिला. अब वे चीन की फॉरेन मिनिस्ट्री के तीन ताकतवर प्रवक्ताओं में से हैं.

चीन के डिप्लोमेट जाओ लिजान (Zhao Lijian) ने ट्विटर पर अमेरिका की बुराई शुरू की (Photo-twitter)


सिलसिला चल निकला
सारे ही चीनी डिप्लोमेट सोशल मीडिया पर अपने देश को लेकर आक्रामक दिखने लगे. खासकर ट्विटर पर, जो चीन में बैन है. इसपर चीन के विदेश मंत्रालय के सूचना विभाग की डायरेक्टर जनरल हुआ चनयिंग ने ट्वीट में कहा कि कई नेता बेसिक फैक्ट को भुलाते हुए चीन पर झूठे आरोप लगाते रहते हैं. बता दें कि ये बात अमेरिका के चीन पर आरोप के जवाब में कही गई थी, जिसमें उसने चीन पर कोरोना वायरस फैलाने का आरोप लगाया था.



हैं भेड़िये की तरह खूंखार
चीनी राजनयिकों की नई शैली को वुल्फ वारियर डिप्लोमेसी माना जा रहा है. भेड़िये की तरह खूंखार और आक्रामक ये डिप्लोमेट अमेरिका या ब्रिटेन ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान, नेपाल से लेकर लंदन और बर्लिन तक तैनात हैं. अगर कहीं भी उन्हें चीन के खिलाफ हवा जाती दिखे तो वे तुरंत ट्विटर पर कैंपेन छेड़ देते हैं, जिसमें सारी बातों को झूठ साबित करने पर तुले रहते हैं.

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साथ ही जनता के बीच भी चीन ने अपने एजेंट तैनात कर रखे हैं. ये आमतौर पर प्रोफेसर, डॉक्टर या शोधार्थी जैसे लोग होते हैं. इन्हें चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के पक्ष में बोलने के पैसे मिलते हैं. ऐसे कई मामले हाल के महीनों में सामने आ चुके हैं, जिसमें एक प्रो-चीनी तो ऑस्ट्रेलिया का अहम नेता था. उसे भी चीन ने खरीद लिया था.
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